Wednesday, January 2, 2013

अशांत चित्त को सुख कहां



कई लोगों को शांति से रहना जरा भी नहीं सुहाता है। उन्हें हमेशा परेशानियां ओढ़े रहने की ही आदत पड़ जाती है। न वे स्वयं खुश रहना जानते हैं न अपने आसपास किसी को खुश रहने देते हैं।
अपनी बेचैनी के आलम में वे कई रोग पाल लेते हैं, उनमें एक गंभीर और बहुत आम रोग है उच्च रक्तचाप या हाई ब्लडप्रेशर। पेट में अल्सर का कारण भी कई बार चिंता ही होती है इसके अलावा कई प्रकार के मानसिक रोग तो हैं ही।
मन की अशांति ही चिंताओं को जन्म देती है। शांत, स्थिर मन चिंताओं से निपटना जानता है, जबकि अस्थिर, अशांत मन उसे केवल और बढ़ाता है। कहते हैं चिंता, चिता के समान होती है। स्वयं इसका शिकार भी इससे छुटकारा जरूर चाहता है, लेकिन स्वभावगत मजबूरी के कारण ही वह ऐसा नहीं कर पाता है।
एक उन्मुक्त ठहाका फिजूल की निराधार चिंताओं से निपटने का अच्छा तरीका है, इससे क्रोध व तनाव दूर होता है, अधिक स्फूर्ति और प्रफुल्लता का संचार होता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जीवन में सफलता पाने के लिये फंडा दिया होना आवश्यक है। क्रोध, चिंता, तनाव तथा चिड़चिड़ापन ऊर्जा का नाश करते है और काबिलियत कम करते हैं।
युरोपियन फिलासफर स्वेट मार्डेन का कथन है कि आप अपनी इच्छाशक्ति (विलपावर) को इतना मजबूत बनाये कि वह सारी चिंताओं को जादूगर की तरह गायब कर दे।
कई लोगों को आदत होती है कि वे कार्यस्थल की तमाम परेशानी वहीं पर न छोड़कर घर साथ ले आते हैं। इससे खुद दो दु:ख पाते ही हैं अपने परिवार को भी दु:ख के अंधेरों में डुबो देते हैं।
हर समस्या का कोई न कोई हल जरूर होता है। आशावादी सकारात्मक सोच लिये समस्याओं से जूझकर उसके हल तक पहुंच जाते हैं, लेकिन अशांत मन लिये बौखलाहट में (नकारात्मक सोच ऐसे लोगों पर जल्दी हावी हो जाती है) व्यक्ति उस हल को अनदेखा, किये रहता है या यूं कहें, उसे ढूंढ नहीं पाता है।
जीवन में अगर दु:ख परेशानियां हैं तो क्या सुख, आनंद, हंसी के फव्वारे, मीठी मुस्कानें नहीं है? एक शिशु की भोले दंतविहीन चेहरे की प्यारी मासूम सी मुस्कराहट पर जरा ध्यान दें।
कोयल की मीठी तान का जादू मस्तिष्क में गुंजित होने दें। कलकल बहती चांदी-सी नदी पर सूर्य रश्मियों की अठखेलियां देखें वी हैव नो टाइम टू स्टैंड एंड स्टेयर को झुठलाते हुए प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करके तो देखें।
इससे मन को वह सुकून और निश्चल आनंद मिलेगा, जिसमें आपका तन-मन रसप्लावित हो उठेगा। आनंद की लहरें आपके मन को तितली के परों की मानिंद हल्का कर देंगी। आपको लगेगा वाकई जीवन कितना सुंदर और जीने लायक है।
सोचिए अगर जीवन में समस्याएं न हों तो जीवन से एक ी धारा में बहता जाए तो वह जीवन नीरस नहीं हो उठेगा? जीवन में कठिनाइयां तो हमारी शक्तियों को जाग्रत करती हैं, ऊर्जा पैदा करती हैं वरना तो आदमी बेहद आलसी हो जाएगा।
आज तो जी लें कर की कल देखेंगे, जैसी सकारात्मक सोच ही चिंता दूर रखती है। कई लोगों की आदत में शामिल होता है कि हर समय रोते रहना और चिंता करना। बबलू पैदा नहीं हुआ कि उसके भविष्य की चिंता कर करके सुखना बनिस्बत उसके आगमन का जश्न मनाने के, कि हाथ बुढ़ापे में हमारा क्या होगा। हमारे पास पैसा होगा या नहीं। कहीं वर्ल्ड वॉर छिड़ गया तो क्या होगा। जहां जीवन में अगले पल का भरोसा नहीं, वहां यह सोच-सोचकर वर्तमान को भी खो देना, उसे भरपूर न जीना कहां की समझदारी है। यहां खुशमिजाज, केयरफ्री रहने का मतलब यह हर्गिज नहीं कि व्यक्ति गैर जिम्मेदार हो जाए। बस जीने का सलीका आना चाहिये।

Wednesday, December 19, 2012

नकारात्मक विचार हानिकारक हैं स्वास्थ्य के लिये

बुरे विचारों का मस्तिष्क में हर समय चिंतन करते रहना रोगों का मूल कारण है। नीच और हीन विचारों से मनुष्य का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता चला जा रहा है।


बुरे विचार अपने साथ चिंता, भय, क्रोध, कलह आदि लाते हैं। ये ऐसी अग्नियां हैं जो थोड़े ही दिनों में सारा भाग जलाकर आदमी को खोखला कर देती है।

हर घड़ी स्वार्थ, भय, चिंता, अनुदारता और लोभ से भरे विचार मस्तिष्क में रहने से गंभीर बीमारी का आगमन दिखाने लगता है। अच्छी और कीमती दवाइयां भी बेअसर होने लगती हैं। असयम मानसिक रोगी को मौत के मुंह में जाते देखा जाता है।

शरीर में समस्त ज्ञान तंतुओं का संबंध मस्तिष्क से रहता है और वहीं से प्रेरणा प्राप्त होती है। मन मस्तिष्क में उठने वाले विचारों का, रस उत्पन्न करने वाली ग्रंथियों, पाचन अवयवों और शरीर के अंगों पर असर पड़ता रहता है। इस संबंध में कुछ शरीर शास्त्रियों की सम्मतियां इस प्रकार हैं।

डा.आल्टन लिखते हैं कि भय,र् ईष्या, घृणा, निराशा, अविश्वास और मानसिक विकार शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं को मंद करके खून को सुखा देते हैं। डा. वेन लिखते हैं संताप और मनोव्यथा के कारण कई लोगों की मृत्यु हो गयी और अनेकों का मस्तिष्क खराब हो गया।

डारबिन साहब कहते हैं चिरकालीन चिंता से रक्त की गति धीमी हो जाती है और चेहरे पर पीलापन मांस-पेशियों में शुष्कता आ जाती है, पलकें झूल पड़ती हैं, छाती बैठ जाती है, गरदन झुक जाती है एवं होंठ, जबड़ा और सिर आदि गिर जाते हैं। हंसते आदमी पर घोर उदासी छा जाती है।

डा. तुकेने का कथन है कि पागलपन, लकवा, हैजा, यकृत रोग, बालों का जल्दी सफेद होना, गंजापन, रक्त की कमी, गर्भपात, मूत्र रोग, चर्म रोग, फोड़े, पसीने की अधिकता, दांत जल्दी गिरना आदि रोगों की जड़ में भय या संताप छिपा रहता है।

उपरोक्त सम्मतियों से यह स्पष्ट होता है कि मन में बुरे विचार लाने से शरीर का अनिष्ट होता है, अत: स्वस्थ रहने की इच्छा रखने वालों को चाहिये कि सदैव प्रसन्न रहें, दुष्ट विचारों को पास न फटकने दें। जिन्हें बुरे विचार घेरे रहते हैं, उन्हेंं स्वास्थ्य एवं सतसंग करना चाहिये। अच्छा साहित्य जो समाधानकारी हो का पठन पाठ्न करना अति उत्तम रहता है।

व्रत, अनुष्ठान, जप, गोदान, अन्नदान आदि कार्य बीमारी दूर करने के लिये कराने का हिंदू धर्म शास्त्रों में विधान है और उसका पालन निष्ठापूर्वक होता है। इन कार्यों में रहस्य यह है कि रोगी में त्याग, उदारता वाली भावनाएं पनप जाएं और कठिन कष्ट को दूर कर दें। जिन रोगियों को धन की सुविधा न हो, उन्हें 'राम नाम' या 'गायत्री महामंत्र' अथवा अन्यमंत्र जपने की क्रिया करनी चाहिये।

इस तरह भावनाओं में परिवर्तन से मानसिक स्तर पर रोगी को काफी राहत महसूस होगी। मन के कोने में जगह बनाकर बैठे दुष्ट विचारों का निष्कासन प्रारंभ होगा और उनके स्थान पर सदवृत्तियों से परिपूर्ण विचार स्थान लेने लगेंगे। रोगी जो मानसिक स्तर पर बीमार था। अपने को हल्का व स्वस्थ अनुभव करने लगेगा। ऐसा तत्काल तो नहीं लेकिन कुछ समय गुजरने पर स्थायी लाभ अवश्य मिल कर रहता है। शर्त एक ही है कि क्रम बना रहना चाहिये।



बड़ा शक्तिशाली है हमारा मन

मन को एक महाशक्ति माना गया है। जिस तरह हमारे समूचे कायतंत्र-संचालन मन द्वारा होता है, उसी प्रकार सृष्टि का-समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड नियमन-संचालन विराट मन से होता है। मानवीय मन चेतन और अचेतन नामक दो प्रमुख भागों में विभक्त होता है। अचेतन मन रक्तभिसरण, आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास जैसे अनवरत गति से होते रहने वाले क्रियाकलापों का नियंत्रण करता है। चेतन मन के आदेश से ज्ञानेंद्रियां, कर्मेद्रियां, एवं दूसरे अवयव काम करते हैं। अनियंत्रित मन अस्त-व्यस्त हो जाता है और विभिन्न प्रकार की बेढंगी हरकतें-हलचलें करने लगता है। शरीर को नीरोग एवं परिपुष्ट रखने के लिए मन को संयमी और सदाचारी, निर्मल और पवित्र बनाना पड़ता है।


मन मस्तिष्क की जानकारी

निष्कपट, पवित्र, सुसंस्कारित एवं प्रखर मन जब विराट मन से जुड़ जाता है तो वह सुपरचेतन स्तर को प्राप्त कर लेता है। यही वह क्षेत्र है, जिसे ॠध्दि-सिध्दियों का भांडागार कहा जाता है। आत्मा को परमात्मा से, व्यष्टि से समष्टि को मिलाने में यही मन सेतु का काम करता है। अब तो मनोविज्ञानियों, परामनोवेत्ताओं एवं अनुंसधार्नकत्ता चिकित्साविदों ने भी इस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि मानसिक क्षेत्र की विकृतियां ही शरीर और मस्तिष्क को रुग्ण एवं विक्षुब्ध बनाती हैं। मानसिक परिशोधन के बिना न तो आरोग्य समस्या का पूर्ण समाधान हो सकता है और न जीवन की अन्यान्य समस्याएं ही सुलझ सकती हैं। मानसिक परिष्कार के बिना अध्यात्म-साधना के क्षेत्र में तो एक पग भी आगे नहीं, बढ़ा जा सकता। मनःशक्ति जड़ जगत और चेतन जगत के बीच का एक महत्वपूर्ण सेतु है, घटक है। इसलिए लौकिक जीवन में इसका सर्वोपरी महत्त्व है। जेनेटिक साइंस के नवीनतम शोधों ने यह भी रहस्योद्धाटन किया है कि शरीर की समस्त कोशाएं तथा परमाणु पूरी तरह मनःशक्ति के नियंत्रण में हैं। यही क्रम वंश -परंपरा में भी तथा मरणोत्तर जीवन में समानरूप से गतिशील बना रहता है। मनोवेत्ता फ्रायंड के 'सुपरईगो' आदि की परिधि तक सीमित मन को प्रख्यात जर्मन मनोवैज्ञानिक हेंस बेंडर अतींद्रिय क्षमता तक ले जाने में सफल हुए। इसके लिए उन्होंने अनेक प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। टेलीपैथी पर अत्यधिक खोज-बीन करने वाले मूर्ध्दन्य परामनोवेत्ता रेनेबार्क लियर के अनुसार मन की व्याख्या पदार्थ विज्ञान के प्रचलित सिध्दांतों द्वारा संभव नहीं है। अतः इसके क्रियाकलापों के लिए भी इससे परे सोचने-समझने की बुध्दि विकसित की जानी चाहिए। तभी चेतना से अथवा चेतना से परे जाकर संबंध, संपर्क बना पाना संभव है और यह सब मानसिक परिष्कार के बिना संभव नहीं हैं। यों तो भौतिक विज्ञानी मन-मस्तिष्क को एक मानकर उसी की खोज-बीन में गंभीरतापूर्वक संलग्न हैं। इतने पर भी तन-मस्तिष्क की समूची जानकारी अभी उनके हाथ नहीं लगी, अन्यथा उसमें एक से एक बढ़कर विलक्षणाताएं और संभाावनाएं सन्निहित हैं। मस्तिष्कीय परमाणु में भार, घनत्व, विस्फूटन तथा चुंबकीय क्षेत्र का भौतिक परिचय देने वाले तत्त्वों की खोज करते समय वैज्ञानिक ऐसे अतिसूक्ष्म विद्युतीय कणों के संपर्क में आए हैं, जिनमें भौतिक परमाणु जैसे लक्षण नहीं हैं। ये विद्युतकण आकाश में स्वच्छंद बिचरण करने में सक्षम हैं। इनमें भौतिक परमाणुओं को वेधकर निकल जाने की क्षमता है। इन कणों का नियंत्रण-नियमन भी संभव नहीं है। इन्हें पकड़कर स्थिर भी नहीं किया जा सकता। इन कणों की उपस्थिति का बोध भी परस्पर टकराव कारण हो पाता है। वैज्ञानिक इन कणों को ही अतींद्रिय क्षमताओं के विकास के लिए उत्तरदायी मानते हैं। सुप्रसिध्द, गणितज्ञ एवं विज्ञानवेत्ता एड्रियो हॉब्स ने इन काणों को 'न्यूट्रिनो' नाम दिया है, तो कुछ वैज्ञानिक इन्हें 'माइण्डास', 'साइन्नोंस', आदि नामों से पुकारते हैं। अनुसंधार्नकत्ता वैज्ञानिकों का कथन है कि जब मस्तिष्क के न्यूरोन कण इन माइण्डांस कणों के संपर्क में आते हैं, तब पूर्वाभास जैसी घटनाओं की अनुभूति होती है। इससे सिध्द होता है कि ब्रह्मांडव्यापी घटनाओं का मूल उद्गम एक है तथा मानवीय मनश्चेतन का उससे किसी न किसी रूप में संबंध अवश्य है। साइन्नोन कणों का मस्तिष्कीय चेतन पर किस तरह प्रभाव पड़ता है, इस पर वैज्ञानिक गंभीरतापूर्वक अनुसंधानरत हैं। सुप्रसिध्द विज्ञानी एक्सेल फेरिसिस का इस संबंध में कहना है कि जब साइन्नोन कण न्यूरोन कणों से मिलते हैं, तब माइण्डान या माइन्जेन नामक ऊ र्जा कणों का जन्म होता है। इससे मनुष्य का ब्रह्मांडव्यापी चैतन्य ऊर्जा से स्वतः संबंध स्थापित हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों से समूचा विश्व-ब्रह्मांड भरा पड़ा है और ये प्रकाश की गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं। उनके अनुसार ये कण निर्बाध रूप से अहर्निश हमारी काया के आर-पार आते-जाते रहते हैं। एक गणितीय आकलन के अनुसार एक व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में कुल 1024 माइण्डान्स या न्यूट्रिनो कण शरीर से गुजर चुके होते हैं। हमारी मानसिक विचार-तरंगें इन्हीं तरंगों पर, कणों पर सवार होकर सृष्टि के एक कोने से दूसरे कोने तक तथा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचती हैं। इसमे प्रमुख भूमिका इसके वाहक कणों की ही रहती है। हमारे माइण्डान्स जितने परिशोधित, परिष्कृत एवं प्रचंड होंगे, हम दूसरों को प्रभावित करने एवं सहयोगी बनाने में उतने ही अधिक सफल होंगे।

ध्यान धारण के प्रयोग

हमारी मनश्चेतना विराट मन से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। भूल व अज्ञानतावश हम इस तथ्य से अनभिज्ञ बने रहते हैं और विराट चेतना के दिव्य अनुदानों से वंचित रहते हुए, दी-हीन जीवन व्यतीत करते हुए अंततः इस संसार से खाली हाथ विदा हो जाते हैं। मन पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों की परतों को यदि उतार फेंका जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि हम उसी विराट चेतना के अंश हैं और घनिष्टता से उससे जुड़े भी हुए हैं। परमाणु सत्ताकी सूक्ष्मप्रवृत्ति का विश्लेषण करते हएु भौतिक विज्ञानी भी अब इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एक ही अणु के दो सक्रिय इलेक्ट्रॉन यदि पृथक दिशा में कर दिए जाएं, तब भी वे अपना संबंध एवं संपर्क-सूत्र बनाए रखते हैं। वे कितनी ही दर क्यों न रहें, दर्पण के प्रतिबिंब की तरह अपनी स्थिति का परिचय एक दूसरे को देते रहते हैं। किसी प्रकार यदि एक इलेक्ट्रॉन को प्रभावित किया जाए, तो दूर रहते हुए दूसरा स्वतः प्रभावित होता है। चेतना के क्षेत्र में तो यह बात और भी घनिष्ठता से लागू होती है। वेद-उपनिषद्, दर्शन सहित समूचा आर्य वाड्मय इस सत्य को प्रमाणित करता है। आइस्टीन, रोजेन, पॉटोलस्की जैसे विश्वविद्यालय व महान वैज्ञानिकों ने भी इसी सत्य का प्रतिपादन करते हुए यह माना है कि इस छोटे से घटक की तरह ही समूचा विश्व-ब्रह्मांड एक सूत्र-संबंध में पिरोया हुआ है।



Thursday, November 8, 2012

तनाव की समस्या एवं उपाय

आज की आपाधापी एवं तेज रफ्तार जीवन शैली में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है तो तनाव से युक्त न हो। आज के युग में छोटे-छोटे बच्चे भी तनावग्रस्त रहने लगे हैं। तनाव एक ऐसी समस्या है जो व्यक्ति को अंदर अंदर ही खोखला बना देती है। जब इसकी अति हो जाती है यह एक गंभीर रोग का रूप ले लेता है। तनाव से हर कोई व्यक्ति ग्रस्त है। कुछ लोग तनाव को बेवजह पालते हैं तो कुछ लोग व्यर्थ की चिंताओं में ग्रस्त होकर अपने वर्तमान और भविष्य को नष्ट करते हैं। इसके साथ ही तनाव अनेक रोगों और समस्याओं को जन्म देता है जिसमें भूख न लगना, काम में मन न लगना, चिड़िचिड़ापन, क्रोध, कब्ज आदि मुख्य है।


तनाव से हानियां :-

* तनाव के कारण व्यक्ति को भूख कम लगती है जिससे व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है।

* तनाव रक्तचाप को बढ़ाता है जो हृदय रोग का कारण बनता है।

* तनाव सिरदर्द की समस्या को उत्पन्न करता है। अत्यधिक तनाव आयु को कम करता है।

* तनाव के कारण शरीर असंतुलित हो जाता है जिसके कारण बदहजमी और पेट दर्द की समस्या उत्पन्न होती है। नींद नहीं आने से स्वास्थ्य में गिरावट आती है।

* मानसिक तनाव के कारण चेहरे की मांसपेशियों पर अनावश्यक दबाव पड़ता है जिसके कारण त्वचा में झुर्रियों पड़ता है जिसके कारण त्वचा में झुर्रियों की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

तनाव कम करने के उपाय :-

* धार्मिक कार्यों में रूचि उत्पन्न करें, इससे आपको आत्म संतुष्टि प्राप्त होगी।

* परिवार के लोगों के साथ मिलकर बैठें, साथ भोजन करें और अपनी समस्या पर विचार करें।

* अपनी रूचि का कार्य करें। बागवानी, चित्रकला संगीत, सिलाई कला, पेंटिंग, यदि विद्वान हों तो रचनाएं लिखकर या आलेख लिखकर अपने तनाव को कम किया जा सकता है।

* योग करना तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना है।

* अपने अंदर छुपी रूचि को विकसित करने का प्रयास करें।

* कभी भी किसी विषय पर अत्यधिक गंभीर न हो।

* नींद न आना या फिर कम सोना भी तनाव का महत्वपूर्ण कारण है इसलिये भरपूर नींद लें। यदि नींद नहीं आती हो तो सोने से पूर्व अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करें।

* नियमित सैर व व्यायाम का अभ्यास करें। प्रात: जल्दी उठकर ताजी हवा में सांस लें। एकांत में रहने के विपरीत साथ समूह में बैठें। मनोरंजन के लिये टीवी देखें।

* हंसने और मुस्कराने की आदत डालें, ये दोनों आदतें तनाव को कम करने में प्रभावशाली हैं।

* आदतों में बदलाव लाएं, कभी-कभी गलत आदतें और व्यवहार भी हमें तनावग्रस्त में रखता है।

* आपसी विवाद से बचें एवं किसी मामले में झगड़ा फसाद व क्रोध न करें।

Monday, October 1, 2012

मुस्कराकर सामना कीजिए जीवन की समस्याओं का

अक्सर अपने दैनिक जीवन में किसी भी छोटी या बड़ी समस्या के उठने पर हम सहायता-सलाह के लिये झट से दूसरों के पास दौड़ जाते हैं। अपनी समस्या किसी एक से नहीं कई से कहते हैं और कई तरह के हल भी पाते हैं। अच्छा यही है कि ऐसे में सुनी समझी तो सभी की जाए पर किया वही जाए जो हमें हमारी स्थिति, सुविधा के हिसाब से सही प्रतीत हो। कई बार दूसरों के सुझाए तरीकों से काम करने के कारण जब असफलता हाथ लगती हैं, तब जहां नुकसान होता है, वहीं मन भी क्लेश पाता है। संबंधों में भी दरार पड़ने की संभावना रहती है। शिकायत करने पर सलाह देने वाला बड़ी आसानी से, 'अरे, क्या हम कहेंगे कि कुएं में गिर पड़ो तो कूद जाओगे? अपनी बुध्दि भी तो चलाते' कहकर, हाथ झाड़ू, न केवल अलग हो जाता है वरन् हमारी समस्या, बुध्दि के दिवालिएपन का बखान करेगा, हमें मूर्ख साबित करेगा।

जीवन उतार-चढ़ाव का नाम है। यहां केवल फूल ही फूल नहीं हैं। सुख और दु:ख दोनों ही जीवन में होते हैं। इन्हें हिम्मत से, कभी सुख व कभी दु:ख महसूस करके ही पार किया जाता है। कोई भी समस्या चाहे कितनी ही गहन, गंभीर हो, जी घबरा दे, पर यदि धीरज से, अपने तमाम हालात को ध्यान में रखकर इनका मुकाबला किया जाए तो सफलता मिल सकती है व बखूबी आत्मविश्वास को दृढ़ बनाकर आगे से आगे बढ़ा जो सकता है। बशर्ते प्रक्रिया व मानसिकता मौलिक व सुचारू हो। शुरू-शुरू में छोटी अनपेक्षित बात, व्यवहार या स्थिति भी तीखी प्रतीत होती है। इस पर हमारी प्रतिक्रिया भी तीखी व आक्रामक ही होती है पर यदि कुछ समय मौन रहकर पूरी समस्या पर सिलसिलेवार ढंग से विचार किया जाए तो कई हल भी खुद ही सूझ पड़ेंगे। हलों के इन तमाम विकल्पों से तब कोई भी एक अच्छा विकल्प खोजा जा सकता है। किसी भी समस्या के उठने पर उसके बारे में परिणाम बुरे से बुरे क्या हो सकते हैं, सोचकर अब यत्न करना कि कैसे हालात ठीक किये जाएं। ज्यादा व्यवहारिक सोच है।

अनेक बार ऐसी विपरीत स्थितियां उपजने लगती हैं, जो तन-मन को व्यथित करती हैं। बहुत संभव है कि ऐसे हालात को हम बदल न पाएं पर इस स्थिति में भी यह तो संभव है कि हम उन घटनाओं, स्थितियों व हालात को देखने का नजरिया ही बदल लें। अब विचार बदलते ही भावनाएं भी बदलने लगेंगी। हौसला, उमंग, उत्साह बढ़ेगा व चिंता दूर होगी। समस्याओं से जूझने वाले जुझारू व्यक्ति ही मनचाही सफलता पा सकते हैं। आत्मविश्वास बनाये रख पाते हैं और फिर आगे के जीवन में उसी स्तर की व उससे हल्की समस्या को देखकर तनिक भी नहीं घबराते।

अपने अंदर ऐसा गुण विकसित करना जरूरी है, दो दु:खों में भी संतुलन रख पाए व कठिनाइयों का भयावह रूप नहीं, बल्कि उसका भी कोई भला पक्ष देख सके। यह प्रकृति का शाश्वत नियम है कि बुरे से बुरे में भी कोई न कोई अच्छाई छिपी रहती है। हम चूंकि काला चश्मा लगाकर संसार को देखते हैं। अत: हमें सब कुछ बेमानी, समस्या भरा ही दिखता है, जबकि उजला पक्ष भी है। बस, देखने भर की जरूरत है। अपनी परेशानियों में घिरकर, उनका जहां-तहां बखान करेक उसके तनाव के मकड़जाल में खुद को कैद करने व फड़फड़ाने से कहीं बेहतर व सुरक्षित उपाय है अपने अस्तित्व को अब भी बनाए रखना। अपनी दिक्कतों को अनदेखा कर उन साधनों, उपलब्धियों को महसूस करना, जो हमारे पास हैं। विपरीत हालात में भी धैर्य न खोकर सिर ऊंचा करके हंस सकना हमारे मानसिक संबल व साहस का प्रतीक है। कहा भी है- 'हंसी साहस का नाम है। खासकर तब, जब वह खुद पर हंसी जाए।'

प्राय: लोग व्यवसाय, स्वास्थ्य व परिवार में संतुलन नहीं रख पाते व सुख का कोई न कोई छोर गंवा देते हैं। अवसाद के क्षणों में एकाकी हो जाना, सबसे कटना व अवसादी हो जाना, घुटनों में सिर छिपाकर यह आस करना कि सुख व अनुकूल हालात आपका दरवाजा खटखटाएंगे, भूल है। सुख खुद खोजना होता है। सुख हमारी सोच में हैं। अत: जरूरी है कि हर हाल में खुश बने रहने की आदत पालें। अपने लिये भी जियें व जो सुख हमें उपलब्ध है, को शिद्दत से महसूस करें। प्राय: अनुकूल हालात बड़ी कठिनाइयों से मिलते हैं पर प्रतिकूलता हम स्वयं अपनी नादानी से जुटा लेते हैं। जो है, उसे महसूस करके चैन पाना व जो नहीं है, उसे प्राप्त करने का यत्र करना ही जीवन है। अपने भीतर स्फूर्ति, उत्साह महसूस करना जरूरी है। इसके लिये अपनी रूचि, पसंद का कोई काम करना, अपेक्षाओं को न पालना जरूरी है, जो बदला जा सकना संभव है, उसके लिये यत्न जरूरी है पर जो बदला नहीं जा सकता, उसे स्वीकार कर लेना ही समझदारी है।

किसी को यह पता नहीं कि उसके साथ कब क्या घटने वाला है। किसी दुर्घटना के लिये तैयार रहने की पूर्व योजना बना लेना संभव ही नहीं है। अच्छा यही है कि मानसिक तौर पर सदैव किसी भी अनपेक्षित समस्या के लिये तैयार रहा जाए, किसी समस्या के किसी भी रूप से निपटने के लिये मानसिक तौर पर तैयार व्यक्ति उस समस्या के उठने पर ज्यादा सामान्य व्यवहार कर पाता है। जो ऐसा नहीं करते, उनके लिये इस बात की पूरी-पूरी संभावना रहती है कि उन्हें जब-तब आहत होना पड़े, हौसला गंवाना पड़े। यदि हम अप्रत्याशित बातों की अपेक्षा करना सीख लें तो उनके उभरने पर उनकी उपेक्षा कर पाएंगे और तब जीवन के सुख-दु:खों का मुकाबला धैर्य से बिना टूटे कर भी पाएंगे। आत्मविश्वास और मनोबल तो हमारी थाती रहेगा ही, जो हमें जीने को उत्साही बनाये रखेगा।

ध्यान : जिन्दादिली के लिए केवल दो क्षण...

स्वास्थ्य अर्थात 'स्व' में स्थिति हम सहज, संतुलित, सुखी नहीं है इसलिए स्वस्थ भी नहीं है। शरीर का मात्र निरोग या बलवान होना स्वास्थ्य नहीं है। स्वास्थ्य का संबंध मन, मस्तिष्क, प्राण व आत्मा से भी है। सभी स्तरों पर विकार सेगमुक्त व मजबूत रहे बिना स्वस्थ नहीं रहा जा सकता।


लोभ, आसक्ति, क्रोध, वासना वगैरह से सनी दिन भर की भागदौड़, रात में भी तनाव के साथ सोना, सुबह उठने पर शरीर, मन, मस्तिष्क भारी दुखन चुभन थकावट ये स्वास्थ्य के लक्षण तो नहीं है। कसौटी है जिंदादिली। इसकी उपलब्धि के कई सोपान हैं, कई आयाम हैं। यहां प्रस्तुत हैं ध्यान की एक निहायत सरल विधि जो चाहेगी आपसे सिर्फ दो क्षण।

जब सुबह आप आंखें खोलो तो अपने ऊ र्जा से आते-आते आपकी गति कम होती जाए। रात तक आप ढीले हल्के हो जाएं। जब नींद की ओर अग्रसर हों, तो न कोई विचार न उत्तेजना, बस एक ठहराव की स्थिति। सैक्स सेलिब्रेशन हो तो वह भी तनावमुक्त, बिल्कुल नार्मल, कोरे कागज की अवस्था में समर्पित स्थिति में एक जिस्म, एक जान की अनुभूति के लिए। यही नैसर्गिक हैं, लेकिन है हमसे सर्वथा दूर।

शयन से पूर्व बिस्तर पर लेटे हुए यह भावे लाओ कि सुबह मैं प्रसन्न व तरोताजा महसूस करूंगा। संसार भावनामय है। इमोशन से हीन इंसान यंत्र है। उसकी जिंदगी में आनंद के निसर्ग के फूल नहीं खिल सकते। आप विचार शून्य, तनाव रहित होकर हृदय से केवल भाव करो। स्वयं को सुझाव दो तो भी सिर्फ भाव करो कि ऐसा होगा इस सुझाव में आदेश न हो कि ऐसा होना चाहिए। प्रतिज्ञा हठ या दृढ़ संकल्प से कठोरता आती है। आदेश अचेतन में द्वंद्व पैदा करता है। कुछ भी सहज व नैसर्गिक नहीं रह जाता। हमारा समाज आज एक विक्षिप्त मनोदश में जी रहा है। हर चीज निसर्ग के विपरित है, अप्राकृतिक है, यांत्रिक है। जरूरत मौलिकता की है, परम आंनद फलित तभी होगा।

बस सहज भाव से आदेशित नहीं, समर्पित स्वभाव से सुझाव दो कि ऐसा होगा। अगर चित्त की इस दशा से नींद में प्रवेश होगा तो सुबह प्रसन्नता व ऊर्जा से भरी मिलेगी। इसलिए कि शरीर व मन के बीच संवाद हो सकेगा। यह ध्यान मन के अवचेतन में प्रवेश कर इतना गहरा विश्राम और सुकून देता है कि जो गहरी से गहरी निंद्रा में भी संभव नहीं। नींद में तन सोता है मगर मन जागा रहकर, दिन में जो नहीं कर पाया होता वे सारे उपद्रव सपने में करता है।

ध्यान शरीर और मन के साथ आपका संवाद कराता है। यह सौहार्दपूर्ण संवाद आहिस्ता आपको स्वस्थ नींद में ले जाता है जहां न आप जागे होते हैं न सोए होते है। तंद्रा की यह अवस्था सम्मोहन में ट्रान्स कहलाती है। इस स्थिति में मस्तिष्क के भीतर अल्फा तरंगे पैदा होती हैं जो मन को सजग और शिथिल बनाकर देह व मन के बीच समस्वरता कायम करती हैं। इस क्षण में मस्तिष्क की तरंगे उतनी ही होती है। जितनी कि पृथ्वी की एक सेकेंड में लगभग सात साइकल्स मात्र मां की गोद में निश्चित लेटे हुए नवजात शिशु अथवा समग्र प्रेम न्यौछावर करने वाले प्रेमी की बाहों में पड़ी प्रेमिका जैसी अनुभूति मिलती है। या फिर जैसी आप चाहे।

अब दूसरी बात। सुबह जेसे ही जागो, तुरंत आंखें मत खोलो। रात शयन से पूर्व वाले सुझाव को दुहराओ। बस इस भाव में आओ कि मैं प्रसन्न हूं। मुझे प्रसन्न होना है ऐसा नही, बस मैं प्रसन्न हूं, तरोताजा हूं, ऊ र्जा से लबरेज हूं। इस करवट से उस करवट बदलते हुए इस भाव को चारों ओर से आवृत्त कर लेने दो। जागरण का सर्वाधिक मूल्यावान और अदभूत यह क्षण जो अनुभूति देगा वह आपकी चेतना में गहरे बैठ जायेगा।

रात सोने से पहले और सुबह आंख खोलने से पहले के ये दो क्षण 24 घंटे में सबसे महत्वपूर्ण क्षण हैं जब आप अपने अचेतन के सबसे करीब होते हैं। परदा गिरने के इर क्षणों में दिया गयाआपका सुझाव, आंतरिक भाव अचेतन आसानी से सुन लेता है। मनोविज्ञान और अब विज्ञान भी कहता है कि अचेतन जैसे ही कोई सुझाव सुनता है वह कारगर हो जाता है। इस अनुसार चेतना विस्तार होता है और स्वभाव परिवर्तन भी।

मात्र सप्ताह भी उक्त प्रयोग करें। आप पर यह काम करता है तो जारी रखें अन्यथा दूसरे आयामों सोपानों या प्रयोगों की ओररूख करें। जीवन-दर्शन विषयक किसी जिज्ञासा अथवा जिंदादिली से लबरेज जिंदगी के लिए किसी तरह के सहयोग सर्वथा निःशुल्क हेतु मो. 09897513837 पर अपना नाम, उम्र काम, स्टेशन, वैवाहिक स्तर व शिक्षा हडि्डयों का कमजोर हो जाना) से बचने के लिए कैल्शियम की जरूरत होती है।

आवश्यक मात्राः अमेरिका डॉक्टर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 800 मिग्रा एसएमएस करके स्व साक्षात्कार मिशन से संबंध्द हो सकते हैं। फोन से पत्र से अथवा प्रत्यक्ष मार्गदर्शन सहयोग बिना किंचित भी आर्थिक प्रतिदान के प्राप्त कर सकते हैं।

चेतना विकास व स्वास्थ्य के लिए पहले ध्यान का उपरोक्त प्रयोग करें। करके देखने में आपका कोई नुकसान नहीं होगा, आप पर काम कर गया तो आशातीत लाभ होगा। सिर्फ चार-पांच मिनट रात को और एक मिनट सुबह। जल्दी ही आप पायेंगे कि आपका नजरिया, आपका पूरा जीवन धीरे-धीरे बदलने लगा है।

बस रात्रि की यात्रा शुरू करनी है रात्रि के ध्यान से और सुबह की यात्रा शुरू करनी है सुबह के ध्यान से। उज्जवल व आनंदित वर्तमान के लिए हमारी शुभकानाएं। भविष्य के लिए इसलिए नहीं क्योंकि वह वर्तमान के गर्भ में पलता और वर्तमान से ही निकलता है।