Wednesday, May 23, 2012

लगाएं मन पर लगाम

मन की दो सर्वज्ञात विशेषताएं हैं- चंचलता एवं सुख लिप्सा। बंदर जैसी उछल-कूद, आवारा छोकरों जैसी मटरगश्ती, चिड़ियों की तरह यहां-वहां फुदकते फिरना, उसकी चपलवृत्ति को संतुष्टि पहुंचाते हैं। कल्पना के महलों की सृष्टि, कल्पना लोकों का तीव्र भ्रमण-विचरण, उसकी शक्ति का बड़ा अंश तो इन्हीं भटकनों, जंगलों में नष्ट हो जाता है। शक्ति का यह व्यर्थ छीजन रोककर उसे सुनिश्चित एवं सार्थक प्रयोजन में केंद्रित करना ही योगाभ्यास है। शक्तियों का यह सही उपयोग जीवन में स्पष्ट और आश्चर्यजनक परिणाम सामने लाता है। पिछड़ेपन के स्थान पर प्रगतिशीलता आ जाती है। दरिद्रता समृध्दि में परिणित हो जाती है। भटकाव की जगह प्रचंड पुरुषार्थ प्रवृत्ति पनपने पर परिस्थतियां अनुकूल बनने लगती हैं और साधन सिचिंत होने लगते हैं। लौकिक सफलताएं भी लक्ष्य केंद्रित पुरुषार्थ का ही परिणाम होती हैं। मन की भटकन रोककर ही उसे लक्ष्योन्मुख बनाया जा सकता है।


सुषुप्त शक्ति केंद्र

यही सधा हुआ मन आत्मिक क्षेत्र में लगाए जाने पर सुषुप्त शक्ति केंद्रों को जाग्रत व क्रियाशील बनाता है और दिव्य क्षमताएं प्रकाश में आती हैं। अंतश्चेतना का परिष्कार सामान्य व्यक्ति को महामानव स्तर पर ले जाकर ही रहता है। प्रगति का संपूर्ण इतिहास मन:शक्ति के पूंजीभूत लक्ष्य केंद्रित पुरुषार्थ की ही यश गाथा है। चंचलता की प्रवृति को पुरुषार्थ की प्रवृत्ति में परिवर्तित करने का पराक्रम ही प्रगति का सार्वभौम आधार रहा है।

मन की दूसरी प्रवृत्ति है- सुख लिप्सा। शारीरिक सुखों के भोग का माध्यम है- इंद्रियां। उनके द्वारा विभिन्न वासनाओं को स्वाद मिलता है। पेट और प्रजनन से संबंधित सुखों के लिये तरह-तरह की चेष्टाओं में मन उलझा रहता है और इन सुखों की प्राप्ति के लिये प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि इनकी मात्रा कल्पनाएं करने में भी बहुत अधिक समय नष्ट करता है। फिर इन भौतिक सुखों के लिये साधन जुटाने में भी मन को जाने कितने ताने-बाने बुनने पड़ते हैं। इंद्रियों की प्रिय वस्तु या व्यक्ति को देखने, सुनने, छूने, सूंघने अथवा स्वाद लेने की लिप्साएं मन को ललक से भर देती हैं और वह उसी दिशा में लगा रहता है। अहंकार की पूर्ति के लिये मन औरों पर प्रभाव डालने हेतु तरह-तरह की चेष्टाएं करता है और व्यक्ति भांति-भांति के ठाट-बाट बनाता है। संचय और स्वामित्य की इच्छाएं भी अनेक विधि प्रयत्नों का कारण बनती हैं। इन सभी इच्छाओं, आकांक्षाओं की प्यास को व्यक्त करने के लिये ही तृष्णा शब्द का प्रयोग होता है। अहं-भावना पर आघात पहुंचते ही प्रतिशोध की उत्तेजना प्रबल हो उठती है। इच्छित विषय पर अपना हक मान लेना और फिर उनके प्राप्त न होने पर या प्राप्ति में बाधा पड़ने पर भड़क उठना भी अहंता पर आघात के ही कारण होता है, यह उत्तेजना ही क्रोध है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि संपूर्ण विकार समूह वस्तुत: मन में उठने वाली प्रतिक्रियाएं मात्र हैं, जो भौतिक सुख की लिप्साओं के कारण उठते रहते हैं। लिप्सा की इस ललक की दिशा को उलट देना ही 'तप' है।

सुख मन का विषय है, जबकि आनंद और आत्मसंतोष आत्मा का। सुख लिप्सा का अभ्यस्त मन आनंद के स्वाद को नहीं जान पाता और जिसे जाना ही नहीं, उसके प्रति गहरी स्थायी प्रीति, सच्चा आकर्षण संभव नहीं। आनंद की आकांक्षा विषय लोलुप मन में प्रगाढ़ नहीं होती। उसके लिये तो मन का प्रशिक्षण आवश्यक है। यह प्रशिक्षण प्रक्रिया ही तप है। तपस्वी को कष्ट इसी अर्थ में सहना पड़ता है कि अभ्यस्त सुख का अवसर जाता रहता है। शारीरिक सुख-सुविधाएं सिमटती हैं, मानसिक आमोद-प्रमोद का भी अवकाश नहीं रहता है और आदर्शनिष्ठ आचरण आर्थिक समृध्दि के भी आड़े ही आता है। प्रत्यक्ष तौर पर तो, ऐसे परिणामों के लिये किया जाने वाला प्रयास मूर्खता ही प्रतीत होगा, लेकिन श्रेष्ठ उपलब्धियों का राजमार्ग यही है।

किसान, विद्यार्थी, पहलवान, श्रमिक, व्यवसायी, कलाकार आदि को भी अपनी प्रगति व उपलब्धियों की प्राप्ति के लिये बाल-चंचलता से मन को विरत ही करना पड़ता है। और अपने नीरस प्रयोजनों में ही मन:शक्ति नियोजित करनी पड़ती है। शौक मौज के अभ्यस्त उनके संगी उन लोगों की ऐसी लक्ष्योन्मुख प्रवृत्तियों का मजाक भी उड़ाते हैं, लेकिन सभी जानते हैं कि अंतत: बुध्दिमान और प्रगतिशील ऐसे ही लोगों को माना जाता है, जो चित्त की चपलता को नियंत्रित कर उसे अपने लक्ष्य की ओर ही लगाए रहते हैं। वह कृषि का क्षेत्र हो या शिक्षा का, शरीर सौष्ठव का हो या आर्थिक समृध्दि का, कला-कौशल का हो या वैज्ञानिक आविष्कार का अथवा दार्शनिक चिंतन-मनन का।

दलदल में कंठ तक फंसता हुआ मनुष्य प्रगति पर अग्रसर कैसे हो? पहला प्रयास डूबने की स्थिति से उबरने का होना चाहिये। मन को तृष्णाओं से और शरीर को वासनाओं के गर्त में गिरने से बचाया जाना चाहिये।

सादा जीवन, उच्च विचार

पतन में गिरने से बचाना और ऊंचा उठाने का सुयोग बनना तभी संभव है, जब सांसारिक इच्छाओं की ओर सरपट दौड़ने की आदत बदली जाए और उलटकर उन महत्वाकांक्षाओं के मार्ग पर चला जाए तो महानता के लक्ष्य तक पहुंचाता है।

परिवर्तन की यह संधि वेला आई या नहीं, इसकी एक ही कसौटी है कि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार हुआ या नहीं। सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श की महत्ता मानी गयी या नहीं। अमीरी का बड़प्पन निरर्थक मानकर महानता का गौरव गले उतरा या नहीं। यदि इतना बन पड़े तो जीवन वस्तुत: नितांत हल्का-फुल्का हो जाएगा। उसकी राई रत्ती जितनी आवश्यक है, तनिक सी सूझ-बूझ और मेहनत के सहारे पूरी होती चलेंगी।

सांसारिक समस्याएं और कठिनाइयां सरलतापूर्वक हल होती चलेंगी। अनसुलझी कोई गुत्थी रहेगी नहीं। जहां संतोष और सादगी का रसास्वादन हुआ नहीं कि वह परिस्थितियां देखते-देखते बदल जाएंगी जो व्यस्त रखती थी और त्रस्त करती थीं। महत्वाकांक्षाएं वही श्रेयस्कर हैं, जो बड़ा नहीं महान बनाएं। महान बनने का एक ही उपाय है कि दृष्टिकोण और कार्यक्रम महान बनाया जाए, उत्कृष्ट चिंतन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार, यह तीनों का एक त्रिभुज हैं जो मिलकर महानता की समग्र आकृति बनाते हैं। इन्हीं का समन्वय त्रिवेणी संगम बनाता है।

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