Friday, August 17, 2012

हंसिए-हंसाइए, रोग दूर भगाइए

जीवन सुख-दुख, अनुकूल-प्रतिकूल, अच्छी-बुरी परिस्थितियों का मिला जुला रूप है। यहां सब कुछ इच्छानुसार नहीं होता। प्रतिकूलताएं आती-आती रहती हैं। जब जीवन में कठिनाइयां-असुविधाएं आती हैं तो मानसिक तनाव और शारीरिक थकान का पैदा होना स्वाभाविक है।

ऐसी स्थितियों में आत्मरक्षा का एक ही कारगर उपाय है- हर समय प्रसन्न रहने के लिए हंसने-मुस्काने का सहारा लिया जाए। हंसते-हंसाते रहने से विषम परिस्थितियों में भी जीवन की गाड़ी आसानी से आगे बढ़ जाती है।

निराशा, उदासी, खिन्नता को दूर करने और भारी मन को हल्का करने में हंसने-मुस्कराने से बढ़िया उपाय दूसरा नहीं है। इसके लिये स्वस्थ मनोरंजन, मनोविनोद, हंसी-खुशी के प्रसंगों को अपनी दिनचर्या में अधिक से अधिक स्थान देना आवश्यक है। ईश्वर ने सभी प्राणियों में मनुष्य को हंसने-मुस्कराने की विशेषता प्रदान कर उसे श्रेष्ठ उपहार दिया है।

जीवन शक्ति को बढ़ाने, मन को प्रसन्नचित्त रखने, तनाव से मुक्ति दिलाने में हास्य बहुत सहायक है। प्रसन्नचित्त व्यक्ति जितने उन्नत, सुखी और शांत देखे जाते हैं, उतने उदास, खिन्न, मनहूस नहीं। प्रसन्न व्यक्तियों की बुध्दि अधिक तीव्र और विचार अधिक स्थिर होते हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों, परेशानियों को झेलने में अधिक समर्थ होते हैं।

रोगी के लिये भी हंसना व प्रसन्नचित रहना बहुत आवश्कता है। जो प्रसन्नचित्त और मुस्कराते रहते हैं, उन पर दवाइयों का असर भी तेजी से होता है और वे शीघ्र ही स्वस्थ हो जाते हैं। ठहाका लगाकर हंसने वालों का पाचन संस्थान अधिक तेजी से कार्य करता है।र् ईष्या, द्वेष, भय, उत्तेजना, क्रोध और चिंता जैसे मनोविकारों के कारण अथवा शारीरिक रोगों के फलस्वरूप शरीर में जो विष उत्पन्न हो जाते हैं, उनके निष्कासन में हंसना बहुत ही सहायक होता है।

प्रसन्न रहने व मुस्कराते रहने के लिए आवश्यक नहीं कि धन, संपत्ति और बहुमूल्य साधन सुविधाएं ही हों। मात्र विचार करने की शैली में परिवर्तन और दृष्टिकोण का सही रखना अत्यन्त आवश्यक है। हंसने मुस्कराने से मन हल्का होता है, ताजगी और स्फूर्ति बनी रहती है।

जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में पानी देने से पत्तियां, फूल, तना और सभी अंग पोषक तत्व प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार हंसने मुस्कराने से शरीर के अंग-अवयवों की सक्रियता और स्फूर्ति भी बढ़ जाती है। यह स्वास्थ्य के लिये महौषधि है।

हंसना, मुस्कराना, प्रसन्न रहना अपने स्वास्थ्य के लिये ही नहीं, घर-परिवार, मित्र, पड़ोसी सभी की प्रसन्नता के लिये बहुत आवश्यक है। इसमें कुछ खर्च नहीं होता, वरन मिलनसारिता और आत्मीयता बढ़ती है तथा स्वस्थ और स्फूर्ति रहा जा सकता है। इसलिए हमें यही प्रयास करते रहना चाहिये कि सदैव हंसते-मुस्कराते बने रहकर प्रसन्न रहा जाय। जो प्रसन्न रहते हैं वास्तव में वे ही सुखी हैं।



Thursday, August 16, 2012

चिंता स्वास्थ्य को खाती है

इस भागमदौड़ भरी जिन्दगी में लगभग हर मनुष्य के जीवन में ऐसे अवसर आते रहते हैं जब चिंताएं उसे घेर लेती हैं। कुछ तो अपनी सूझ बूझ और धैर्य के कारण उनका निवारण कर मुक्ति पा लेते हैं किन्तु कुछ लोग भीरू प्रकृति के होते हैं जो समस्याओं के आ जाने पर उसका हल खोजने के बजाय भीतर ही भीतर चिंता रूपी अग्नि में अपने आपको जलाने लगते हैं।

खैर, इस वास्तविकता को भी नकारा नहीं जा सकता कि चिंताओं से इस भौतिक युग में पीछा छुड़ाना मुश्किल है क्योंकि हमारी इच्छाएं और कार्यक्षेत्र इतना फैल गया है कि चिंताओं से बिल्कुल ही मुक्ति पा जाना तो कठिन है। मनुष्य को चिंताग्रस्त न रहकर उसका उपाय खोजना चाहिये। चिंताओं में घुलते रहने से हमारा स्वास्थ्य और आयु क्षीण होते हैं। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये अध्ययन के द्वारा यह तथ्य सामने आया है कि पुरुषों की तुलना में महिलायें समस्याओं से तीन गुणा ज्यादा चिंतित होती हैं। वे समाधान की ओर ध्यान नहीं देती, उल्टे समस्याओं की भयावहता के बारे में सोच-सोचकर परेशान रहती हैं। उनकी संघर्ष क्षमता, सहनशीलता और सोच बहुत कमजोर होती है। दूसरी तरफ ऐसे पुरुष जो भावुक, भीरू और कमजोर हृदय वाले होते हैं, वे समस्या के परिणाम के विपरीत विषय में ही सोचते हैं। नकारात्मक विचारों के कारण उनका मन मस्तिष्क और शरीर जर्जर हो जाता है और उनकी निर्णय क्षमता भी नष्ट होने लगती है। अत्यधिक चिंता का मानव शरीर पर बहुत बुरा और गहरा प्रभाव पड़ता है। इससे अनिद्रा, डायरिया, पेट की गड़बड़ी, मांसपेशियों में तनाव, मधुमेह, सिरदर्द तथा मानसिक तनाव जैसे रोग घेर लेते हैं। चिंता मनुष्य के स्वास्थ्य को ही नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व को भी नष्ट भ्रष्ट कर देती है। असमय में ही सिर के बाल सफेद हो जाते हैं, चेहरे पर झुर्रियां, मुंहासे और उदासी छाने लगती है। चेहरे का आकर्षण समाप्त होकर युवा असमय में ही वृध्द जैसा दिखाई देने लगता है।

एक बार मशहूर कामेडियन जार्ज बर्न्स से किसी ने पूछा कि चिंता पर विजय पाने का क्या तरीका है, तो उन्होंने उत्तर दिया, अगर कोई काम आपकी पहुंच से परे है तो उसके बारे में बेकार की चिंता करने का कोई औचित्य नहीं है। अगर आप किसी काम को ठीक से निभाने में सक्षम नहीं हैं तो उसके बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है। मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है। उसमें अच्छा-बुरा समझने की शक्ति है। वह अपनी समस्याओं से अपने विवेक और सूझबूझ के द्वारा छुटकारा पाने की सामर्थ्य रखता है लेकिन जानवरों में इस तरह की क्षमता का अभाव होता है।

जब आप समस्याओं से घिर जायें तो अपने ऊपर नकारात्मक भावनाओं को हावी न होन दें। ऐसा करने से मनुष्य अपने होशो-हवास खो बैठता है। मान लीजिए कि आप किसी ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं जो आपको परेशान कर रही है और आप उसका तुरंत कोई उपाय नहीं खोज पा रहे हैं तो ऐसे समय में आपको चाहिए कि चिंताओं को भूलकर अपने मन को किसी दूसरी ओर लगा लेना चाहिए क्योंकि दूसरे कामों में मन लगाने से मूड में सुधार हो जाता है। ऐसे में मित्रों से गपशप लगायें या खेलें। अपनी समस्या के समाधान के लिये मित्रों से भी परामर्श ले सकते हैं। जब आपका उत्तेजित मस्तिष्क शांत हो जाये तो आप अपनी समस्या पर सोचें। चिंताएं अक्सर मिथ्या विश्वास के कारण भी पैदा होती है। ज्यादातर लोगों को, विशेषकर स्त्रियों को यह चिंता होती है कि सब लोग क्या कहेंगे? जग हंसाई होगी आदि। कोई भी व्यक्ति दोष रहित नहीं होता। दृढ़ता और समझदारी से चिंताओं पर विजय पाई जा सकती है। कुछ लोग अपनी चिंताओं से बेहद परेशान हो जाते हैं क्योंकि उसके परिणाम और खतरों को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर सोचते हैं। हमें अपनी समस्याओं से साहसिक और रचनात्मक ढंग से निपटना चाहिये।

आजकल चिंता और तनाव से मुक्ति की दवाएं भी उपलब्ध हैं। शुरू-शुरू में तो इनसे राहत मिल सकती है परन्तु स्थायी तौर पर मुक्ति नहीं मिलती। इसलिये कोशिश होनी चाहिये कि हम अपने दिल दिमाग को मजबूत बनायें जिससे चिंताओं पर काबू पा सकने में समर्थ हो सकें।

चिंता के मूल को समाप्त करना चाहिये। व्यायाम और दूसरी शारीरिक गतिविधियां, हल्का संगीत तथा ध्यान आदि से ही चिंता से तत्कालीन मुक्ति पाई जा सकती है। समस्याओं से जूझिये, घबराइये नहीं, सब ठीक हो जायेगा।

Tuesday, July 10, 2012

तनाव से मुक्ति कैसे मिले

ज्यों-ज्यों सभ्यता के विकास के साथ जीवन की व्यस्तता बढ़ती जा रही है, त्यों-त्यों तनाव उत्पन्न करने वाले कारक भी बढ़ते जा रहे हैं। तनाव कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों का कारण माना जाता है। अतः तनाव से मुक्ति पाने के कुछ उपायों पर चर्चा करना निश्चित रूप से लाभदायक होगा।
तिरुवनन्तपुरम में श्री शेषन नामक विद्वान ने अपने एक भाषण में बताया कि जब किसी के प्रति हमारे मन में क्रोध उत्पन्न होता है तो उसे प्रकट करने में हम प्रायः असमर्थ रह जाते हैं। क्रोध प्रकट करते हैं कटु वचन कहकर, गाली देकर या मारपीट करके। इन सबके परिणाम हमारे लिए अधिक दुःख उत्पन्न करने वाले हो सकते हैं, इसलिए हम बहुधा ऐसे आचरणों से बचना चाहते हैं।
यद्यपि क्रोध को बाहरी आचरण द्वारा प्रकट नहीं करते तो भी क्रोध मन में बना रहता है और समय के बीतते-बीतते यह बैर का रूप धारण कर लेता है। यह ज्यादा गहरा हो जाता है और इसे उखाड़ फेंकना अधिक कठिन हो जाता है।
वैर का लक्षण क्या है? कैसे हम समझ पायेंगे कि हमारे मन में किसी के प्रति वैर छिपा हुआ है? इस संबंध में महात्मा गौतम बुध्द की यह उक्ति बहुत प्रासंगिक लगती है।
अककोछिमं, अवधिमं, अजिनिमं, अहासिमं, येतन्ने पन्हचन्ति
वैरं तेसु न सम्मति- (धम्मपद)
यदि किसी व्यक्ति के संबंध में सोचते ही हमारे मन में यह विचार आये कि उसने मुझे मारा, सताया, मेरा उपहास किया तो निश्चित मानिए कि हमारे मन में उसके प्रति वैर बना हुआ है। जब तक मन की यह प्रवृत्ति बनी रहेगी, तब तक उस व्यक्ति के प्रति हमारा वैर नहीं मिट सकता।
संभव है कि उस व्यक्ति ने कभी हमारा उपकार भी किया होगा और हमारे मन में रूढ़ मूल वैर उसकी याद को ही भुला देता है। यदि उसके किए उपकार का याद आए तो वैर अपने आप क्षीण हो जायेगा?
मेरे एक मित्र हैं डा. मुरलीधरन तंपी जो केरल कृषि विश्वविद्यालय में विज्ञान के प्रोफेसर और निदेशक रहे। वे सेवानिवृत्ति के बाद मनोविज्ञान संबंधी अध्ययन व लेखन में लगे हुए हैं। सन्मनस नामक अपनी मलयालम पुस्तक की एक प्रति मुझे भेंट करते हुए उन्होंन कहा, तनाव का मुख्य कारण हमारे मन के नकारात्मक सोच है। यानी क्रोध, विद्वेष, वैर,र् ईष्या, शोक, मोह, मद, मत्सर इत्यादि इनका प्रतिस्थापन यदि सकारात्मक सोच से कर सकेंगे तो तनाव से मुक्ति अवश्य मिलेगी।
कैसे पता चलेगा कि हमारे मन में निगेटिव थाट्स ज्यादा हैं या पॉजिटिव थाट्स ज्यादा हैं? पुट्टपर्ती में जो भगवान सत्यसाई बाबा थे, उनके आश्रम में, उनके जीवनकाल में दो-तीन बार जाने का सुअवशर मुझे मिला है।
आश्रम में एक दीवार पर एक घड़ी के चित्र के समीप लिखा था-वाच युअर थाट्स, वाच युवर वड्र्स, वाच युवट एक्शन। यानी अपने-अपने चिन्तन पर, अपनी वाणी पर और अपने कर्मों पर निगरानी रखो। बहुधा हम दूसरों के चिन्तन की, दूसरों का वाणी की, दूसरों के कर्मों की आलोचना किया करते हैं। अपने चिन्तन, वाणी और कर्म का न हम निरीक्षण करते हैं न उनकी आलोचना करते हैं। यदि थोड़ा समय हम अपने अन्दर मुड़कर भी देखें तो अपने मन में पनप रहे निगेटिव थाट्स का पता लगा पायेगा। महात्मा कबीर का कथन भी यहां स्मरणीय है-
बालन कहा बिगरिया, जो मूंडो बार बार?
मन को क्यों नहीं मूंडिए, जा में विषय विकार?
उस्तरे या ब्लेड से सिर का और मुख का मुंडन करना तो आसान है। मन का मुंडन कैसे करें? यही योग-ध्यान हमारी सहायता कर सकता है। प्रतिदिन किसी निश्चित स्थान पर, निश्चित समय पर किसी सुविधापूर्ण आसन पर बैठकर करीब बीस मिनट तक ध्यान का अभ्यास करें तो हमें अपने मन के अन्दर के विकारों के स्पष्ट दर्शन मिल सकते हैं। मन में स्ेह, दया, करुणा, क्षमा, मुदिता जैसे पॉजिटिव थाट्स लाएं तो उसी के साथ निगेटिव थाट्स मिटते जायेंगे? प्रकाश के फैलने पर अंधकार दूर हो ही जाती है।

Sunday, June 17, 2012

काले हैं तो क्या हुआ…

कुछ पुरुष अथवा महिलाएं अपने काले या सांवले रंग के कारण दुःखी बने रहते हैं। वे शीशे के सामने जाने से घबराते हैं। उन्हें अपने रंग की चिंता किये बिना, अपने शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ रखने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। रंग गोरा होने पर यदि कोई रोगी रहता है तो उस गोरी त्वचा का क्या लाभ? हमें रोग मुक्त रहकर शरीर को स्वस्थ रखना चाहिए, यह हमारा धर्म है।


त्वचा के सांवलेपन को हटाने के लिए बाजारू प्रसाधनों पर पैसा बर्बाद मत करें। ऐसा खाएं कि आपकी सांवली त्वचा पर भी निखार आने लगे।

स्वस्थ रहने के लिए पूरे शरीर को नियमित साफ रखें। इससे त्वचा में भी सुधार आता जायेगा।

शरीर पर नियमित मालिश करने के पश्चात् नहाने की आदत बना लें। इससे त्वचा पर खुरदरा या रूखापन भी नहीं आयेगा। शरीर में रक्त संचार ठीक होगा। रोग दूर भागेंगे।

जैतून का तेल खुरदरी या रूखी त्वचा को ठीक कर देता है। इसको लगाना अच्छा रहता है।

कच्चा दूध थोड़ा-सा कटोरी में लें। हल्की चुटकी नमक डालें। रूई के साथ चेहरे तथा हाथों पर मलें। रंग रूप दोनों निखरेंगे। स्वास्थ्य में भी वृध्दि आने लगेगी, क्योंकि रक्त संचार बढ़ जायेगा।

कच्ची सब्जियां, कच्चे फल, हरी सब्जियां तथा मौसमी फल अधिक मात्रा में लें। तले पदार्थों तथा जंक फूड से बचें। स्वस्थ होते जायेंगे।

शरीर को दिन भर 8 से 10 गिलास पानी मिलना ही चाहिए। इससे शरीर तो स्वस्थ होगा ही, आपकी सांवली त्वचा में भी चमक आती जायेगी।

गाजर खाएं। इसका रस चेहरे पर मलें। पानी में नींबू डालकर पीएं। छिलके को चेहरे पर मलें। एक-दो सप्ताह में चमत्कारी परिवर्तन देखेंगे।

अधिकारिक ताजा हवा, शुध्द हवा में जाएं। स्वास्थ्य तथा रंग, दोनों उत्तम होंगे।

Thursday, June 14, 2012

तनाव से छुटकारा दिलाएगी दोस्ती

अक्सर यह देखने को मिलता है कि जिन लोगों के अधिक दोस्त होते हैं वे कम तनावग्रस्त होते हैं बजाय उनके जो प्राय: गुमसुम से रहते हैं। दूसरों के साथ बातें करने से दिल का बोझ हल्का होने की कहावत बहुत पुरानी है। अब तो साइंस भी यह मान चुकी है कि तनाव से दूर रहने के लिए खुद को व्यस्त रखना जरूरी है। दिल और दिमाग की सोच के आपस में टकराने से तनाव पैदा होता है, इसलिए दिल की बीमारी का इससे गहरा रिश्ता है क्योंकि तनाव का भयंकर रूप ही हृदय रोग में बदलता है। बात बात पर निराश होना मन में जलन की भावना का अधिक होना या फिर उम्मीदों का बिखर जाना जैसी अनेक परेशानियां तनाव बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं।


पहले यह आम धारणा थी कि महिलाएं ज्यादा तनावग्रस्त होती हैं और पुरुष कम लेकिन अब तो मर्दों में भी यह बीमारी बढ़ती ही जा रही है। इसका एक कारण बढ़ती जनसंख्या के साथ बढ़ता कंपीटीशन भी है।

शिकागो में हुए एक सर्वेक्षण के हवाले से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जो लोग लम्बे समय तक टेलीफोन पर बातें करते हैं या बच्चों के साथ अधिक वक्त बिताते हैं, वे हमेशा प्रसन्नचित नजर आते हैं। रेडियो पर संगीत सुनना और टीवी पर मनपसंद प्रोग्राम देखना भी तनाव भगाने के लिए उपयोगी बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा से ज्यादा दोस्त बनाएं और तनाव से छुटकारा पायें।

Wednesday, May 23, 2012

लगाएं मन पर लगाम

मन की दो सर्वज्ञात विशेषताएं हैं- चंचलता एवं सुख लिप्सा। बंदर जैसी उछल-कूद, आवारा छोकरों जैसी मटरगश्ती, चिड़ियों की तरह यहां-वहां फुदकते फिरना, उसकी चपलवृत्ति को संतुष्टि पहुंचाते हैं। कल्पना के महलों की सृष्टि, कल्पना लोकों का तीव्र भ्रमण-विचरण, उसकी शक्ति का बड़ा अंश तो इन्हीं भटकनों, जंगलों में नष्ट हो जाता है। शक्ति का यह व्यर्थ छीजन रोककर उसे सुनिश्चित एवं सार्थक प्रयोजन में केंद्रित करना ही योगाभ्यास है। शक्तियों का यह सही उपयोग जीवन में स्पष्ट और आश्चर्यजनक परिणाम सामने लाता है। पिछड़ेपन के स्थान पर प्रगतिशीलता आ जाती है। दरिद्रता समृध्दि में परिणित हो जाती है। भटकाव की जगह प्रचंड पुरुषार्थ प्रवृत्ति पनपने पर परिस्थतियां अनुकूल बनने लगती हैं और साधन सिचिंत होने लगते हैं। लौकिक सफलताएं भी लक्ष्य केंद्रित पुरुषार्थ का ही परिणाम होती हैं। मन की भटकन रोककर ही उसे लक्ष्योन्मुख बनाया जा सकता है।


सुषुप्त शक्ति केंद्र

यही सधा हुआ मन आत्मिक क्षेत्र में लगाए जाने पर सुषुप्त शक्ति केंद्रों को जाग्रत व क्रियाशील बनाता है और दिव्य क्षमताएं प्रकाश में आती हैं। अंतश्चेतना का परिष्कार सामान्य व्यक्ति को महामानव स्तर पर ले जाकर ही रहता है। प्रगति का संपूर्ण इतिहास मन:शक्ति के पूंजीभूत लक्ष्य केंद्रित पुरुषार्थ की ही यश गाथा है। चंचलता की प्रवृति को पुरुषार्थ की प्रवृत्ति में परिवर्तित करने का पराक्रम ही प्रगति का सार्वभौम आधार रहा है।

मन की दूसरी प्रवृत्ति है- सुख लिप्सा। शारीरिक सुखों के भोग का माध्यम है- इंद्रियां। उनके द्वारा विभिन्न वासनाओं को स्वाद मिलता है। पेट और प्रजनन से संबंधित सुखों के लिये तरह-तरह की चेष्टाओं में मन उलझा रहता है और इन सुखों की प्राप्ति के लिये प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि इनकी मात्रा कल्पनाएं करने में भी बहुत अधिक समय नष्ट करता है। फिर इन भौतिक सुखों के लिये साधन जुटाने में भी मन को जाने कितने ताने-बाने बुनने पड़ते हैं। इंद्रियों की प्रिय वस्तु या व्यक्ति को देखने, सुनने, छूने, सूंघने अथवा स्वाद लेने की लिप्साएं मन को ललक से भर देती हैं और वह उसी दिशा में लगा रहता है। अहंकार की पूर्ति के लिये मन औरों पर प्रभाव डालने हेतु तरह-तरह की चेष्टाएं करता है और व्यक्ति भांति-भांति के ठाट-बाट बनाता है। संचय और स्वामित्य की इच्छाएं भी अनेक विधि प्रयत्नों का कारण बनती हैं। इन सभी इच्छाओं, आकांक्षाओं की प्यास को व्यक्त करने के लिये ही तृष्णा शब्द का प्रयोग होता है। अहं-भावना पर आघात पहुंचते ही प्रतिशोध की उत्तेजना प्रबल हो उठती है। इच्छित विषय पर अपना हक मान लेना और फिर उनके प्राप्त न होने पर या प्राप्ति में बाधा पड़ने पर भड़क उठना भी अहंता पर आघात के ही कारण होता है, यह उत्तेजना ही क्रोध है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि संपूर्ण विकार समूह वस्तुत: मन में उठने वाली प्रतिक्रियाएं मात्र हैं, जो भौतिक सुख की लिप्साओं के कारण उठते रहते हैं। लिप्सा की इस ललक की दिशा को उलट देना ही 'तप' है।

सुख मन का विषय है, जबकि आनंद और आत्मसंतोष आत्मा का। सुख लिप्सा का अभ्यस्त मन आनंद के स्वाद को नहीं जान पाता और जिसे जाना ही नहीं, उसके प्रति गहरी स्थायी प्रीति, सच्चा आकर्षण संभव नहीं। आनंद की आकांक्षा विषय लोलुप मन में प्रगाढ़ नहीं होती। उसके लिये तो मन का प्रशिक्षण आवश्यक है। यह प्रशिक्षण प्रक्रिया ही तप है। तपस्वी को कष्ट इसी अर्थ में सहना पड़ता है कि अभ्यस्त सुख का अवसर जाता रहता है। शारीरिक सुख-सुविधाएं सिमटती हैं, मानसिक आमोद-प्रमोद का भी अवकाश नहीं रहता है और आदर्शनिष्ठ आचरण आर्थिक समृध्दि के भी आड़े ही आता है। प्रत्यक्ष तौर पर तो, ऐसे परिणामों के लिये किया जाने वाला प्रयास मूर्खता ही प्रतीत होगा, लेकिन श्रेष्ठ उपलब्धियों का राजमार्ग यही है।

किसान, विद्यार्थी, पहलवान, श्रमिक, व्यवसायी, कलाकार आदि को भी अपनी प्रगति व उपलब्धियों की प्राप्ति के लिये बाल-चंचलता से मन को विरत ही करना पड़ता है। और अपने नीरस प्रयोजनों में ही मन:शक्ति नियोजित करनी पड़ती है। शौक मौज के अभ्यस्त उनके संगी उन लोगों की ऐसी लक्ष्योन्मुख प्रवृत्तियों का मजाक भी उड़ाते हैं, लेकिन सभी जानते हैं कि अंतत: बुध्दिमान और प्रगतिशील ऐसे ही लोगों को माना जाता है, जो चित्त की चपलता को नियंत्रित कर उसे अपने लक्ष्य की ओर ही लगाए रहते हैं। वह कृषि का क्षेत्र हो या शिक्षा का, शरीर सौष्ठव का हो या आर्थिक समृध्दि का, कला-कौशल का हो या वैज्ञानिक आविष्कार का अथवा दार्शनिक चिंतन-मनन का।

दलदल में कंठ तक फंसता हुआ मनुष्य प्रगति पर अग्रसर कैसे हो? पहला प्रयास डूबने की स्थिति से उबरने का होना चाहिये। मन को तृष्णाओं से और शरीर को वासनाओं के गर्त में गिरने से बचाया जाना चाहिये।

सादा जीवन, उच्च विचार

पतन में गिरने से बचाना और ऊंचा उठाने का सुयोग बनना तभी संभव है, जब सांसारिक इच्छाओं की ओर सरपट दौड़ने की आदत बदली जाए और उलटकर उन महत्वाकांक्षाओं के मार्ग पर चला जाए तो महानता के लक्ष्य तक पहुंचाता है।

परिवर्तन की यह संधि वेला आई या नहीं, इसकी एक ही कसौटी है कि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार हुआ या नहीं। सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श की महत्ता मानी गयी या नहीं। अमीरी का बड़प्पन निरर्थक मानकर महानता का गौरव गले उतरा या नहीं। यदि इतना बन पड़े तो जीवन वस्तुत: नितांत हल्का-फुल्का हो जाएगा। उसकी राई रत्ती जितनी आवश्यक है, तनिक सी सूझ-बूझ और मेहनत के सहारे पूरी होती चलेंगी।

सांसारिक समस्याएं और कठिनाइयां सरलतापूर्वक हल होती चलेंगी। अनसुलझी कोई गुत्थी रहेगी नहीं। जहां संतोष और सादगी का रसास्वादन हुआ नहीं कि वह परिस्थितियां देखते-देखते बदल जाएंगी जो व्यस्त रखती थी और त्रस्त करती थीं। महत्वाकांक्षाएं वही श्रेयस्कर हैं, जो बड़ा नहीं महान बनाएं। महान बनने का एक ही उपाय है कि दृष्टिकोण और कार्यक्रम महान बनाया जाए, उत्कृष्ट चिंतन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार, यह तीनों का एक त्रिभुज हैं जो मिलकर महानता की समग्र आकृति बनाते हैं। इन्हीं का समन्वय त्रिवेणी संगम बनाता है।

Sunday, May 20, 2012

महिलाएं और मानसिक तनाव

मानव की भागती-दौड़ती जिन्दगी का एक प्रमुख हिस्सा बन गया है तनाव। यों तो मानसिक तनाव के अनेक कारण है परन्तु आंकड़ों से विदित होता है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं तनाव से अधिक ग्रसित होती हैं।

महिलाएं स्वभाव से ही संवेदनशील होती हैं अत: छोटी-छोटी बातों से भी वे प्रभावित हो जाती हैं। घरेलू महिलाओं की तुलना में नौकरीपेशा महिलाओं में तनाव की तीव्रता अधिक रहती है। इसका कारण यह है कि उन पर घर-बाहर दोनों का उत्तरदायित्व रहता है।

वे अपने मन पर हमेशा एक न एक बोझ लिए रहती हैं। नौकरी पर जाने से पहले घर पर पति व बच्चों तथा घर की सारी जिम्मेदारी पूरी करनी होती है, परिवार के सब सदस्यों का पूरा ख्याल रखना पड़ता है।

ऑफिस में समय पर पहुंचने की जल्दी, अपने कार्य को पुरुषों के समान ही कुशलता से कर पाने की चुनौती, वक्त पर घर आना, घर-गृहस्थी में कहीं दरार न आने देना, कुशल गृहिणी कार् कत्तव्य पालन करते हुए अतिरिक्त आय घर में लाना, रिश्तेदारों मेहमानों की जिम्मेदारी निभाना आदि सभी दायित्वों को निभाना पड़ता है, हालांकि उन्हें भी कामकाज का तनाव, बच्चों के होमवर्क का तनाव, मेहमानों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों का तनाव भी कम नहीं रहता।

दूसरों की सुख समृध्दि को देखकर कुढ़ना, दूसरों के दोषों को देखना,र् ईष्या आदि भी मानसिक तनाव में रहने वाली महिलाएं अनिद्रा, सिरदर्द, दिल की धड़कन, मधुमेह जैसे रोगों में फंसकर अपने स्वास्थ्य को बर्बाद करती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आठ घंटे शारीरिक श्रम से उतनी शक्ति नष्ट नहीं होती जितनी आधा घंटा तनाव या उद्वेग से होती है अत: स्वस्थ और निरोग रहने के लिए मन को तनावमुक्त रख हंसने-हंसाने की आदत डालनी चाहिए। चित्त को संतुष्ट व प्रसन्न रखें। रोजमर्रा के जीवन में परेशानियां हर किसी को आती हैं, लेकिन उनसे विचलित नहीं होना चाहिए।