Thursday, March 29, 2012

चिंता छोड़ें - आनन्द से जिएं!

वैज्ञानिक बताते हैं कि यदि प्रसन्न, चिंता मुक्त और प्रफुल्ल रहना चाहते हैं तो भूलना सीखें। व्यर्थ की बातें दिमाग से बाहर फैंक दें अच्छी लाभदायक बातें दिमाग में रखें तो कुछ हद तक चिंता, टैंशन से निजात पायी जा सकती है। कुछ सूत्र याद रखें-
- चिंता एक प्रकार की कायरता है- जो किसी भी परिस्थिति की सम्भावना के काल्पनिक डर के कारण अकारण ही पैदा हो जाती है और हमें विचलित कर देती है। चिंताग्रस्त मानसिक अवस्था लेकर सोने से चैन की नींद कोसों दूर भाग जाती है।
- हम प्रकृति के विरुध्द नहीं जा सकते-जो होता है उसे होने दें- उसके सहभागी बनें और समभाव रहें! हम चिंता करके किसी भी परिस्थिति को रोक या बदल नहीं सकते। आज की आज और कल की कल देखेंगे, की आदत बनाएं।
- अक्सर हम कल्पनाओं के कारण चिंतित हो जाते हैं। बच्चा बाहर से घर आने में लेट हो जाए तो हम वो अनजानी अनहोनी कल्पनाएं करने लगते हैं जो कभी सम्भव नहीं हो सकती। लड़की कालेज से घर में आने में देरी कर दें तो मन में उल्टी सीधी भावनाएं जागृत होने लगती हैं जिससे मानसिक कुण्ठा, ग्लानि चिंता-डिप्रेशन होने लगता है। इससे बचना चाहिए। बच्चों को कहा जाए कि यदि कहीं कारणवश देर हो जाए तो फोन या मोबाइल पर घर में इन्फार्म कर दें।
- अक्सर जिस काम की फिक्र होती है बार-बार उसी बात का जिक्र किया जाता है। चिंता ऐसी भट्ठी है जो जीवित को जलाती है जबकि चिंता मृत्यु उपरान्त जलाती है। चिंता दहति निर्जीव को चिंता जीव समेत। अक्सर चिंता फिक्र में अवसाद (डिप्रेशन) हो जाता है। व्यक्ति सूख कर कांटा हो जाता है। हमें यह जान लेना चाहिए कि यदि चिंता का इलाज है तो चिंता क्यों करें। यदि ला-इलाज है तो चिंता क्यों करें। जिसका कोई इलाज ही नहीं- उसे सहन और वहन करना पड़ता है- मुश्किल बात यह है कि हमारी सबसे बड़ी मुसीबतें वे हैं जो हम पर कभी आती ही नहीं। यह बात जान लेनी चाहिए कि जब तक पुल रास्ते में न आए तब तक उसे पार करने की चिंता नहीं करनी चाहिए- जब तक हमें कष्ट नहीं आता तब तक कष्ट को भी नष्ट नहीं देना चाहिए।
- कई लोग बहुत छोटी-छोटी बातों को लेकर चिंतित हो उठते हैं। राई का पहाड़ तो सब बना लेते हैं मजा तो तब है जब आप पहाड़ की राई बना डालें। सदा आशावादी बनना चाहिए- निराशावादी विचार हमें चिंताग्रस्त कर देते हैं। जैसे को तैसा करके परेशानियों में वृध्दि न करें। उसे क्षमा करके अपने आप को भी चिंता मुक्त करने की क्षमता बनाएं।
- बीती ताहि बिसारिये, आगे की सुध ले। आज की परिधि में रहें- कल की बात पुरानी, छोड़ों कल का बातें, यही जीवन का नियम है।
- हर रोज एक नयी जिन्दगी की शुरुआत करनी चाहिए- प्रतिदिन ऐसे जिएं की आज ही जीना है। पूरे दिन का सुन्दर और अच्छा कार्यक्रम बनाये। किसी सम्भावित परिस्थिति के लिए अपने आपको पूर्णतः तैयार रखें। दो-तीन दिन में जो होना होता है, हो ही जाता है। उसके बाद जीवन यथावत चलने लगता है। अपनी पूरी श्रध्दा से अच्छे से अच्छा कार्य करें। यह कभी हो नहीं सकता कि सद्कर्म का फल कड़वा हो, मीठा होगा।
- चिन्ता मुक्त जीना सचमुच एक कला है। जीने का आकांक्षा एवं उत्कण्ठा है, जो चिन्ताओं को अपने मस्तिष्क से दूर रखता है वह अवश्य ही दीर्घजीवी होता है। वह अपने शरीर का स्वतः काया कल्प कर लेता है। ईश्वर ने हमें चिंता मुक्त जीवन जीने के लिए भेजा है। वैसे ही जिएं।

Sunday, March 11, 2012

तनाव! रोग नहीं मनोरोग भी है

सुबह जल्दी उठना और रात देर से सोना। काम के चलते घंटों घंटों परेशान रहना। कई रात बिना सोए गुजार देना। दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे नये-नये आइडियाज सोचना। खाते वक्त तमाम सवालों के हल खोजना। अपने प्रतिस्पर्धा को मात देने के उपाय सोचना। कहने का मतलब यह है कि 7 दिन 24 घंटे तनाव हमें घेरे रहता है। इस तरह देखा जाए तो तनाव से निजात पाने का हमारे पास कोई सटीक उपाय नहीं है। क्योंकि ऐसा नहीं है कि हम महज अपने काम के चलते परेशान रहते हैं। कभी काम के चलते परेशान रहना तो कभी पारिवारिक और भावनात्मक तनाव भी हमें घेर लेता है जिसका सीध-सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है।
लेकिन कुछ लोग बेवजह भी तनावग्रस्त रहते हैं। असल में उनके पास तनाव की कोई ठोस वजह नहीं होती। विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे लोग दूसरों को भी परेशान करते हैं और खुद भी हमेशा परेशान रहते हैं। दरअसल ऐसे लोगों के लिये तनाव रोग से ज्यादा मनोरोग होता है। उन्हें दूसरों के काम में खराबी नजर आती है, दूसरों का बातचीत का तौर तरीका पसंद नहीं आता, दूसरों की अच्छी चीजों में भी नुक्स निकालना ये बखूबी जानते हैं। वास्तव में ऐसे लोगर् ईष्यालू होते हैं। दूसरों से बेवजह जलन, दूसरों की सफलता से नाखुश होना, इनकी आदत का अभिन्न हिस्सा है। यही वजह है कि ये लोग चौबीसों घंटे तनाव में रहते हैं और इसका सीधा-सीधा प्रभाव उनकी सेहत पर दिखायी देता है।
अब 24 वर्षीय वीना को ही लें। कुछ ही दिनों में उसकी शादी गौतम से होने वाली है। गौतम एक मेहनत पंसद युवक है। दिल खोलकर अजनबियों से बात करना, नये-नये प्रयोग करना, उपन्यास पढ़ना उसके शौक हैं। वीना को उसकी इनमें से एक भी चीज पसंद नहीं है। गौतम का किताबें पढ़ना उसे रास नहीं आता, जबनबियों से क्यों बात करता है, इस पर भी उसे शिकायत है। यहां तक कि दफ्तर में अपने सहकर्मियों से हंस बोलकर क्यों बात करता है, अपने से निचले दर्जे के सहकर्मियों के साथ खाना क्यों खाता है? ये सारी बातें भी वीना के लिये तनाव का कारण है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे लोगों को तनाव में रहना अच्छा लगता है इसलिये हर छोटी सी छोटी चीज में तनाव ढूंढ़ लेते हैं। जबकि खुश होने के लिये इन्हें बड़ी-बड़ी खुशी भी छोटी लगती है। वास्तव में कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों में आत्मविश्वास की बहुत कमी होती है जिस कारण वे दूसरों को भी डराने से बाज नहीं आते। उन्हें लगता है कि वे जो भी करेंगे, उसमें सफतला हासिल नहीं कर पायेंगे। इसलिये अगर कोई इनसे कोई सलाह मश्विरा करे तो उसमें 60 फीसदी से ज्यादा नकारात्मक बातें ही नजर आती हैं।
विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो जो लोग नकारात्मक सोच से घिरे रहते हैं, हर चीज में तनावग्रस्त हो जाते हैं, आत्मविश्वास खो बैठते हैं। ऐसे लोगों को स्वास्थ्य कभी भी बेहतर नहीं होता। इसके उलट तनाव से होने वाले तमाम रोग इनमें नजर आते हैं। ऐसे लोग या तो बहुत ज्यादा मोटे होते हैं या फिर बहुत ज्यादा पतले और कमजोर होते हैं। इन दिनों तनाव भारत ही नहीं पूरी दुनिया में तेजी से घर कर रही बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। एक स्वास्थ्य रिपोर्ट के मुताबिक अब पूरी दुनिया में लगभग 60 करोड़ से ज्यादा लोग मानसिक रोगों के शिकार हैं। तनाव उनमें से प्रमुख समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कुछ वर्षों पहले अपनी एक वार्षिक रिपोर्ट में मानसिक तनाव व इससे जुड़ी परेशानियों पर केन्द्रित करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि मानसिक तनाव व अन्य मानसिक पेरशानियों पर काबू नहीं पाया गया तो शारीरिक बीमारियों की स्थिति बेकाबू हो जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह भी माना कि तनाव की वजह से लोगों में शराब और सिगरेट की लत भी बढ़ रही है जिससे अलग प्रकार की स्वास्थ्य समस्या खड़ी हो रही है।
हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि तनाव की कई वजहे हैं। खासतौर पर विकासशील देशों में तनाव ने लोगों को अपने चंगुल में जकड़ रखा है जहां से निकल पाना संभव नहीं है। खासतौर पर भारत की बात करें तो यहां के आंकड़े साल दर साल चौंकाने की हद तक बढ़ते जा रहे हैं। माना जा रहा है कि हमारे यहां हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में तनावग्रस्त है। मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार शारीरिक इलाज के लिए आने वाले रोगियों में 60 से 65 प्रतिशत मानसिक तनाव के कारण शारीरिक रोग का शिकार होते हैं।
तनाव के कई कारण हैं। असफलता, नुकसान, आर्थिक या सामाजिक असफलता, काम का अत्याधिक दबाव, डर, असंयमित जीवनशैलीक्षमता व योग्यता से ज्यादा चाह लेकिन तनाव स्वयं ही कई गंभीर बीमारियों का कारण है। दमा, पेप्टिक अल्सर, आंतों में जख्म, खूनी मरोड़, दाद एक्जिमा ब्लड प्रेशर, घबराहट, दिल की बीमारी, किडनी के रोग, ब्रेन ट्यूमर, हकलाहट, नपुंसकता, नींद न आना आदि रोग तनाव की वजह से भी होते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो लोग बिना वजह तनावग्रस्त होते हैं, वे किस हद तक बीमारियों का घर बने हुए होते हैं। भयावह स्थिति यह है कि ऐसे लोग अपने साथ-साथ दूसरों को भी तनावग्रस्त कर देते हैं।
सवाल है ऐसे में क्या किया जाना चाहिए? सबसे पहली बात तो यह ध्यान रखें कि नेगेटिव एनर्जी वालों से खासी दूरी बना लें। क्योंकि बेवजह तनावग्रस्त रहने वाले लोग हमेशा खुद को सही और दूसरों को गलत मानते हैं। जबकि खुद किसी नई चीज की पहल करने में अक्षम होते हैं। अतः ऐसे लोगों से दूर रहे हैं। बहरहाल अगर आप भी तनावग्रस्त हैं तो यह जानने की कोशिश करें कि तनाव क्यों है? यदि काम से सम्बंधित तनाव है तो जल्द से जल्द उसका हल तलाशें। यदि संभव न हो रहा है बाहर घूमना फिरना, दोस्तों के साथ हैंगआउट करना, फिल्म देखना, गाने सुनना, अपने शौक पूरे करना आदि तनाव से राहत दिला सकने में मददगार साबित होते हैं। यही नहीं इनसे हमें खुशी भी मिलती है जो कि परेशानियों का बेजोड़ इलाज होता है।

Saturday, February 11, 2012

आत्म विकास और नैतिकता

आदर्श आचरण की अवधारणा ही नैतिकता है। शब्दकोष में नैतिकता का अर्थ है सदाचार एवं आदर्श जीवन पध्दति। नैतिकतापूर्ण जीवन का संकल्प लेने वाला स्वत: जीवन में सहज, सुख शांति के मार्ग पर अग्रसर होता है। इसी प्रकार अनैतिक आचरण जीवन के उच्चतम आदर्शों से पतन का कारण बनता है। सत्य प्रेम, न्याय तथा शांति को ध्येय मानकर चलने वाले व्यक्ति की नैतिकता ही आदर्श नैतिकता कही जा सकती है। श्रेष्ठ का स्वीकार और अधम के त्याग की भावना ही हमें लक्ष्य तक पहुंचा सकती है।
नैतिकता के अनेक आयाम हो सकत हैं- व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक। नैतिकता का रूप बदल सकता है। अनुपयोगी, जर्जर मूल्यों, मानदंडों के स्थान पर नवीन उपयोगी मूल्य स्थापित होते रहते हैं।
भारतीय परिवेश में नैतिकता धर्म से जुड़ी हुई है किन्तु आधुनिक जीवन में समाज के लिये कैसी नैतिकता चाहिये? इस पर लोगों के अलग-अलग विचार होंगे, पर जीवन में परस्पर प्रेम, सौहार्द्र, समन्वय तथा सामंजस्य की स्वीकृति प्रमुख रूप से सदा ही होती रही है।
नैतिकता की राह हमें निश्चय ही आत्मविकास, आत्मशोधन की मंजिल की ओर ले जाती है। जीवन के चरमलक्ष्य को पाने के लिये अन्य कोई मार्ग नहीं है। इसी से हर युग में ऋषियों ने नीति एवं नैतिकता को अनेक रूपों में परिभाषित कर समझाया है, ताकि सहज ही जीवन के इन उच्चतम मूल्यों को समाज में उचित स्थान मिलता रहे और जीवन पतन से बचता रहे।
भारतीय साहित्य नैतिकता के आख्यानों का भंडार है साथ ही समस्त संसार में मानव समाज ने जीवन के आदर्श मूल्यों को स्वीकृति दी है।
आत्म ज्ञान तथा आत्म विकास के लिये संकल्प लेने वाला कभी अपने आदर्श की अवहेलना नहीं करता, प्रत्युत जीवन के पल-पल का उपयोग कर वह उससे सुअवसर का लाभ उठाता रहता है, क्योंकि बिना नैतिक आचरण के आत्मविकास संभव ही नहीं है तो बिना आत्म ज्ञान, अभ्युदय के सुख तथा शांति की कल्पना भी व्यर्थ है। अस्तु मानव जीवन के अनमोल संयोग सुअवसर के सावधानी से लक्ष्य पर केंद्रित करके ही आत्मोन्नति के शिखर चढ़े जा सकते हैं। जीवन का यह परम सदुपयोग होगा। नैतिकता अवधारणा को उच्च आचरण-व्यवहार में लाकर ही उसकी उपलब्धि की अनुभूति संभव है। आचार संबंधी बातें, व्याख्यानों में तो होती ही रहती हैं।
अच्छे पथ पर अनुसरण तथा गलत रास्ते का त्याग जीवन की प्रथम शिक्षा का मूलमंत्र रहा है। माता-पिता एवं गुरु को देवता समान आदन देने की शिक्षा, नैतिकता की प्रारंभिक सीख है। बचपन के मन में डाले गये संस्कार के बीज फूलन-फलने पर मीठे फल ही देते हैं।
आधुनिक समय की भाग दौड़ और व्यस्तता में नैतिक मूल्यों की बातें सुनने का अवकाश कहां? किन्तु हमारे जीवन में जो इन मूल्यों की धरोहर है उसे नष्ट होने देना ठीक नहीं है, इसीलिए सावधानी से उच्च विचारों, आदर्शों को आचरित करते रहने से ही वे जीवित रह सकते हैं। इससे हम निरंतर अंधकार से आलोक की ओर बढ़ने का मार्ग पायेंगे।
जो जीवन में उत्तम लक्ष्य चुनता है, गलत आदतों के प्रति उदासीन रहता है, सत्य-प्रेम के मार्ग को नहीं छोड़ता उसे कोई भय नहीं रहता और वह अपने लक्ष्य से कभी भटकता नहीं।
नैतिकता का दर्शन आत्म ज्ञान का दर्शन है। इसकी अवधारणायें अनेक हैं किन्तु असल बात है नैतिकतापूर्ण मूल्यों को जीवन में उतारना। मनुष्य को अपने विवेक के अनुसार उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति का अवसर गंवाना नहीं चाहिये। सद्गति के लिये तो यही पथ है।

नर्सरी शिशुओं में तनाव बढ़ाता

कामकाजी महिला एवं व्यस्त गृहिणी शिशु को 2 वर्ष का होने के बाद नर्सरी में भेजकर उसके आगामी भविष्य के लिए निश्चित हो जाता है। यह एक आम धारणा है कि शिशु को जल्द ही नर्सरी भेज देने से वह आगामी दिनों की चुनौतियों एवं प्रतिस्पध्र्दा के लिए जल्द ही सीखकर तैयार हो जाता है किन्तु शिशु को जल्द ही नर्सरी भेजना उसके स्वास्थ्य के जोखिम को बढ़ा सकता है। नर्सरी में उपस्थित सभी बच्चों का शरीर, ताकत एवं बौध्दिक स्तर एक जैसा नहीं होता। यही निबल बच्चों का तनाव बढ़ाता है। वे मां की छाया के अभाव में दुःखी एवं उदास रहने लगते हैं। उन्हें संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। यह सब उसके दिल के खतरों को बढ़ाता है। अतएव यदि संभव हो तो शिशु को अत्यन्त कम उम्र में नर्सरी न भेजें। नर्सरी की सुविधा साफ-सफाई एवं वहां के बच्चों को इत्मीनान से देखकर ही शिशु को नर्सरी भेजिए। घर वापसी में उसके चेहरे एवं भाव को परखिए। यह रायल सोसाइटी के अध्ययन का निष्कर्ष है।

Saturday, February 4, 2012

हंसी से बढ़ाएं दर्द सहने की क्षमता

पैदल चलने एवं सुबह की हवा की भांति हंसने को सौ रोगों की एक दवा कहा गया है। हाल ही में शोधकर्ताओं ने अपने एक शोध में पाया है कि जो ठहाकेदार हंसी हंसता है उसे दर्द की अनुभूति कम होती है। उसमें दर्द सहने की क्षमता बढ़ती है। तनाव एवं अवाद उसके पास नहीं फटकता है।

Wednesday, January 11, 2012

उम्र घाटाती उदासी

बढ़ती महंगाई, बेकारी एवं बेरोजगारी ने आज के वातावरण को उदास बना दिया है। आज देश के लगभग 70 प्रतिशत व्यक्ति उदासी की व्याधि से ग्रसित है। गुमसुम बैठे रहने से व्यक्ति की मनोदशा शनैः शनैः विकृत रूप धारण करती जाती है और वह अपराधी की ओर प्रवृत्त होता जाता है। वैज्ञानिक सर्वेक्षण से भी यह साबित हो चुका है कि उदास रहने से उम्र घटती है। आज के कलुषित वातावरण से उन्मुक्त हंसी गुम होती जा रही है।
ऐसे बहुत मिलेंगे जो उदासी को ओढ़े होंगे। अनेक लोग इस बात को समझ नहीं पाते कि उन्हें अंदर से क्या हो रहा है? बस वे अपने आप को गुमसुम व अकेला महसूस करते हैं। मानव आज बेहद व्यस्त है और ऐसे में वह अपने सामाजिक दायित्वों को निर्वाह कर पाने में भी अक्षम साबित हो रहा है। अपने विचारों के अदान-प्रदान की स्थिति को सदैव अनुकूल बनाये रखने से आप अपनी उदासी को हमेशा के लिए भगा सकते हैं।
निराश एवं उदासी व्यक्ति में मानसिक अशक्तता उत्पन्न कर देती है। युवाओं एवं बुजुर्गों में उदासी अधिक मात्रा में पाई जाती है। युवाओं को रोजगार की चिन्ता, परीक्षा में असफलता एवं प्रेम में असफलता बुरी तरह निराशा कर देते हैं जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य गिरता जाता है तथा वे बुरे कामों एवं व्यसनों में लग जाते हैं।
इसी प्रकार वृध्दों में भी उदासी की भावना अधिक होती है। अधिकांश बुजुर्ग व्यक्ति एकाकी जीवन व्यतीत करते हैं। अकेले रहने से व्यक्ति स्वस्थ चिंतन नहीं कर पाता था तथा उसे मानसिक अवसाद आ घेरते हैं। हाल ही में किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षणों से यह पता चला है कि उदासी, निराशा, एवं हताशा से व्यक्ति की उम्र घटती हैं।
उदास रहने से व्यक्ति का किसी भी कार्य करने में मन नहीं लगता। वह स्वयं को एकाकी महसूस करता है। हर क्षेत्र में उसे नीरसता प्रतीत होती हैं। उसका संबंध खुशी एवं प्रसन्नता से बिल्कुल टूट जाता है। जीना तक बेमानी लगता है। ऐसे में वह क्षणिक उत्तेजना अथवा आवेग के वशीभूत हो या तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता हैं। अथवा स्वस्थ चिंतन के अभाव में वह दर्ुव्यसनों को अपनाकर बुरे कर्मों में लग जाता है।
यदि आपका दिल किसी भी काम में नहीं लगता, यदि आपके कुछ भी अच्छा नहीं लगता, यदि आपको भविष्य की आशा की कोई किरण नहीं दिखाई देती है तो निश्चित ही आपको उदासी ने घेर रखा है। यदि आपकी हंसी गुम हो चुकी है, हंसते, खेलते चेहरे भी अच्छे न लगें, प्यारे व प्रिय व्यक्ति से भी मिलने की इच्छा न हो तो आपको बेहद खतरनाक निराशा, हताशा एवं उदासीनता रूपी मानसिक व्याधियों ने घेर लिया है। यदि आप स्वयं में ये लक्षण पाते हैं तो सावधान हो जायें। आप निम्नलिखित उपायों को अपना कर अपने जीवन को पुनः सरल एवं खुशहाल बना सकते हैं।
नियमित व्यायाम करने से व्यक्ति अपने आपको तरोताजा एवं स्वस्थ महसूस करता है। नियमित व्यायाम तमाम व्याधियों का सरलतम उपचार हैं। डा. राबर्ट एस. ब्राउन के अनुसार ‘व्यायाम से आदमी ऐसे रसायनिक एवं मानसिक परिवर्तन महसूस करता है जिससे वह उत्तरोत्तर मानसिक स्वास्थ्य को प्राप्त करता हैं व्यायाम से रक्त में हार्मोन्स का स्तर बदल जाता है। मनोदशा को प्रभावित करने वाले मस्तिष्क के रसायनिक पदार्थ बीटा एंडर्फिन की मात्रा भी व्यायाम से बढ़ती है।
उदासीनता की मनोदशा में व्यक्ति स्वयं को असहाय, निर्बल एवं हीन भावना से ग्रस्त पाता है लेकिन व्यायाम व्यक्ति में एक विश्वास जगाता है कि वह असहाय नहीं है। व्यक्ति स्वयं को प्रत्येक कार्य के लिए सक्षम एवं चुस्त महसूस करता है। साधारण व्यायाम जैसे दौड़ना, रस्सी कूदना अथवा योगासन करने से आपके शरीर को अधिक से अधिक मात्रा में आक्सीजन मिलती है जो मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। नियमित व्यायाम करने से थोड़े दिन बाद ही आप स्वयं को मानसिक रूप में स्वस्थ महसूस करेंगे।
समस्याओं को सुलझाएंः- कुछ लोग उदासी को दूर करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक दवाओं का प्रयोग करते हैं लेकिन इससे उदासी हमेशा के लिए दूर नहीं चली जाती। उदासी को दूर करने के लिए आपको सतर्कता, समस्या का समाधान एवं सचेष्ट रहने की आवश्यकता होती है। स्वयं को सकारात्मक विचारों से ओत-प्रोत करें। जैसे कि यदि आपके किसी मित्र ने आपको यह कह दिया कि आप फलां कार्य नहीं कर सकते तो स्वयं की मनोदशा को उस कार्य को करने के अनुकूल बनाएं। फिर आप देखेंगे कि दुनिया की कोई ताकत आत्मविश्वास से परिपूर्ण होने पर आपको उदास नहीं बना सकती।
पौष्टिक भोजन कीजिएः- कहा जाता रहा है कि ‘जैसा खाएं अन्न, वैसा रहे मन।’ चिकित्सकों की आम राय है कि हम जैसा भोजन करते हैं, तदनुरूप ही उसका असर हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। विटामिन ‘बी’ एवं अमीनों अम्ल का मानसिक स्वास्थ्य पर विशिष्ट प्रभाव होता है। आमतौर पर देखा जाता है कि संवेदनशील लोगों के भोजन में किसी एक पोषक तत्व की कमी भी दुशिंचताओं से घेर लेती है। वस्तुतः पौष्टिक आहार हमारी मनः स्थिति को उदासी से मुक्त रखता है।
दवाओं का सेवन सावधानी से कीजिए ः- कभी-कभी कुछ दवाइयों के नियमित सेवन के पश्चात उनकी प्रतिक्रिया भी उदासी को जन्म देती है। गर्भ निरोध के लिए खाई जाने वाली दवाएं, दर्दनाशक दवाएं, एंटीबायोटिक दवाएं हाईब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने वाली दवाओं आदि के प्रतिक्रिया स्वरूप भी उदासी का प्रभाव बढ़ सकता है।
मानसिक अवसाद बढ़ने से आप में उदासी की भावना घर कर सकती है। इस कारण आपको निराशा, हताशा चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, किसी काम में दिल न लगना, एकाग्रता का भंग हो जाता है, आत्महत्या जैसे हीन विचारों का अनुभव हो सकता है।
यदि ये लक्षण आपको स्वयं में नजर आएं तो आप उपर्युक्त बातों पर विशेष ध्यान दें तथा शीघ्र ही अपने चिकित्सक से परामर्श लें। यकीनन इससे आपकी उदासी दूर हो जाएगी और आप स्वयं को स्वस्थ महसूस करेंगे। फिर आपको सब कुछ सामान्य एवं अच्छा लगने लगेगा।

Saturday, August 27, 2011

कमिटमेंट में कमी: रिश्तो की हत्या

आज के हमारे युवाओं को न तो भविव्य की तनहाइयों की फिक्र है, न हीं जिंदगी की वीरानियों की परवाह, क्योकि वो आज में जीता है। इसी सोच के चलते वो रिश्तों की अहमियत को इस कदर नजरअंदाज कर रहा है। यही वजह है कि न अब रिश्ते टिकाऊ होते है, न ही होता है उनमें कमिटमेंट। किसी भी रिश्ते की बुनियाद होती है प्यार और विश्वास। यदि ये दोनों ही चीजें रिश्ते में न हो, तो वो रिश्ता महज समझौता बनकर रहा जाता है। आज हम जिस तेजी से रिश्ते बनाते है, उसे तेजी से उन्हे तोड भी देते है, क्योकि रिश्ते बनाते समय हमें खुद ही नहीं पता होता है कि आखिर ये रिश्ता कब तक टिकेगा। पिछले 10 सालों में तलाक के मामले कुछ शहरों में दोगुने हो गए तो कही-कही इनमें तीन गुना बढोत्तरी हुई है। जहां 90 के दशक में तलाक के औसतन 1000 मामलें हर साल सामने आते थे, वहीं अब ये संख्या बढकर 9000 हो गई है। अधिकतर मामलों में सामंजस्य की कमी या पार्टनर की बेवफाई को ही तलाक का आधार बनाया गया। बदलती लाइफस्टाइल, बढती प्रोफेशनल आकांक्षाएं, न्यूक्लियर फैमिली, रिश्तों में बढती अपेक्षाए ही इन बढती तलाक दरों की मुख्य वजहें हंै। आज महिलाएं भी तलाक की पहल करने में पीछे नहीं है। अगर रिश्ते में जरा-सी भी कमी या अनबन नजर आती है, तो बयाय कोई समाधान निकालने के तलाक को ही अपनी आजादी का आसान रास्ता मानकर लोग रिश्ते तोडने में हिचकते नहीं। अपनों का साथ, प्यार का एहसास जिंदगी को खुशनुमा बना देता है, जीवन में थोडी-बहुत तकरार भी जरूरी है, इसी का नाम तो जिंदगी है, वक्त रहते जिंदगी को संभाल लिया जाए तो बेहतर है, वरना ऎसा न हो कि हम जब गिरे, तो कोई थामनेवाला ही न हो, हम जब रोएं तो किसी का कंधा सिर रखने के लिए न हो।
कारण:
1. अपने तरीके से जिंदगी जीना - अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का फॉर्मूला इन दिनों बहुत फैशन में है, ऎसे में कमिटमेंट्स की उम्मीद किए जाने पर यही सुनने को मिलता है कि इट्स माई लाइफ, मुझे अपने ढंग से अपनी जिंदगी जीने की आजादी चाहिए।
2. प्राइवेसी- आज के युवा अपनी लाइफ में प्राइवेसी चाहते हैं, अपने लाइफ पार्टनर से भी। रिलेशनशिप में स्पेस जरूरी होता है, लेकिन इस शब्द को मात्र अपने गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के लिए बचाव के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाने लगा है। अपने पार्टनर से चंद सवाल करने का मतलब यह लगाया जाता है कि आप उसे स्पेस नहीं दे रहे, उसकी प्राइवेसी से दखलअंदाजी कर रहे है।
3. एक्स्पेक्ट मोर- आजकल पहले ही एक दूसरे को यह साफ तौर पर कह दिया जाता है कि मुझसे ज्यादा उम्मीद मत रखना, मैं तुम्हारे लिए खुद को नहीं बदलूंगा/बदलूंगी।
4. कमिटमेंट फोबिया - कहते है कुछ लोग कमिटमेंट से डरते है, शायद उन्हें अपने प्यार व रिश्ते पर इतना भरोसा ही नहीं होता कि वो टिक पाएंगा या यूं कह ले कि कुछ लोग इतने मनचले होते है कि एक ही रिश्ते पर टिके रहना उनके बस की बात नहीं।
5. एक रिश्ते में न टिक पाना- एक ही रिश्ते पर पूरी उम्र बिता देने का दौर अब बीत चुका। ऎसे लोगों को अब इमोशनल फूल्स कहा जाता है। रिश्तों को बचाने की बात तो दूर, ठीक से बनने से पहले ही ये बात साफ हो जाती है कि अब तब ठीक लगेगा, साथ रहेंगे, वरना अपने अपने रास्ते।
6. प्रैक्टिकल - रिश्तों में प्रैक्टिकल होना आज जरूरी हो गया है। लोग सोचते है कि आगे बढना है तो प्रैक्टिकल होना जरूरी है। भावनाओं में उलझे रहेंगे, तो जिंदगी उलझ जाएगी। बदलते दौर के साथ नहीं बदलेंगे तो पीछे रहे जाएंगे।
उपाय:
1. बातचीत - किसी भी रिश्ते के लिए यह सबसे पहला और जरूरी स्टेप होता है। बिना बातचीत के रिश्तों में खालीपन आ जाता है। अगर कोई नाराजगी है, शिकायत है तो कहिए, चुप मत रहिए।
2. आदर - आपके मन में अपने पार्टनर के प्रति आदरभाव होना चाहिए। भले ही आप कितने भी बेतकल्लुफ हो एक दूसरे से, लेकिन एक दूसरे के प्रति रिस्पेक्ट बनी रहनी चाहिए। जिस व्यक्ति का आप सम्मान नहीं कर सकते, उससे प्यार कब तक कर पाएंगे।
3. एक बार सोचें - अगर आपके रिश्ते में कोई प्रोब्लम चल रही है तो तैश में आकर कोई फैसला न लें। हो सकता है कुछ समय के लिए आपको रिश्ता बंधन लग रहा हो, लेकिन एक बार शांत मन से दोबारा सोचें कि क्या वाकई ऎसा है। क्या वाकई कहीं कोई गुंजाइश नहीं बची है रिश्तें मेंक् हर हाल में रिश्ते को थोडा समय दे।
4. रोमांस - कभी-कभी समय की कमी और कई कारण से रिश्ता बोझिल हो जाता है, ऎसा न होने दे। प्यार है, तो प्यार का इजहार समय-समय पर करते रहे, पैशन को जिंदा रखने के लिए जरूरी उपाय करते रहे। बाहर जाए, मूवी देखे, पार्टी करे या किसी शांत जगह जाकर तनहाई का मजा ले और रोमांस करे।
5. विश्वास - हर रिश्ता विश्वास पर टिका होता है। आपको अपने साथी पर विश्वास करना चाहिए। अगर आपके रिश्ते में विश्वास नहीं होगा तो आप चाहकर भी एक दूसरे के करीब नहीं आ पांएगे। विश्वास के बिना कोई भी रिश्ता नही टिक सकता। किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले एक मौका जरूर दे।
6. दोस्त बनें - अगर आपको लगता है कि आपका पार्टनर आपसे खुलकर बात नहीं कर पा रहा है या फिर वह आपसे बात करने में झिझकता है तो आप उससे दोस्तों की तरह व्यवहार करें।दोस्ती का रिश्ता एक ऎसा रिश्ता होता है, जहां हम खुद को आजाद समझते है। वो हमारे लिए बंधन नहीं होता, तो अपने रिश्ते में भी वहीं दोस्ताना अंदाज लाएं, जहां रिश्ता बंधन लगे ही न और अगर लगे भी तो ऎसा बंधन, जिससे आप ताउम्र बंधे रहना चाहे।
7. पार्टनर को समझें - हर किसी को यही लगता है कि वही सही है सामने वाला गलत है। लेकिन किसी भी बात का फैयला करने से पहले आप ठंडे दिमाग से सोचे। हो सकता है आपका पार्टनर भी अपनी जगह पर सही हो। हर स्थिति को सामने वाले के नजरिए से भी देखें और उसके बाद ही कोई राय बनाएं। यूं भी हर व्यक्ति अलग होता है, उसकी सोच एकदम हमारे जैसी नहीं हो सकती, तो उससे इतना ज्यादा बदलने की उम्मीद करने से बेहतर है उसके अपने अलग व्यक्तित्व को स्वीकारे। दो अलग सोच रखने वाले लोग भी मिलकर एक अच्छी और कामयाब जिंदगी जी सकते है।
8. आरोप-प्रत्यारोप - आरोप लगाने से कभी किसी रिश्ते में मजबूती नहीं आती। वो मात्र आपके ईगो को संतुष्ट कर सकता है। खुद को सही साबित करने के लिए बहस करने की बजाय आगे किस तरह से समझदारी से अपने रिश्ते को मजबूत बनाया जाए। इस पर विचार होना चाहिए। कोई एक झुक जाए, माफी मांग ले, तो इसमें बुरा ही क्या है।
9. अहंकार को दूर करें - स्वाभिमान और अहंकार में बहुत फर्क होता है। इस फर्क को समझकर अपने रिश्ते को बचाने की कम से कम एक कोशिश तो करे। ईगो को स्वाभिमान का नाम देकर अपने अहं की तुष्टि के लिए रिश्ते को खत्म करने की गलती न करे।
10. रिश्तों की अहमियत को समझें - आप कितने ही प्रैक्टिकल हो, लेकिन जीवन में किसी मोड पर एक साथी, एक हमसफर की जरूरत जरूर महसूस होती है। जीवन का ये सूनापन फिलहाल ग्लैमरस लाइफस्टाइल और आर्थिक कामयाबी के बीच नजर न आ रहा हो, लेकिन कहीं ऎसा न हो कि जब ये अकेलापन नजर आने लगे, तब तक देर हो चुकी हो।