Friday, February 1, 2013

सुख और दुख का मूल कारण स्वयं व्यक्ति ही होता है



हमारे शरीर और बुध्दि से परे भी एक ऐसी प्यास और एक अभीप्सा विद्यमान है, जिसे बाहर से सब कुछ पाकर भी शान्त नहीं किया जा सकता। वस्तुतः हम अपने आप में इतने परिपूर्ण और समर्थ हैं कि बाहर से कुछ पाने की अपेक्षा ही नहीं रहती। लेकिन कृत्रिम अपेक्षाओं के जाल में हम इस कदर फंसे रहते हैं कि भीतर झांकने का अवकाश भी नहीं मिलता।
व्यक्ति की हर कामना पूरी हो जाए, यह नितांत असंभव है। ऐसी स्थिति में उसके मानस में निरन्तर एक चुभन-सी बनी रहती है जो उसे कभी भी शान्ति से नहीं सोने देती।
अपेक्षाओं को जगत् से मुड़कर ही व्यक्ति उस रसातीत रस का अनुभव कर सकता है जिसके सामने स्वादिष्ट से स्वादिष्ट पकवान भी नीरस और फीके प्रतीत होने लगते हैं। उसे बाह्य निरपेक्ष सुखद स्थिति को प्राप्त करने के लिए भगवान महावीर ने चार उपाय सुझाए हैं, जो सुख शय्या के नाम से पुकारे जाते हैं।
सत्यनिष्ठ के लिए स्वयं में विश्वास होना अत्यन्त अपेक्षित है। स्वयं अपेक्षित है। स्वयं के प्रति विश्वस्त व्यक्ति ही दूसरों के प्रति विश्वस्त रह सकता है। सबके प्रति विश्वस्त रह सकता है। सबके प्रति विश्वस्त रहने वाला सत्य के प्रति अविश्वस्त हो ही नहीं सकता।
अपने लक्ष्य, प्रवृत्ति और प्रगति के प्रति भी विश्वास होना जरूरी है। संदेहशील व्यक्ति व्यावहारिक दृष्टि से भी सफल नहीं हो सकता। वह नीरस और कटा हुआ जीवन जीता है। उसे न अपने अस्तित्व, कर्तृत्व और व्यक्तित्व पर भरोसा होता है और न दूसरों पर। संदेह मानसिक तनाव उत्पन्न करता है। उससे पारस्परिक स्ेह और सौहार्द के स्रोत सूख जाता है। मन सदा भय और आशंका से भरा रहता है। दबा हुआ भय और आशंका कभी भी विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकते हैं। पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय अनेक समस्याओं में यह संदेहवृत्ति ही कार्य करती है। जीवन के लिए जितना श्वास का महत्व है उतना ही महत्व समाज में विश्वास का है।
व्यक्ति को दूसरे का सुख और समृध्दि अधिक दिखती है और अपनी कम। अपनी उपलब्धि में असंतुष्ट रहने वाला व्यक्ति पराई उपलब्धि से जलता रहता है या उस पर हस्तक्षेप करता रहता है। इससे अनेक उलझनें सामने आती हैं। दूसरे की प्रगति के प्रति असहिष्णुता मानवीय दुर्बलता है। पारिवारिक, जातीय, सामाजिक, धार्मिक और भाषायी विवादों की जड़ यह असहिष्णु वृत्ति ही है। इसी वृत्ति ने न जाने कितनी बार मानव जाति के युध्दों की लपेटों में झोंका है। वस्तुतः सुख-शांति और आनन्द को पाने के लिए कहीं जाने की अपेक्षा नहीं है। वह स्वयं के भीतर हैं।
व्यक्ति का चैतन्य जागरण जितना स्वल्प होता है, मन और इन्द्रियां उतने ही बाहर दौड़ते हैं। ऊर्जा और चेतना का बहाव भीतर न होकर बाहर की ओर होने लगता है। बहिर्मुख व्यक्ति बाह्य के प्रति आसक्त रहता है। लेकिन उसे भी कभी संतोष नहीं मिलता। असंतुष्ट मानस की बगिया में आनन्द के फूल खिल नहीं सकते। इसलिए महावीर ने सुझाया 'दृष्ट पदार्थों से उदासीन रहो।' यह विरक्ति ही अंतर्दर्शन का मूल और आनन्द का स्रोत है।
वेदना दो प्रकार की होती है, शारीरिक और मानसिक। शारीरिक वेदना प्रगति में बाधक बन सकती है पर घातक नहीं। घातक बनती है मानसिक वेदना। अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां, उतार-चढ़ाव और घुमाव प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पथ में आते हैं। दुर्बल मानस उनसे बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता है। वह जरा सी अनुकूलता में प्रसन्न और प्रतिकूलता में खिन्न हो जाता है। दोनों परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बनाये रखना अत्यंत अपेक्षित है। परिस्थिति विजय का सुन्दर उपक्रम है- उनसे ऊपर उठ जाना। यदि हम ऊपर उठ जायेंगे तो परिस्थितियों का प्रवाह नीचे से बह जायेगा। यदि हम उस प्रवाह में बैठ जायेंगे तो वह बहा ले जायेगा।
जो तटस्थ होकर प्रिय-अप्रिय परिस्थितियों को सहना जानता है, वह सचमुच जीना जानता है और कुछ कर गुजरना भी जानता है।
शान्ति किसी बाहरी साम्राज्य को जीतने से नहीं, आत्म साम्राज्य को पाने से उपलब्ध होती है।
सुख और दुःख का मूल कारण स्वयं व्यक्ति ही होता है। उसकी नियंत्रित वृत्तियां जहां उसकी राहों में फूल बिछाती हैं, वहां अनियंत्रित वृत्तियां शूल बन कर उसके प्राणों में प्रतिक्षण चुभन पैदा करती रहती हैं।
भगवान महावीर ने एक आध्यात्मिक औषधि अवश्य बताई है जिसके सेवन से व्यक्ति क्षण भर में अनगिनत मनोव्याधियों से छुटकारा पा सकता है। उस दिव्य औषधि का नाम है 'समता'
विषम मन के धरातल पर ही दुःख का अंकुरण होता है। उन अंकुरों से विक्षोभ, व्याकुलता, दुराग्रह, प्रतिशोध आदि के फूल खिलते हैं और पुनः फलते हैं अनेक प्रकार की समस्याओं के विषैले फल। समता एक ऐसा रसायन है, जिसके छिड़काव में उन विषैले पौधों का समूल उन्मूलन हो सकता है। मेधावी व्यक्ति उस रसायन से मानसिक विक्षोभ या लक्ष्य के प्रति होने वाले अनास्थाभाव के अंकुरों को पनपने से पहले ही समाप्त कर देता है।
कोई भी व्यक्ति यदि अशान्त होता है तो वह अपने ही चिंतन और गलत कार्यों से होता है। इसके विपरीत जिसके मन में समत्व प्रतिष्ठित हो जाता है, उसके पांव कभी गलत दिशा में नहीं उठते। उसके हाथ कभी गलत कार्यों में संलिप्ति नहीं होते।
विषमताओं के तूफान से जब जब जीवन नौका विपदाओं के अन्तहीन सागर में डूबने लगे तब तब यदि हम उस नौका के मस्तूल पर प्रसन्नता की पताकाएं फहरा दें और समता का लंगर डाल दें तो निश्चय ही हमारा जहाज सुरक्षित रह जायेगा और हमारा जीवन समाप्त होने से उबर जायेगा।
सचमुच समता एक ऐसा लंगर है जो हर परिस्थिति में हमारे जीवन जहाज को संतुलित और नियंत्रित रख सकता है। उसका प्रयोग हम चाहें कितनी बार करें, वह समाप्त नहीं होगा।
इन सुख शय्याओं में सोने वाले व्यक्ति काल्पनिक या अतृप्त वासनाओं के कारण उभरने वाले सपनों में नहीं खोते, अपितु दिव्य लोक में विहार करते हैं, जहां सर्वत्र आनन्द बिखरा पड़ा है।


Wednesday, January 16, 2013

लिखिए और तनाव घटाइएलिखिए और तनाव घटाइए



आज हम प्रतियोगिता की गलाकाट कार्यपध्दति में पड़े है जिसके कारण सारे समाज में तनाव है। राग द्वेष और घृणा से वातावरण भरा पड़ा है। हिंसा का साम्राज्य तैयार हो रहा है। आक्रमण, अपहरण, आत्महत्या, हत्या, लूटपाट, चोरी जैसे अपराध बढ़ रहे हैं। इन अपराधों में युवाओं का प्रतिशत ही अधिक है। पढ़े-लिखे सम्पन्न घरानों के युवा भी इन अपराधों में पाए जा रहे हैं। सहन शक्ति घट रही है, फलस्वरूप मानसिक बीमारियां बढ़ रही है। इलाज के लिये दवाएं है पर वे भी कारगर सिध्द नहीं हो रही। मानसिक रोगों के न तो पर्याप्त अस्पताल है और न डाक्टर तो इलाज कैसे हो।
आश्चर्य का विषय है कि तनाव पढ़े-लिखे बुध्दिजीवियों को ही अपना शिकार बना रहा है। तनाव का शिकार युवावर्ग ही अधिक हो रहा है और इसलिये आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक प्रतिशत युवा वर्ग का हो गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि युवा वर्ग के लिये तनाव की अभिव्यक्ति के साधन समाप्त हो गये हैं। कलम कागज का उपयोग तो अब बहुत कम हो गया है। गुस्सा, परेशानी, कुण्ठा कहां अभिव्यक्त हो? कैसे अभिव्यक्त हो, यह प्रश्न है।
तनाव घटाने के लिये ध्यान, आसन, प्राणायाम आज प्रमुख रूप से आजमाएं जाते हैं किन्तु वे सब साधन जो एकाग्रता को ध्यान में बदल देते हैं वे भी तनाव घटाते ही नहीं, समाप्त भी कर देते हैं। ध्यानपूर्वक जीवन जीना तनाव घटाने का अचूक साधन है। अपनी कलम, कागज या डायरी का उपयोग करके भी हम तनाव मुक्त हो सकते हैं।
लिखिए तनाव मिटाइए- क्या लिखने से भी तनाव घटता है? हां, हमारा यही अनुभव है और हम चाहेेंगे कि तनाव के क्षणों में आप भी इसका उपयोग करें। अब प्रश्न यह है कि आखिर हम क्या लिखे कि तनाव खत्म हो। लिखने की सामग्री क्या हो?
अ) डायरी लिखिए-  तनाव घटाने के लिये डायरी लिखना सबसे अच्छा है। आप जो कुछ अनुभव कर रहे हैं, उसका तथ्यात्मक वर्णन नियमित करने से हमारी आंतरिक भावना कागज पर उतर आती है। हमारा गुस्सा, रागद्वेष अभिव्यक्ति पा जाता है पर ध्यान रखिये डायरी में घृणा व्यक्त करते समय सावधानी रखें, वह आपको मनोवैज्ञानिक रूप से नुकसान पहुंचा सकती है। आपकी डायरी सदा गोपनीय नहीं रहेगी। आपके विचार भी बदल सकते हैं। दोस्त या दुश्मन सदा नहीं रहते लेकिन डायरी एक तरह का साक्ष हो जाती है अत: इसे सावधानी से भावना व्यक्त करने का साधन ही माने। घृणा से घृणा फैलती है, तनाव घटता नहीं है अत: कलम का उपयोग भी सावधानी से कीजिए।
आजकल डायरी लिखना सामान्य बात नहीं है। डायरी लिखने की बात से ही तनाव पैदा हो सकता है अत: अन्य विकल्पों पर ध्यान देते हैं।
ब) लिखिए कुछ भी - अगर आप डायरी लिखना नहीं चाहते तो आपके मन में जो भी उमड़ घुमड़ रहा है, उसे कागज पर उतार दीजिए। पूरी ताकत से अपने विचार व्यक्त कीजिए। पूरी मनोभावना कागज पर आ जाना चाहिये। यह उतना ही कारगत नुस्खा है जितना अपने किसी शुभ चिंतक से अपनी बात कह कर हल्का हो जाना। आप कर के देखिए। आपका शुभ चिन्तक तो धोखा भी दे सकता है। वह आगे पीछे आपकी बात को नमक मिर्च लगाकर सुना सकता है पर यह कागज ऐसा नहीं करेगा। जैसे ही आप हल्का अनुभव करें, इस कागज को फाड़ फेकिए, जला दीजिए। आपका तनाव घट चुका होगा। लेकिन यह भी तनाव मुक्ति का एक कारण है। यदि आप नियमित रूप से लिखने पढ़ने की आदत डाल पाए तो सोने में सुगंध है। तब आप तनाव व चिन्ता मुक्ति से संबंधित साहित्य को पढ़ जाइए। उसमें दिए गए नुक्सों को भी अपना कर देख सकेंगे। तब आप स्वयं तो तनाव मुक्त और प्रसन्न मुख होंगे ही अन्य लोगों को भी मार्गदर्शन दे सकेंगे। लेखक का यह व्यक्तिगत अनुभव है। लेखक ने अपनी डायरी के एक पन्ने पर जो लिखा है उसका आप भी आनंद लीजिए।
कलम
कलम चल पड़ी
बुढ़ापा ध्यान बन गया
बनने लगे रंग बिरंगे चित्र
कल्पना लेने लगी आकार
जीवन बन गया साकार
मस्तक की रेखाएं खिल गई
बुढ़ापा कहां चला गया
ढूढ़ता रह गया हूं मैं बुढ़ापा बोला,
ध्यान के साथ मैं रह नहीं सकता
जगह नहीं रहती मेरे लिये वहां
कहां ठहरू मैं/छिपा पड़ा हूं
अभी मरा नहीं हूं मैं
तुम कलम रख दो
मैं आ जाऊंगा पास
कलम में है जवानी की शक्ति
तूलिका है वह/रंग भर देती
मैं नहीं रह सकता कलम के साथ
कलम उठाओ लगाओ आंख पर चश्मा
जवानी दौड़ कर पास आएगी
तनाव को भगाती है कलम
उत्साह उमंग जगाती है कलम
भविष्य के सपने सजाती है कलम
अतीत की याद दिलाती है कलम
वर्तमान में रंग भरती है कलम
कलम से झरते है अनुभव
कलम से निकलते हैं आशीर्वाद
कलम से प्रेम बहता है
कलम उड़ाती है बचपन की तितलिया
कलम भोलेपन का स्वाद रचती है
बुढ़ापे की दवा है कलम
इस प्रकार लिखना पढ़ना भी ध्यान केंद्र बन जाता है। लिखने पढ़ने की आदत अब खत्म सी हो रही है, इसलिये तनाव का लावा अभिव्यक्ति से माध्यम से बहकर बाहर नहीं आ रहा है। आदमी अंदर ही अंदर घुटता है। समाज नाम की चीज है नहीं। दोस्त यारी मौज मस्ती ही बन कर रह गयी है। परिवार में किसी के पास किसी का दुख दर्द सुनने, समझने का समय नहीं रह गया है। हम सबका अनुभव है कि दुख दर्द कहने सुनने मात्र से मन में हल्कापन आ जाता है लेकिन हम अपने मन की आंतरिक चर्चा हर किसी से, हर कहीं तो कह सुन नहीं सकते। उसके लिये अत्यन्त विश्वसनीय व्यक्ति की दरकार है। अब जब आपसी विश्वास ही न मिले तो एकांत में बैठिए, कागज-कलम लीजिए और अपने मन के मालिक बन जाइए और जो मर्जी में आए लिखिए, घसिटिए, चित्रण कीजिए, फाड़ डालिये, लिखा हुआ जला डालिए और तनाव से मुक्त हो जाइए। घबराने की बात नहीं है। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे कोमल क्षण आते हैं जब चारों तरफ गहन अंधकार दिखाई देता है। समाधान की रेखा दिखाई नहीं देती। लेकिन धैर्य से कलम कागज आपको समस्या का समाधान भी दिखा देगा। प्रयोग कर देख लीजिए।

Wednesday, January 2, 2013

अशांत चित्त को सुख कहां



कई लोगों को शांति से रहना जरा भी नहीं सुहाता है। उन्हें हमेशा परेशानियां ओढ़े रहने की ही आदत पड़ जाती है। न वे स्वयं खुश रहना जानते हैं न अपने आसपास किसी को खुश रहने देते हैं।
अपनी बेचैनी के आलम में वे कई रोग पाल लेते हैं, उनमें एक गंभीर और बहुत आम रोग है उच्च रक्तचाप या हाई ब्लडप्रेशर। पेट में अल्सर का कारण भी कई बार चिंता ही होती है इसके अलावा कई प्रकार के मानसिक रोग तो हैं ही।
मन की अशांति ही चिंताओं को जन्म देती है। शांत, स्थिर मन चिंताओं से निपटना जानता है, जबकि अस्थिर, अशांत मन उसे केवल और बढ़ाता है। कहते हैं चिंता, चिता के समान होती है। स्वयं इसका शिकार भी इससे छुटकारा जरूर चाहता है, लेकिन स्वभावगत मजबूरी के कारण ही वह ऐसा नहीं कर पाता है।
एक उन्मुक्त ठहाका फिजूल की निराधार चिंताओं से निपटने का अच्छा तरीका है, इससे क्रोध व तनाव दूर होता है, अधिक स्फूर्ति और प्रफुल्लता का संचार होता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जीवन में सफलता पाने के लिये फंडा दिया होना आवश्यक है। क्रोध, चिंता, तनाव तथा चिड़चिड़ापन ऊर्जा का नाश करते है और काबिलियत कम करते हैं।
युरोपियन फिलासफर स्वेट मार्डेन का कथन है कि आप अपनी इच्छाशक्ति (विलपावर) को इतना मजबूत बनाये कि वह सारी चिंताओं को जादूगर की तरह गायब कर दे।
कई लोगों को आदत होती है कि वे कार्यस्थल की तमाम परेशानी वहीं पर न छोड़कर घर साथ ले आते हैं। इससे खुद दो दु:ख पाते ही हैं अपने परिवार को भी दु:ख के अंधेरों में डुबो देते हैं।
हर समस्या का कोई न कोई हल जरूर होता है। आशावादी सकारात्मक सोच लिये समस्याओं से जूझकर उसके हल तक पहुंच जाते हैं, लेकिन अशांत मन लिये बौखलाहट में (नकारात्मक सोच ऐसे लोगों पर जल्दी हावी हो जाती है) व्यक्ति उस हल को अनदेखा, किये रहता है या यूं कहें, उसे ढूंढ नहीं पाता है।
जीवन में अगर दु:ख परेशानियां हैं तो क्या सुख, आनंद, हंसी के फव्वारे, मीठी मुस्कानें नहीं है? एक शिशु की भोले दंतविहीन चेहरे की प्यारी मासूम सी मुस्कराहट पर जरा ध्यान दें।
कोयल की मीठी तान का जादू मस्तिष्क में गुंजित होने दें। कलकल बहती चांदी-सी नदी पर सूर्य रश्मियों की अठखेलियां देखें वी हैव नो टाइम टू स्टैंड एंड स्टेयर को झुठलाते हुए प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करके तो देखें।
इससे मन को वह सुकून और निश्चल आनंद मिलेगा, जिसमें आपका तन-मन रसप्लावित हो उठेगा। आनंद की लहरें आपके मन को तितली के परों की मानिंद हल्का कर देंगी। आपको लगेगा वाकई जीवन कितना सुंदर और जीने लायक है।
सोचिए अगर जीवन में समस्याएं न हों तो जीवन से एक ी धारा में बहता जाए तो वह जीवन नीरस नहीं हो उठेगा? जीवन में कठिनाइयां तो हमारी शक्तियों को जाग्रत करती हैं, ऊर्जा पैदा करती हैं वरना तो आदमी बेहद आलसी हो जाएगा।
आज तो जी लें कर की कल देखेंगे, जैसी सकारात्मक सोच ही चिंता दूर रखती है। कई लोगों की आदत में शामिल होता है कि हर समय रोते रहना और चिंता करना। बबलू पैदा नहीं हुआ कि उसके भविष्य की चिंता कर करके सुखना बनिस्बत उसके आगमन का जश्न मनाने के, कि हाथ बुढ़ापे में हमारा क्या होगा। हमारे पास पैसा होगा या नहीं। कहीं वर्ल्ड वॉर छिड़ गया तो क्या होगा। जहां जीवन में अगले पल का भरोसा नहीं, वहां यह सोच-सोचकर वर्तमान को भी खो देना, उसे भरपूर न जीना कहां की समझदारी है। यहां खुशमिजाज, केयरफ्री रहने का मतलब यह हर्गिज नहीं कि व्यक्ति गैर जिम्मेदार हो जाए। बस जीने का सलीका आना चाहिये।

Wednesday, December 19, 2012

नकारात्मक विचार हानिकारक हैं स्वास्थ्य के लिये

बुरे विचारों का मस्तिष्क में हर समय चिंतन करते रहना रोगों का मूल कारण है। नीच और हीन विचारों से मनुष्य का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता चला जा रहा है।


बुरे विचार अपने साथ चिंता, भय, क्रोध, कलह आदि लाते हैं। ये ऐसी अग्नियां हैं जो थोड़े ही दिनों में सारा भाग जलाकर आदमी को खोखला कर देती है।

हर घड़ी स्वार्थ, भय, चिंता, अनुदारता और लोभ से भरे विचार मस्तिष्क में रहने से गंभीर बीमारी का आगमन दिखाने लगता है। अच्छी और कीमती दवाइयां भी बेअसर होने लगती हैं। असयम मानसिक रोगी को मौत के मुंह में जाते देखा जाता है।

शरीर में समस्त ज्ञान तंतुओं का संबंध मस्तिष्क से रहता है और वहीं से प्रेरणा प्राप्त होती है। मन मस्तिष्क में उठने वाले विचारों का, रस उत्पन्न करने वाली ग्रंथियों, पाचन अवयवों और शरीर के अंगों पर असर पड़ता रहता है। इस संबंध में कुछ शरीर शास्त्रियों की सम्मतियां इस प्रकार हैं।

डा.आल्टन लिखते हैं कि भय,र् ईष्या, घृणा, निराशा, अविश्वास और मानसिक विकार शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं को मंद करके खून को सुखा देते हैं। डा. वेन लिखते हैं संताप और मनोव्यथा के कारण कई लोगों की मृत्यु हो गयी और अनेकों का मस्तिष्क खराब हो गया।

डारबिन साहब कहते हैं चिरकालीन चिंता से रक्त की गति धीमी हो जाती है और चेहरे पर पीलापन मांस-पेशियों में शुष्कता आ जाती है, पलकें झूल पड़ती हैं, छाती बैठ जाती है, गरदन झुक जाती है एवं होंठ, जबड़ा और सिर आदि गिर जाते हैं। हंसते आदमी पर घोर उदासी छा जाती है।

डा. तुकेने का कथन है कि पागलपन, लकवा, हैजा, यकृत रोग, बालों का जल्दी सफेद होना, गंजापन, रक्त की कमी, गर्भपात, मूत्र रोग, चर्म रोग, फोड़े, पसीने की अधिकता, दांत जल्दी गिरना आदि रोगों की जड़ में भय या संताप छिपा रहता है।

उपरोक्त सम्मतियों से यह स्पष्ट होता है कि मन में बुरे विचार लाने से शरीर का अनिष्ट होता है, अत: स्वस्थ रहने की इच्छा रखने वालों को चाहिये कि सदैव प्रसन्न रहें, दुष्ट विचारों को पास न फटकने दें। जिन्हें बुरे विचार घेरे रहते हैं, उन्हेंं स्वास्थ्य एवं सतसंग करना चाहिये। अच्छा साहित्य जो समाधानकारी हो का पठन पाठ्न करना अति उत्तम रहता है।

व्रत, अनुष्ठान, जप, गोदान, अन्नदान आदि कार्य बीमारी दूर करने के लिये कराने का हिंदू धर्म शास्त्रों में विधान है और उसका पालन निष्ठापूर्वक होता है। इन कार्यों में रहस्य यह है कि रोगी में त्याग, उदारता वाली भावनाएं पनप जाएं और कठिन कष्ट को दूर कर दें। जिन रोगियों को धन की सुविधा न हो, उन्हें 'राम नाम' या 'गायत्री महामंत्र' अथवा अन्यमंत्र जपने की क्रिया करनी चाहिये।

इस तरह भावनाओं में परिवर्तन से मानसिक स्तर पर रोगी को काफी राहत महसूस होगी। मन के कोने में जगह बनाकर बैठे दुष्ट विचारों का निष्कासन प्रारंभ होगा और उनके स्थान पर सदवृत्तियों से परिपूर्ण विचार स्थान लेने लगेंगे। रोगी जो मानसिक स्तर पर बीमार था। अपने को हल्का व स्वस्थ अनुभव करने लगेगा। ऐसा तत्काल तो नहीं लेकिन कुछ समय गुजरने पर स्थायी लाभ अवश्य मिल कर रहता है। शर्त एक ही है कि क्रम बना रहना चाहिये।



बड़ा शक्तिशाली है हमारा मन

मन को एक महाशक्ति माना गया है। जिस तरह हमारे समूचे कायतंत्र-संचालन मन द्वारा होता है, उसी प्रकार सृष्टि का-समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड नियमन-संचालन विराट मन से होता है। मानवीय मन चेतन और अचेतन नामक दो प्रमुख भागों में विभक्त होता है। अचेतन मन रक्तभिसरण, आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास जैसे अनवरत गति से होते रहने वाले क्रियाकलापों का नियंत्रण करता है। चेतन मन के आदेश से ज्ञानेंद्रियां, कर्मेद्रियां, एवं दूसरे अवयव काम करते हैं। अनियंत्रित मन अस्त-व्यस्त हो जाता है और विभिन्न प्रकार की बेढंगी हरकतें-हलचलें करने लगता है। शरीर को नीरोग एवं परिपुष्ट रखने के लिए मन को संयमी और सदाचारी, निर्मल और पवित्र बनाना पड़ता है।


मन मस्तिष्क की जानकारी

निष्कपट, पवित्र, सुसंस्कारित एवं प्रखर मन जब विराट मन से जुड़ जाता है तो वह सुपरचेतन स्तर को प्राप्त कर लेता है। यही वह क्षेत्र है, जिसे ॠध्दि-सिध्दियों का भांडागार कहा जाता है। आत्मा को परमात्मा से, व्यष्टि से समष्टि को मिलाने में यही मन सेतु का काम करता है। अब तो मनोविज्ञानियों, परामनोवेत्ताओं एवं अनुंसधार्नकत्ता चिकित्साविदों ने भी इस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि मानसिक क्षेत्र की विकृतियां ही शरीर और मस्तिष्क को रुग्ण एवं विक्षुब्ध बनाती हैं। मानसिक परिशोधन के बिना न तो आरोग्य समस्या का पूर्ण समाधान हो सकता है और न जीवन की अन्यान्य समस्याएं ही सुलझ सकती हैं। मानसिक परिष्कार के बिना अध्यात्म-साधना के क्षेत्र में तो एक पग भी आगे नहीं, बढ़ा जा सकता। मनःशक्ति जड़ जगत और चेतन जगत के बीच का एक महत्वपूर्ण सेतु है, घटक है। इसलिए लौकिक जीवन में इसका सर्वोपरी महत्त्व है। जेनेटिक साइंस के नवीनतम शोधों ने यह भी रहस्योद्धाटन किया है कि शरीर की समस्त कोशाएं तथा परमाणु पूरी तरह मनःशक्ति के नियंत्रण में हैं। यही क्रम वंश -परंपरा में भी तथा मरणोत्तर जीवन में समानरूप से गतिशील बना रहता है। मनोवेत्ता फ्रायंड के 'सुपरईगो' आदि की परिधि तक सीमित मन को प्रख्यात जर्मन मनोवैज्ञानिक हेंस बेंडर अतींद्रिय क्षमता तक ले जाने में सफल हुए। इसके लिए उन्होंने अनेक प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। टेलीपैथी पर अत्यधिक खोज-बीन करने वाले मूर्ध्दन्य परामनोवेत्ता रेनेबार्क लियर के अनुसार मन की व्याख्या पदार्थ विज्ञान के प्रचलित सिध्दांतों द्वारा संभव नहीं है। अतः इसके क्रियाकलापों के लिए भी इससे परे सोचने-समझने की बुध्दि विकसित की जानी चाहिए। तभी चेतना से अथवा चेतना से परे जाकर संबंध, संपर्क बना पाना संभव है और यह सब मानसिक परिष्कार के बिना संभव नहीं हैं। यों तो भौतिक विज्ञानी मन-मस्तिष्क को एक मानकर उसी की खोज-बीन में गंभीरतापूर्वक संलग्न हैं। इतने पर भी तन-मस्तिष्क की समूची जानकारी अभी उनके हाथ नहीं लगी, अन्यथा उसमें एक से एक बढ़कर विलक्षणाताएं और संभाावनाएं सन्निहित हैं। मस्तिष्कीय परमाणु में भार, घनत्व, विस्फूटन तथा चुंबकीय क्षेत्र का भौतिक परिचय देने वाले तत्त्वों की खोज करते समय वैज्ञानिक ऐसे अतिसूक्ष्म विद्युतीय कणों के संपर्क में आए हैं, जिनमें भौतिक परमाणु जैसे लक्षण नहीं हैं। ये विद्युतकण आकाश में स्वच्छंद बिचरण करने में सक्षम हैं। इनमें भौतिक परमाणुओं को वेधकर निकल जाने की क्षमता है। इन कणों का नियंत्रण-नियमन भी संभव नहीं है। इन्हें पकड़कर स्थिर भी नहीं किया जा सकता। इन कणों की उपस्थिति का बोध भी परस्पर टकराव कारण हो पाता है। वैज्ञानिक इन कणों को ही अतींद्रिय क्षमताओं के विकास के लिए उत्तरदायी मानते हैं। सुप्रसिध्द, गणितज्ञ एवं विज्ञानवेत्ता एड्रियो हॉब्स ने इन काणों को 'न्यूट्रिनो' नाम दिया है, तो कुछ वैज्ञानिक इन्हें 'माइण्डास', 'साइन्नोंस', आदि नामों से पुकारते हैं। अनुसंधार्नकत्ता वैज्ञानिकों का कथन है कि जब मस्तिष्क के न्यूरोन कण इन माइण्डांस कणों के संपर्क में आते हैं, तब पूर्वाभास जैसी घटनाओं की अनुभूति होती है। इससे सिध्द होता है कि ब्रह्मांडव्यापी घटनाओं का मूल उद्गम एक है तथा मानवीय मनश्चेतन का उससे किसी न किसी रूप में संबंध अवश्य है। साइन्नोन कणों का मस्तिष्कीय चेतन पर किस तरह प्रभाव पड़ता है, इस पर वैज्ञानिक गंभीरतापूर्वक अनुसंधानरत हैं। सुप्रसिध्द विज्ञानी एक्सेल फेरिसिस का इस संबंध में कहना है कि जब साइन्नोन कण न्यूरोन कणों से मिलते हैं, तब माइण्डान या माइन्जेन नामक ऊ र्जा कणों का जन्म होता है। इससे मनुष्य का ब्रह्मांडव्यापी चैतन्य ऊर्जा से स्वतः संबंध स्थापित हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों से समूचा विश्व-ब्रह्मांड भरा पड़ा है और ये प्रकाश की गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं। उनके अनुसार ये कण निर्बाध रूप से अहर्निश हमारी काया के आर-पार आते-जाते रहते हैं। एक गणितीय आकलन के अनुसार एक व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में कुल 1024 माइण्डान्स या न्यूट्रिनो कण शरीर से गुजर चुके होते हैं। हमारी मानसिक विचार-तरंगें इन्हीं तरंगों पर, कणों पर सवार होकर सृष्टि के एक कोने से दूसरे कोने तक तथा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचती हैं। इसमे प्रमुख भूमिका इसके वाहक कणों की ही रहती है। हमारे माइण्डान्स जितने परिशोधित, परिष्कृत एवं प्रचंड होंगे, हम दूसरों को प्रभावित करने एवं सहयोगी बनाने में उतने ही अधिक सफल होंगे।

ध्यान धारण के प्रयोग

हमारी मनश्चेतना विराट मन से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। भूल व अज्ञानतावश हम इस तथ्य से अनभिज्ञ बने रहते हैं और विराट चेतना के दिव्य अनुदानों से वंचित रहते हुए, दी-हीन जीवन व्यतीत करते हुए अंततः इस संसार से खाली हाथ विदा हो जाते हैं। मन पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों की परतों को यदि उतार फेंका जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि हम उसी विराट चेतना के अंश हैं और घनिष्टता से उससे जुड़े भी हुए हैं। परमाणु सत्ताकी सूक्ष्मप्रवृत्ति का विश्लेषण करते हएु भौतिक विज्ञानी भी अब इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एक ही अणु के दो सक्रिय इलेक्ट्रॉन यदि पृथक दिशा में कर दिए जाएं, तब भी वे अपना संबंध एवं संपर्क-सूत्र बनाए रखते हैं। वे कितनी ही दर क्यों न रहें, दर्पण के प्रतिबिंब की तरह अपनी स्थिति का परिचय एक दूसरे को देते रहते हैं। किसी प्रकार यदि एक इलेक्ट्रॉन को प्रभावित किया जाए, तो दूर रहते हुए दूसरा स्वतः प्रभावित होता है। चेतना के क्षेत्र में तो यह बात और भी घनिष्ठता से लागू होती है। वेद-उपनिषद्, दर्शन सहित समूचा आर्य वाड्मय इस सत्य को प्रमाणित करता है। आइस्टीन, रोजेन, पॉटोलस्की जैसे विश्वविद्यालय व महान वैज्ञानिकों ने भी इसी सत्य का प्रतिपादन करते हुए यह माना है कि इस छोटे से घटक की तरह ही समूचा विश्व-ब्रह्मांड एक सूत्र-संबंध में पिरोया हुआ है।