Wednesday, December 15, 2010

अहंकार एक मनोरोग है

हमारा समाज जिस तीव्रता से प्रगति व आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर है, उसका प्रभाव मानव-मस्तिष्क पर भी पड़ा है। आज हर व्यक्ति में 'ईगो' की भावना पनाप रही है। ईगो यानी अहम् व 'स्वाभिमान' का वास्तविक अर्थ अब अहंकार बन चुका है।
अहंकार, कभी धन, कभी शिक्षा, तो कभी सौंदर्य और वैभव आदि के रूप में मानव के हृदय में इस कदर समा चुका है कि व्यक्ति जाने-अनजाने दूसरे का अनादर कर बैठता है।
अहंकारी व्यक्ति को लगता है कि सारी दुनिया उसी के अनुसार चल रही है तथा वह जो चाहे, पल भर में हो सकता है। वह हर समय अपने झूठे गर्व भरे मार्ग पर चलता रहता है भले ही इससे किसी का अहित हो, लेकिन उस पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। उसका एकमात्र उद्देश्य अपनी कल्पनाओं व अहम् की उड़ान भरना होता है।
अहंकार के शिकार लोगों का मानना है कि वही संसार के सर्वेसर्वा हैं। वे हर समय, हर किसी के समक्ष अपने छोटे-छोटे कारनामों को भी बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। ऐसा करने के पीछे उनकी यही मानसिकता होती है कि वे अत्यंत महान और आत्मविश्वासी हैं और सहज ही किसी को अपनी ओर आकर्षित करने की कला में पारंगत हैं जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे लोग मात्र मुंह के शेर होते हैं। उनके मन में किसी कोने में यह आत्मबोध भी छुपा होता है कि वे डरपोक और कमजोर है और अपनी इसी खामी को छुपाने के लिए वे अपनी झूठी तारीफों के पल बांधते हैं।
यद्यपि अहंकार और अहं भाव में काफी अंतर है तथापि आज अपने बढ़ते महत्व को देखते हुए अहंकार ने अहंभाव को भी अपना दाल बना लिया है। धन, पद, विद्या, रूप, बल व सौंदर्य आदि में पारंगत होना कोई बुरी बात नहीं और इसमें भी कोई बुरी बात नहीं और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि इन सभी गुणों से युक्त व्यक्ति का स्वाभिमान और सर्वयुक्त स्वभाव उसे दूसरों से उच्च रखता है लेकिन इस स्वाभिमान व गर्व को अहंकार में बदल देना वाकई निंदनीय है।
सही मायनों में इन सभी गुणों में वास्तविक प्रवीण वह व्यक्ति है जो इनका उपयोग समाज के हित और उन्नति में करते हैं। जिस प्रकार सूर्य व चन्द्रमा अपनी रोशनी व शीतलता प्रकृति को बांटते हैं धरती अपना सारा अन्न जीवों को बांटती है, उसी प्रकार व्यक्ति को अपने गुण समाज को समर्पित कर देने चाहिए।
अहंकार की विस्तृत विवेचना की जाये तो यही सार निकलता है कि अहंकार का अर्थ है भौतिक वस्तुओं एवं शारीरिक क्षमताओं व उपलब्धियों पर इतराना मात्र। अहंकारी व्यक्ति यह भूल जाता है कि अहंकार एक असत्य और झूठ जिसका कोई अस्तित्व नहीं। वह अकेला है, उसके साथ संसार नहीं होता। सभी सत्य के साथ होते हैं। मधुर वाणी सभी को मोहित कर लेती है तथा सहृदयी व्यक्ति अपने गुणों से सभी के हृदय पर राज कर सकता है, तो फिर अहंकार का मूल्य क्या है, केवल शून्य!
बलशाली, धनवान, ज्ञानवान और जनप्रिय व्यक्ति के पास जब इतने अमूल्य गुण हैं तो उसके हृदय में अहंकार का काम क्या? उसे अहंकार से ग्रसित होने से क्या फायदा और यदि वह फिर भी अहं का दास बनता है तो इसका मतलब है कि इन गुणों को उसने पूरी तरह प्राप्त नहीं किया और यदि कर लिया है तो अहंकार उन सभी को शीघ्र नष्ट कर देगा। एक शायर ने इसी संदर्भ में कितना सुंदर व सटीक शेर कहा है-
जो माहिर होते हैं, फन में, उछलकर वो नहीं चलते।
छलक जाता है पानी, कायदा है ओछे बरतन का॥
मनोचिकित्सिकों का मानना है कि अहंकार एक प्रकार से मानसिक रोग है, जो मानव की मानसिक विषमता से पनपता है। इसके पीछे घृणा, वैर और अत्यधिक उपलब्धियों का सहयोग होता है।
एक अन्य अध्ययन के अनुसार यदि अहंकार का की प्रवृत्ति पर ध्यान दिया जाये तो पता चलता है कि अहंकार के प्रमुख कारक शारीरिक बलिष्ठता, धन व सौंदर्य आदि क्षणिक मात्र है अर्थात् शारीरिक बलिष्ठता पर अहंकार करना आपराधिक प्रवृत्ति है।
धन पर अहंकार करना लोभी होने का इशारा करता है और सौंदर्य पर गर्व करने से वासना का उपासक होने का संकेत मिलता है। इन भौतिक संपदाओं पर कैसा अहंकार करना, जब यह इस शरीर के साथ यही समाप्त हो जायेंगी।
अहंकार व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ता नहीं बल्कि रिश्ते बिखेर देता है और यदि कुछ देता है तो सिर्फ आपसी वैमनस्य, घृणा, कुंठा व रंजिशें, अत: अपने गुणों पर गर्व करें लेकिन अहंकार नहीं। उन्हें दूसरों के हित में उपयोग करें न कि अपनी ही तारीफें बटोरने हेतु।

Thursday, December 9, 2010

मानसिक सदमे से बचें

जीवन में किसी चीज से मोह, लगाव या आशा न होने पर क्या जीना संभव है? बिल्कुल नहीं। कहने की बात है कि व्यक्ति को कमल के पत्ते पर बूंद की भांति निर्लिप्त रहकर जीना चाहिए।
मोह पर व्यक्ति को होता है और कितनी हो चीजों, बातों व व्यक्तियों से होत है। इनका छिन जाना तो दुःखदायी है ही, किसी व्यक्ति चाहे वह बेटा-बेटी, पति-पत्नी, मित्र कोई भी हो सकता है जिससे आपको लगाव हो, ऐसे व्यक्ति का बिछुड़ना सभी को मानसिक कष्ट देता है। इस सदमे से लगभग सभी को गुजरना पड़ता है। जिनमें इनर पावर मजबूत होती है वे इस दुःख से जूझने की पुरजोर कोशिश करते हैं सफल भी हो जाते हैं, लेकिन अत्यन्त संवेदनशील लोग टूटकर बिखरने लगते हैं व जीवन से विरक्त हो जाते हैं।
ऐसे में उन्हें जरूरत होती है सही मार्गदर्शन की, सच्ची सहानुभूति की व एक विलॉस्कर एंड गाइड की। जो उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें उसे मांजने चमकाने की सही राय दे सके। यह स्त्री-पुरुष कोई भी हो सकता है।
मोहाच्छन्न होने पर शॉक लगने जैसी स्थिति हो जाती है। विश्वास का टूटना, बेरोजगारी, बेरोजगारी, गिरती सेहत, असफलता, सास-बहू का तालमेल न बैठना, पति-पत्नी का आशाओं पर खरा न उतरना, संतान का नालायक निकलना ये सब स्थितियां शॉकिंग होती हैं। जिसेक लिए कोई भी पहले से तैयार नहीं होता। आधुनिकता के नाम पर समाज में आई बुराइयों ने आज जरूर व्यक्ति को कई बातों को लेकर शॉक प्रूफ कर दिया है, लेकिन फिर भी जैसा कि पहले कहा गया है सब्जबाग न हों अगर जीवन में तो जीना संभव नहीं होगा, क्योंकि जीने के लिये यही सहारा है। क्या होता है जब-जब कोई मित्र पीठ में छुरा भौंक दे, पति-पत्नी बेवफाई करने लगें, बेट, मां-बाप का शत्रु बन जाये। बेटी के कारनामें मां-बाप को समाज में मुंह दिखाने के काबिल न छोड़ें, तब व्यक्ति अवसाद में धिरकर टूट जाता है। उसकी जिन्दगी में जानलेवा ठहराव आजाता है, जिससे उसका व्यक्तित्व कुंठित होने लगता है। ऐसे में कई बार व्यक्ति आत्महत्या तक कर बैठता है या करने की नाकाम कोशिश करता है। मोहाच्छन होने की स्थिति में देखा जाए तो हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है। यह उसकी फितरत पर निर्भर होता है। पुरुष नशाखोरी या वेश्यावृत्ति की ओर कई बार ऐसी स्थिति में कदम बढ़ाने लगते हैं। युवतियां घर से भाग सकती हैं या सहानुभूति दिखाकर गलत राह पर डालने वालों के बहकावे में आकर जीवन तबाह कर लेती हैं, क्योंकि दिल टूटने से उनका मनोबल भी टूट जाता है और ऐसे में वे इतनी कमजोर हो जाती हैं कि किसी भी गलत आदमी के लिये उनका शोषण करना आसान हो जाता है।
इस तरह से व्यथित लोग आम जिन्दगी (स्ट्रीम आफ लाइफ) से कटकर कई बार पागलपन की कगार तर पहुंच जाते हैं, कभी दिमागी संतुलन खो बैठते हैं। निःसंदेह ऐसे लोगों को मदद की सख्त जरूरत होती है। इसी बात को मद्देनजर रखते हुए चंडीगढ़ में ब्रोकन हार्ट, पुनर्वास संस्था की स्थापना हुई है। इसका उद्देश्य जीवन से निराश लोगों के अन्दर छिपे गुणों को विकसित कर उन्हें समाज की मुख्य धारा में फिर से शामिल करने का प्रयास करना है। इस प्रयास में ये सफलतापूर्वक कार्य करते हुए असंख्य लोगों की मदद कर चुकी है। ऐसी कई संस्थाएं देश भर में स्थापित होनी चाहिए।

Friday, November 5, 2010

तनाव का उपचार-आध्यात्मिक जीवन

तनाव आधुनिक युग का अभिशाप है। यह जीवन पध्दति का एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है। यह दीमक की तरह अंदर से शरीर और मन को खोखला करता रहता है। तनाव के अनेक कारण एवं प्रकार हो सकते हैं किन्तु इसका मुख्य कारण है परमात्मा पर अविश्वास तथा मन:स्थिति और परिस्थिति के बीच सामंजस्य न होना। इसका शरीर और मन पर इतना दबाव पड़ता है कि हार्मोन और जैव रसायनों का संतुलन तार-तार हो जाता है। परिणामस्वरूप शारीरिक स्वास्थ्य एव मानसिक सुख-संतुलन क्रमश: क्षय होने लगते हैं और जीवन तरह-तरह के कायिक एवं मनोरोगों से ग्रसित होकर नारकीय यंत्रणा एवं संताप से भरने लगता है। 'इनसाइक्लोपीडिया आफ अमेरिकाना' के अनुसार सर्वप्रथम हैंस सेली ने तनाव (ीींीशीी) शब्द का प्रयोग किया। द्वितीय विश्व युध्द के दौरान इस शब्द का काफी प्रचलन हुआ। सेली के अनुसार, तनाव मन:स्थिति और परिस्थिति के असंतुलन से उठा एक आवेग है। इसकी दाहक क्षमता अप्रत्यक्ष और अति खतरनाक होती है। द्वितीय विश्वयुध्द के दौरान विषम परिस्थितियों के रहते इसके भयंकर परिणाम व्यापक स्तर पर देखे गये और यह विषय वैज्ञानिक शोध-अनुसंधान के दायरे में आ गया।
अव्यवस्था और विसंगतियां
दो अमेरिकी मनोचिकित्सक थामस एच.होलेमस और रिचर्ड राडे ने तनाव के विषय पर व्यापक शोध-अनुसंधान किया। इन्होंने पाया कि व्यक्तिगत जीवन की अव्यवस्था तथा विसंगतियों के कारण 53 प्रतिशत गंभीर तनाव उत्पन्न होते हैं। इन्होंने विविध तनावों के मापन की 'स्केल' भी निर्धारित की, जिसके अनुसार तलाक से 63 प्रतिशत, मित्र या संबंधित परिजन की मौत से 36 प्रतिशत, बेरोजगारी से 56 प्रतिशत तनाव होता है। उनके अनुसार तनाव की गंभीरता में व्यक्ति मानसिक संतुलन खो बैठता है और यदि मनोबल दुर्बल है तो आत्महत्या जैसे जघन्य दुष्कृत्य तक कर बैठता है। पश्चिमी देशों में 55 से 80 प्रतिशत लोग तनावजन्य रोगों से पीड़ित हैं और अपनी बढ़ी-चढ़ी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये उन्हें कई प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं से गुजरना पड़ता है। उसमें तनिक भी असफलता नकारात्मक सोच एवं तनाव को जन्म देती है। इसी तरह अप्राकृतिक आहार-विहार एवं अति औपचारिक आचार-व्यवहार भी तनाव को जन्म देते हैं। साथ हीर् ईष्या, द्वेष, संदेह, दंभ जैसे मनोविकार तनाव के अन्य महत्वपूर्ण कारण हैं। इस तरह आज तथाकथित विकास की भागती जिंदगी में तनाव जीवन का अनिवार्य घटक बन गया है। यह तनावरूपी अभिशाप किस तरह मन एवं मस्तिष्क की सूक्ष्म संरचना को प्रभावित कर गंभीर एवं असाध्य रोगों का कारण बनता जा रहा है, इसका अपना विज्ञान है, जिस पर शोधकर्ता गंभीर अनुसंधान कर रहे हैं। हैंस सेली के अनुसार, तनाव की प्रक्रिया को तीन अवस्थाओं में समझा जा सकता है। प्रथम अवस्था में, एड्रीनल कार्टेक्स में तनाव की सूचना का संप्रेषण होता है। दूसरी अवस्था में लिंफेटिक तंत्र की सक्रियता द्वारा शरीर में उत्पन्न इस अप्रिय स्थिति के प्रति संघर्ष छेड़ा जाता है। इसमें प्रतिरक्षा प्रणाली के अंतर्गत आने वाले थाइमस व स्पूलीन प्रमुख कार्य करते हैं। तीसरी अवस्था में तनाव की अधिकता पूरे मनोकायिक तंत्र को अपने नियंत्रण से ले लेती है। इस कारण शरीर व मन में थकान तथा गहन उदासी के लक्षण स्पष्ट परिलक्षित होते हैं।
तनाव की चार अवस्थाएं
कर्टसीन ने सेरिब्रल कार्टेक्स में तीन तरह के मस्तिष्क खंडों का वर्णन किया है, मेंटल ब्रेन, सेमेटिक ब्रेन तथा विसरल ब्रेन। सोमेटिक ब्रेन मांसपेशियों को तथा विसरल ब्रेन 'आटोनॉमिक नर्वस सिस्टम' को नियंत्रित करता है। मेंटल ब्रेन फ्रंटल लोब से परिचालित होकर समस्त विचार व चेतना तंत्र को नियमित व संचालित करता है। सामान्यतया इन तीनों मस्तिष्क खंडों का आपस में अच्छा अंतर्संबंध रहता है। तनाव इनके बीच असंतुलन पैदा कर देता है और यहीं से मनोकायिक रोगों की शुरुआत हो जाती है।
इस संदर्भ में तनाव को चार अवस्थाओं में विश्लेषित किया गया है, साइकिक फेज, साइकोसोमेटिक फेज, सोमेटिक फेज तथा आर्गेनिक फेज। साइकिक फेज में व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान रहता है तथा इस दौरान केंद्रीय तंत्रिका तंत्र अति क्रियाशील हो उठता है। रक्त में एसिटील कोलाइन की मात्रा बढ़ जाती है। इसकी अधिकतम मात्रा मस्तिष्क के काडेट नाभिक में तथा न्यूनतम सेरीविलम में होती है। मस्तिष्कीय क्रियाकलापों के आधार पर इसमें उतार-चढ़ाव आता रहता है। तनाव सर्वप्रथम मस्तिष्क पर दबाव डालता है और एसिटील कोलाइन का स्राव बढ़ जाता है। इससे उद्विग्नता, अति उत्साह, चिंता व अनिद्रा जैसे विकार पैदा हो जाते हैं। यह अवस्था कुछ दिनों से कुछ महीनों तक चलती है। यदि यह स्थिति और लंबी हुई तो यह साइकोसोमेटिक अवस्था में परिवर्तित हो जाती है। इस अवधि में हाइपरटेंशन, कंपकंपी तथा हृदय की धड़कन बढ़ जाती है।
सोमेटिक फेज में कैटाकोलामाइंस अधिक स्रवित होता है। कैटाकोलामाइंस में तीन हार्मोन आते हैं, एडेनेलीन नार एड्रेनेलीन तथा डोपालीन। तनाव से इन हार्मोन के स्तर में वृध्दि हो जाती है। नशे का प्रयोग भी इनकी मात्रा को बढ़ा देता है। तनाव का प्रभाव मनुष्य ही नहीं पशुओं में भी देखा गया है। तनाव से प्रभावित पशुओं के मूत्र परीक्षण में एड्रेनेलीन की मात्रा 2 से 3 नानोग्राम प्रति मिनट तथा नार एड्रेनेलीन 6 से 10 नानोग्राम प्रति मिनट पाई गयी। सर्दी, गर्मी, दर्द आदि से उत्पन्न तनाव में नार एड्रेनेलीन का स्राव बढ़ जाता है। इससे पेशाब के समय जलन होती है। आर्गेनिक फेज, तनाव की अगली अवस्था है। इसमें तनाव शरीर की प्रतिरोधी क्षमता पर बहुत बुरा असर डालता है। तनाव इस अवस्था में आकर मधुमेह, अस्थमा तथा कोरोनरी रोग का रूप धारण कर लेता है। इस दौरान डोपालीन के बढ़ने से व्यवहार में भी गड़बड़ी पायी गयी है।
बाहरी परिस्थितियों की उपज
इसके अलावा भी अनेक ऐसे हार्मोन हैं, जो तनाव से सीधा संबंध रखते हैं। सिरोटीनिन मस्तिष्क की तीन क्रियाओं को संचालित करता है, निद्रा, अनुभव तथा तापमान। तनाव से इसका स्तर बढ़ जाता है। फलस्वरूप अनिद्रा, भूख काम लगना तथा शरीर के तापमान में वृध्दि हो जाने की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। हिस्टामीन शारीरिक विकास तथा प्रजनन में मुख्य भूमिका निभाता है। तनाव की अधिकता इसमें भी व्यक्तिक्रम डालती है। तनाव मुख्य रूप से श्रवणेद्रियों तथा आंखों के माध्यम से मस्तिष्क के सेरिब्रल कार्टेक्स तक पहुंचता है तथा वहां से समस्त शरीर में प्रसारित होता है। पेप्टिक अल्सर, गठिया, दिल का दौरा, मधुमेह आदि बीमारियां इसी के दुष्परिणाम हैं। द्वितीय विश्वयुध्द में युध्द प्रभावित क्षेत्रों में पेप्टिक अल्सर तथा हाइपरटेंशन की अधिकता पाई गयी थी। यह स्थिति बाढ़, भूकंप तथा अन्य प्राकृतिक प्रकोपों से प्रभावित प्रदेशों में भी देखी गयी है। इसके मूल में तनाव को ही जिम्मेदार माना गया है।
इस तरह की आपात परिस्थितियों में तनाव की अपरिहार्यता अपनी जगह है किन्तु जीवन की सामान्य स्थिति में भी तनाव को पूरी तरह बाहरी परिस्थितियों की उपज मानना, तनाव के उपचार के रहस्य से वंचित रह जाना है, क्योंकि तनाव पारिस्थितियों से अधिक मन:स्थिति पर निर्भर करता है। तनाव को बाहरी परिस्थितियों की उपज मानने के कारण ही हम प्राय: उसके उपचार के लिये दवाइयों पर निर्भर रहने की भूल करते हैं, जबकि कोई भी दवा तनाव से उत्पन्न बीमारी को ठीक करने में सफल नही हो सकती। तनाव से न्यूरान व हार्मोन तंत्र बुरी तरह से प्रभावित होता है। तनाव के उपचार के लिये ली गयी दवा, हार्मोन की अतिरिक्त मात्रा को तो नियंत्रित कर लेती है किन्तु ग्रंथि पूर्ववत् ही बनी रहती है और दवा का असर कम होते ही ग्रांथियां पुन: हार्मोन का अत्यधिक स्राव करने लगती हैं तथा रोगी की स्थिति और भी चिंतानजक हो जाती है। अत: तनाव का उपचार मात्र चिकित्सकीय औषधियों द्वारा संभव नहीं है। इसके लिये रोगी को स्वयं अपना चिकित्सक बनना होगा, तभी इसका प्रभावी उपचार हो सकेगा। और इसके लिये आवश्यक है, प्राकृतिक आहार एवं नियमित दिनचर्या, सदचिंतन एवं उदात्त भावनाएं। इसे अपनाकर व्यक्ति तनावजन्य विषाक्त परिस्थिति को क्रमश: तिरोहित करते हुए सुख-शांति से भरी-पूरी स्वर्णिम, परिस्थितियों का निर्माण कर सकता है।
परिस्थितियों से तालमेल जरूरी
इस संदर्भ में कुछ आधारभूत बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। हर व्यक्ति अपने विचारों व भावनाओं में जीता है। उसकी अपनी अच्छाइयां व बुराइयां होती हैं। इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिये कि कहीं हमारी बातों एवं व्यवहार से उसकी भावनाएं तो आहत नहीं हो रही हैं, विचारों को तो चोट नहीं पहुंच रही है। अगर ऐसा हुआ तो वातावरण तनाव के कसैलेपन से भर उठेगा और व्यक्ति तनवग्रस्त हो जायेगा। अत: हमारा व्यवहार ऐसा हो जो किसी के मर्म बिंदु को न छुए। बुराई को सार्वजनिक करने का तात्पर्य है- कीचड़ उछालना। बुराई को रोकने के लिये व्यक्ति को अकेले में प्रेमपूर्वक समझना चाहिये। इसी में इसका समाधान है। कहीं भी व्यक्तिगत तौर पर प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उलझना बुध्दिमानी नहीं है। परिस्थितियां अपनी जगह हैं और व्यक्ति अपनी जगह। परिस्थितियों से तालमेल एवं सामंजस्य बैठाकर आगे बढ़ने में ही समझदारी है। परिस्थिति से तालमेल न बैठा पाना ही तनाव को जन्म देता है। अत: इनसे पलायन नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समझौता ही एकमात्र निदान है।
इस संदर्भ में व्यक्ति का दृढ़ मनोबल एवं सकारात्मक मनोभूमि अपनी निर्णायक भूमिका निभाती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दृढ़ मनोबल वाले व्यक्ति पर तनाव का प्रभाव अधिक नहीं होता है। 'स्ट्रेस एंड इट्स मैनेजमेंट बाई योगा' नामक सुविख्यात ग्रंथ में के.एन. उडुप्पा, तनावमुक्ति के लिए विधेयात्मक विचारों को अपनाने पर बल देते हैं। वे इसके लिये अनेक प्रकार की यौगिक क्रियाओं का भी सुझाव देते हैं। उडुप्पा ईश्वर पर आस्था को तनावमुक्ति का सर्वश्रेष्ठ व असरदार उपचार मानते हैं। इनका कहना है कि ईश्वर विश्वासी को तनाव स्पर्श नहीं करता है। यह सत्य है कि ईश्वर पर आस्था और विश्वास का मार्ग तनाव के तपते मरुस्थल से दूर शांति के प्रशांत समुद्र की ओर ले चलता है। ईश्वरनिष्ठ व्यक्ति विषम से विषम परिस्थिति में भी तनावरूपी व्याधि को पास फटकने नहीं देता। कबीरदास विपन्न आर्थिक स्थिति में भी अपनी फकीरी शान में मगन रहते थे। मीराबाई अनेक लांछनों एवं अत्याचारों के बावजूद अपने कृष्ण में लीन रहती थी। घोर पारिवारिक कलह के बीच भी तुकाराम की मस्ती में कोई कमी नहीं आती थी। क्रूस पर चढ़ने वाले ईसा, जहर का प्याला पीने वाले सुकरात को परमात्मा पर अगाध और प्रगाढ़ विश्वास था। उनको तनाव स्पर्श तक नहीं कर पाया था। वस्तुत: दाहक व दग्ध तनाव ईश्वर को प्रेमरूपी शीतल जल का स्पर्श पाते ही वाष्प बनकर उड़ जाता है। अत: व्यक्ति को नित्य आत्मबोध एवं तत्वबोध का चिंतन तथा भगवद् भजन करना चाहिये। शिथिलीकरण एवं प्राणायाम जैसी सरल यौगिक क्रियाओं का भी अनुसरण किया जाता है। इन्हीं उपायों से मन को शांत कर तनाव से मुक्त हो पाना संभव है। अत: ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से जिया गया आस्था एवं श्रध्दापूर्ण जीवन और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार ही तनावरूपी महाव्याधि के उपचार का एकमात्र प्रभावी उपाय है।

Sunday, October 31, 2010

बच्चों को तनावमुक्ति का परिवेश दें

मासूम चेहरे की उदासी दु:ख, तनाव तथा चिड़चिड़ेपन को प्रकट करती है। बच्चों के कोमल मन पर परिवेश का सीधा असर पड़ता है। घर आंगन में गूंजती बच्चों की किलकारी डर से चुप हो जाती है जिससे उनका मानसिक तनाव बढ़ता है।
बच्चों के मन पर घर के परिवेश का असर सदा ही बना रहता है और उनके विचारों को प्रभावित करता है। जहां पर पति-पत्नी नौकरी करते हैं, वे अपने बच्चों को बहुत कम समय दे पाते हैं। थके, हारे पति-पत्नी घर लौटते हैं तो वातावरण तनाव से परिपूर्ण होता है। इसी कारण आपसी कलह क्लेश झगड़े का रूप धारण कर लेता है जिसे बच्चे देखते हैं।
कुछ पिता ऐसे भी हैं जो दफ्तर से लौटते वक्त नशे में चूर होकर आते हैं। यदि बच्चे कॉपी, पेंसिल कुछ मांगते हैं उन्हें बदले में मारपीट मिलती है। ऐसे परिवेश में बच्चों की कोमल भावनाएं बहुत आहत होती हैं। यदि बच्चों के हंसने-खेलने पर रोक लगा दी जाये तो वे तनाव और घुटन भरे परिवेश में जीवन गुजारते हैं।
कुछ बच्चे माता-पिता की नियमित पिटाई को सहते हुए दब्बू एवं डरपोक बन जाते हैं। वे जीवन में सदा ही असफल होते जाते हैं। यदि बच्चों को हर समय प्रताड़ित किया जाता है तो वे सदा के लिए हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। रिश्तेदारों एवं मित्रों के सामने लज्ज्ाित करना बच्चों में तनाव के रोग को जन्म देता है।
अक्सर तनावयुक्त बच्चे सहमे-सहमे से अलग ही बैठे नजर आयेंगे। कुछ बच्चे नाखूनों को डर के मारे चबाना शुरू कर देते हैं। देखने में आया है कि हाफपैंट में भी बच्चे पेशाब कर देते हैं। ऐसा ही दबाव किशोरावस्था में बना रहता है। बच्चों के मन में दूसरों की तारीफ सुनकर चिढ़ होती है। उनके आत्म सम्मान को ठेस लगती है। यदि उन्हें कोई प्रोत्साहित न करे तो वे सदा-सदा के लिए कुंठित भावना का शिकार हो जाते हैं। बच्चे ज्यादा काम और काम की बात सुनकर जिद्दी बन जाते हैं। वे काम से भी मन चुराने लगते हैं।
प्यार और दुलार के परिवेश से बच्चों को तनाव से मुक्त रखा जा सकता है। बच्चों को प्रोत्साहित करते रहें। उनकी योग्यता को बढ़ाने के लिए उनके काम की प्रशंसा करें। धन कमाने के साथ-साथ बच्चों का चरित्र निर्माण करने के सही समय को भी पहचानें।
बच्चों को दें ऐसा परिवेश
1) पति-पत्नी के झगड़ों से बच्चों को सदा दूर रखें। बच्चों में एक पक्ष की तरफदारी से तनाव बढ़ता है।
2) नशीले पदार्थों के सेवन करने की आदत को घर के परिवेश से दूर रखें। मारपीट की बुरी आदतों को त्याग कर अच्छे माता-पिता का दायित्व निभाएं।
3) बच्चों के लिए पढ़ाई-लिखायी का परिवेश बनाएं।
4) माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी चिल्लाने की आदत को छोड़ दें। इससे बच्चों में डिप्रेशन एवं तनाव नहीं बढ़ेगा।
5) बच्चों को नियमित रूप से खेलने एवं हंसने का अवसर दें। दबाव के कारण बच्चों की बुध्दि का विकास नहीं होता।
6) बच्चों को झूठे वादे करके भ्रमित न करें।
7) दिन में एक समय अवश्य एक साथ भोजन करें
8) तनावपूर्ण वातावरण से कोई भी सुकून नहीं पा सकता।

Thursday, October 28, 2010

आत्महत्या से बचने के उपाय

आज के दौर की देन है डिप्रेशन या अवसाद जो लोगों को आत्मघात या आत्महत्या की तरफ ले जाता है। बच्चे, बड़े और बूढ़े, सभी उम्र के लोग आत्महत्या कर बैठते हैं जो सामाजिक और कानूनी अपराध माना जाता है।
बच्चों पर स्कूल और अध्ययन का बहुत बोझ होता है। गरीबी, असफलता,र् ईष्या और दुख आत्महत्या या डिप्रेशन की तरफ ले जाते हैं। गरीबी अकर्मण्यता से आती है, असफलता निकम्मेपन से आती है और दुख दुष्कर्मों से आते हैं।
बूढ़े लोग रोग एवं पश्चाताप या परिवार में परित्याग भाव या सेवा भाव की कमी के कारण आत्महत्या करते हैं। बहुएं ससुराल वालों से तंग आकर आत्मदाह करती है।
जो लोग आत्महत्या करते हैं, वे या तो दूसरों को मजा चखाने के लिए आत्महत्या करते हैं या सहानुभूति या सहायता पाने की इच्छा से आत्महत्या करते हैं। जब सहायता को कोई नहीं पहुंच पाता तो उतनी देर में काम तमाम हो जाता है।
एक होस्टल में एक छात्र को बहुत से मित्र तंग करते थे। एक बार उसने रस्सी गले में डालकर पंखे से लटककर मरना चाहा तो रस्सी टूट गयी। वह बच गया। दूसरों ने बचा लिया। दूसरी बार उसने दोबारा कोशिश की, तब वह सचमुच चल बसा।
एक पुत्र अपने पिता को होरो होण्डा लेने की जिद करता था। पिता अध्यापक थे। उनकी हैसियत नहीं थी कि बेटे की इच्छा पूरी कर सकें। एक दिन पुत्र ने पिता को धमकी दी कि वे उसकी इच्छा पूरी करें अन्यथा वह मिट्टी का तेल डालकर आत्मदाह कर लेगा। पिता की असहमति के कारण वह सचमुच अपने ऊपर तेल डालकर तीली लगा बैठा कि पिता बचा लेंगे लेकिन जब तक पिता सहायता करने पहुंचते, तब तक किस्सा तमाम हो गया।
दु:खी व्यक्ति प्राय: आत्महत्या से पहले कहते जरूर हैं, तेरी दुनियां में जीने से बेहतर है कि मर जाएं, 'ऐसे जीवन से मरना अच्छा' या वे पूछते फिरते हैं कि कितनी गोली खाने से आदमी मर जाता है। वह प्राय: एकाकी जीवन जीता है और सबसे नाता तोड़ने की कोशिश करता है। कई परिवारों का इतिहास होता है कि जीन या क्रोमोसोम्ज में आत्महत्या के लक्षण होते हैं। सभी सदस्य पागल होकर आत्महत्या से जीवन समाप्त कर लेते हैं।
भावुक लोग थोड़ी सी असफलता से विचलित होकर यह पग उठा लेते हैं और दुनिया से कूच कर जाते हैं।
शराबी या नशेड़ी भी अवसाद के कारण मरना पसंद कर लेते हैं। कर्ज लेकर मरने की खबरें प्राय: छपती रहती हैं। शादी के बाद दूसरी स्त्रियों से संबंध रखने वाले लोगों के पकड़े जाने पर उनको आत्महत्या का मार्ग सरल जान पड़ता है।
आत्महत्या का आवेग आने पर यदि रोगी मित्र या दूसरे व्यक्ति द्वारा बचा लिया जाता है तो वह उसकी ऐसे ऋणी हो जाता है जैसे किसी को एक भयंकर दुर्घटना से बचा लिया गया हो।
प्राय: लोग आत्महत्या करने से पहले संकेत जरूर दे देते हैं। बातों-बातों में लेकिन हर आत्महत्या करने वाला यह जरूर आशा रखता है कि वह बचा लिया जाए। यदि कोई समय पर नहीं पहुंचता तो उसे मजबूरन मरना पड़ता है। यह एक मानसिक आवेग है। कई लोग संभल जाते हैं और बच जाते हैं।
धनी व्यक्ति ज्यादा आत्महत्या करते पाए जाते हैं। धन का आना या जाना दोनों आत्मघात के कारण बन जाते हैं। कई बार आत्महत्या करना वंशानुगत होता है।
आत्महत्या से बचने के अचूक नुस्खे :-
* अपनी भूलों को मान जाइए। इनको दूर करें। घमंड का परित्याग करें। अपनी आलोचना स्वयं करें। दूसरों को सुख देकर अपने दुख भूल जाइये।
* यदि भाग्य में खटास मिले तो उसे मिठास में बदलें। अंधेरे को कोसने की बजाए एक दीया जला लें। दूसरों की नकल मत करें। जो है वहीं बने रहे। दिखावा मत करें।
* ईश्वर की नियामतों को याद रखें। जो आपके पास नहीं है, उसका रोना मत रोएं। जैसे के साथ-तैसा मत करें। क्षमाशील बनें।
* अपने दिमाग में आशावादी, साहस, स्वास्थ्य, शांति की विचार लहरियां आने दें। होनी से लड़िये मत। जो होना है, उसके लिये तैयार रहें। चिंता मत करें।
* आज की परिधि में जियें। कल परसों या बीते समय का रोना मत रोएं। अपने निर्णय खुद लें।
* ईश्वर में विश्वास रखें। उसने आपको धरती पर किसी विशेष कार्य को सम्पन्न करने को भेजा है। अपनी निष्क्रियता से निकम्मे मत बनें।
* झूठे सपने देखना छोड़ दें। समय और मन की शक्ति को पहचानें। जो भी कार्य करें, लगन व परिश्रम से।
* अच्छी व प्रेरणादायक पुस्तकें जरूर पढ़ें। घर में अच्छी पुस्तकों की लाइब्रेरी बनाए जिनसे आपको जीने की प्रेरणा मिलेगी।
* भाग्य के भरोसे मत बैठें। भाग्य नाम की वस्तु दुनिया में कमजोर और निकम्मे लोगों के लिये है। विवेक से काम लें। जोश में होश मत खोएं।
* धन का सदुपयोग करें। शादी-विवाह या व्यर्थ लेन-देन में पैसा व्यर्थ मत गवाएं। नशा छोड़ दें। नशा नाश कर देता है।
* विपक्षी का धैर्य, साहस, हिम्मत से मुकाबला करें। धन प्राप्त करने के गलत रास्ते मत अपनाएं। किसी की सम्पति पर नजर मत रखें। लोभ, लालच व चोरी मत करें।
* स्वयं खुश रहें और दूसरों को भी रखें। लड़ने वाली बातों और गुस्से से दूर रहें। राई का पहाड़ मत बनाए परन्तु पहाड़ की राई बना डालें। अपना दुखड़ा दूसरों के सामने मत रोएं। दूसरों के दुख में खुशी मत मनाएं।
* अंधविश्वासी मत बनें। दूसरों की गलत बातें मत मानें। ठीक को ठीक और गलत को गलत मान कर चलें। न दूसरों को धोखा दें, न ही खाएं। मूर्ख, दुष्ट, धोखेबाज एवं छली कपटी लोगों से दूर रहने की चेष्टा करें।
* ईश्वर ने हमें सुंदर शरीर दिया है। इसको स्वस्थ रखें। इसे चिंता, बीमारी से बचाएं। इसे नशे एवं कुसंगत से बचाएं। इसे अपनी क्षमता से दुनिया में अद्वितीय बनाए क्योंकि हर व्यक्ति विलक्षण है।

Saturday, October 23, 2010

उदासी भगाने के राज जानें

जी हां, आशा जहां जीवन में आक्सीजन की तरह है, उदासी जानलेवा और दमघोटू लेकिन लोग हैं कि उदासी ही ओढ़े रहना चाहते हैं। जरा सी कोई समस्या हुई नहीं कि खुशियों के परिंदे हवा में उड़ जाते हैं।
ऐसा क्यों होता है? क्योंकि मन को हम ने इसी तरह ट्रेन्ड किया है। लेकिन जरा सोचिए, क्या यह जीवन बार-बार मिलेगा। कितना सुंदर कितना अद्भुत है यह संसार और मनुष्य जीवन एक करिश्मा ही तो है। खुशियां हमारे चारों ओर बिखरी हैं। बस समेटने की कला आनी चाहिए। मजे की बात यह है कि इनकी कोई कॉस्ट नहीं होती। ये मुफ्त मिलती हैं। न आपको फॉरेन टूर लगाने की जरूरत है, न डायमंड के लाखों के जेवरात खरीदने और इंपोर्टेंड बड़ी शानदार गाड़ियों में बैठकर पेट्रोल फूंकने की। ‘मैन इज ए सोशल एनीमल’ यह मानव जीवन का सच है। लोगों से इंटरएक्ट करके ही व्यक्तित्व पनपता है, संवरता है और संतुलित रहता है।
लोगों से संपर्क में रहें : अकेला व्यक्ति पागलपन की कगार पर पहुंच सकता है इसलिए सामाजिक बनें। किसी संस्था से जुड़ जाएं जहां आपको विभिन्न प्रकृति के लोग मिलेंगे। आपके पास करने को जब सोशल वर्क होगा तो यह आपका सेल्फ कॉनफिडेंस बढ़ाएगा और आपको संतुष्टि प्रदान करेगा।
मनुष्य की उपस्थिति मात्र में एक ऊष्मा होती है। इसका सेंक लें। इसके लिये आप किसी भी भीड़ भरे स्थान पर जा सकते हैं। किसी मंदिर, गुरुद्वारे या कहीं भीड़ भरे पार्क में बेंच पर आसन जमा लें या किसी खाली दुकान की ओट लेकर बैठ जाएं या अगर बैठ चौबारे जग का मुजरा देखने को मन तरस रहा है तो रेलवे स्टेशन सबसे बढ़िया जगह है। दौड़ते भागते लोग हों या परिवारों के साथ चादर पर लंबी ताने आराम करते या चाय सिप करते लोग हों, उन्हें देखते आपका बढ़िया मनोरंजन हो सकता है बशर्तें आपकी संवेदनाएं जीवित बची हों। खुश रहने का यह एक बढ़िया नुस्खा है।
लिखिए और स्वस्थ रहिए : लेखन ध्यान की तरह मस्तिष्क को स्थिरता प्रदान करता है। तनाव कम करता है। जिंदगी सतत संघर्ष है। राह में दुश्वारियां ज्यादा हैं। रिश्तों में मिठास कम, कड़वाहटें ज्यादा हैं मगर रिश्ते मिठास कम कड़वाहटें ज्यादा है मगर रिश्ते जिंदगी में अहम हैं। उनके बिना चल भी नहीं सकते। यही रिश्ते अक्सर तनाव का कारण बन जाते हैं।
आप किसी से अच्छा व्यवहार करती हैं लेकिन फिर भी वो जाने किन कुंठाओं, गलतफहमियों यार् ईष्या के कारण बेवजह आपको आहत करने पर तुला रहे तो आपकी नाराजगी जायज है लेकिन आप जानते हैं कि नाराजगी प्रगट करने से बात और बिगड़ जाएगी। ऐसे में आप क्या करें? अपनी छटपटाहट, बेचैनी नफरत जैसी नकारात्मक फीलिंग्स से कैसे निजात पाएं? सिंपल आप अपनी सारी कड़वाहट, शिकायतें, मलाल किसी कागज पर लिख डालें और पढ़कर तुरंत उसे नष्ट कर दें। ये फंडा आपको तुरंत राहत देगा। आप भार मुक्त महसूस करेंगे और कह उठेंगे व्हाट ए ग्रेट रिलीफ।
अटैक द आफर : कई बार हम लोगों को शिकायत करते सुनते हैं कि लोग उनके सीधेपन का फायदा उठाते हैं। अक्सर होता यह है कि कई लोगों को दूसरों को नीचा दिखाने में बहुत आनंद आता है या बेवजह आलोचना करना भी कइयों का शगल होता है।
अब ऐसे में कुछ निरीह प्राणी सफाई देते-देते थक जाते हैं। कंप्लेन और एक्सप्लेन का यह गेम एक्सप्लेन करने वाले पर कुछ ज्यादा भारी पड़ने लग जाता है। एक उक्ति है आक्रमण सुरक्षा की सबसे बड़ी नीति है। आप इसे मॉडिफाइड वे में अपनाएं।
आप आलोचना से त्रस्त होने, सफाई देने, डिफेंस मेकेनिज्म अपनाने के बजाय आलोचक से आलोचना की विवेचना करने को कहें। कारण बताओ नोटिस दें। निश्चय ही वह बगले झांकने लगेगा। अब तक उसका हौसला इसलिए बुलंद था कि आप सुरक्षात्मक रवैया अपना रहे थे यानी कि वो आपके सीधेपन का फायदा उठा रहा था। आप भी जरा टेढ़े होकर देखें।सामने वाला लाइन पर आ जाएग। अब आप के मन में भी न कोई दंश पलेगा, न कोई टीस आपको तकलीफ देगी।

Thursday, September 16, 2010

तनाव का आत्मीय इलाज है म्यूजिक थैरपी

क्या तनाव बढ़ता जा रहा है? अगर दवाओं के बिना कुछ राहत चाहते हैं तो कुछ संगीत सुनने का प्रयास कीजिए। अपनी जड़ों पर वापस लौटना इतना कूल कभी नहीं था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि तनाव से मुक्ति पाने के लिए बहुत लोग गैर-परम्परागत उपचारों का सहारा ले रहे हैं जैसे म्यूजिक थैरपी।तनाव दूर करने की सूची पर शायद संगीत को पहली वरीयता प्राप्त हो। लेकिन इस तथ्य को कम लोग जानते हैं कि इस विज्ञान आधारित थैरपी का वास्तव में बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। चाइल्ड बर्थ के दौरान दर्द से राहत देने से सेन्ट्रल नर्वस डिसआर्डर को ठीक करने तक सा रे गा मा का प्रयोग किया जाता है। शोधों से मालूम हुआ है कि विभिन्न साइक्रोमेटिक और सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम बीमारियों के उपचार में संगीत का इस्तेमाल किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने संगीत का प्रयोग ट्रेन्कुलाइजर के रूप में किया है ताकि सिडेटिव्स का प्रयोग कम या पूरी तरह से समाप्त किया जा सके और खासकर ओटिज्म क्लीनिकल डिप्रेशन, ब्लड प्रेशर और हृदय रोग की स्थितियों में। गंभीर बीमारियों के अलावा म्यूजिक थैरपी कम्युनिकेशन क्षमता और आत्मविश्वास विकसित करने में भी मदद करती है, खासकर बच्चों में। कुछ विशेषज्ञों ने ध्यान और शास्त्रीय संगीत का गठबंधन बनाया है ताकि तन और आत्मा की बुलंदियों पर पहुंचा जा सके। इसे सुचारू ढंग से प्रयोग करने के लिए भारत में अब तक 8000 छात्र इसकी ट्रेनिंग ले चुके हैं। प्राचीन सोच यह है कि खुश रहने के लिए मानव जीवन के सभी सात चक्र ट्यून्ड रहें। यह चक्र हैं- महत्वाकांक्षा, उत्तेजना, प्रेम, अच्छे संबंध, उत्साह, फोकस और अध्यात्म। ध्यान व संगीत थैरपी कार्यक्रम में इन्हीं चक्रों को ट्यून करना सिखाया जाता है। दिल्ली की फरजाना समीन बताती हैं, ‘म्युजिक थैरपी सत्र के शुरूआत में मेरा ऑटिस्टिक बेटा बिल्कुल सहयोग नहीं करता था। लेकिन उसके टीचर ने उसकी मदद की और अब उसका आत्मविश्वास काफी हद तक बढ़ गया है। वह संगीत को तनाव दूर करने के लिए इस्तेमाल करता है। आज वह इतना इन्टरैक्टिव हो गया है कि उसने बिना घबराहट व झिझक के स्टेज पर भी परफार्म करना शुरू कर दिया है।’ ओक्युपेशनल थैरपिस्ट और आटिस्टिक बच्चों के लिए विशेष स्कूल की संस्थापिका रिशा घूलप को विश्वास हो गया है कि जो आटिस्टिक बच्चे म्युजिक थैरपी से गुजरते हैं वह अधिक सतर्क और इंटरैक्टिव हो जाते हैं उन बच्चों की तुलना में जो म्युजिक थैरपी नहीं करते।