आज देश और दुनिया के जो हालात है वे कोई बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। ऐसा नहीं है कि दुनिया में तरक्की नहीं हुई है। कहां हिंसक जनवरों के बीच रहने वाला गुड़ा-मानव और कहां कंकरीट की गगनचुम्बी अट्टालिकों में रहने वाला आज का शहरी मानव? कहां दिन भर भोजन की खोज में खाईयों-खंदकों को फांदने वाला मानव और कहां आलीशान पांच सितारा होटलों में षड़रसभोजी मानव? कहां पत्रों और छालों के खुरदरे कपड़े पहनने वाला मानव, कहां सिन्थेटिक्स के फूल से हल्के-फुल्के रंगबिरंगे चिकने-चमकीले कपड़े पहनने वाला मानव? कहां एयरबसों और उपग्रहों में ग्रह-नक्षत्रों की यात्रा करने वाला मानव, कहां प्राकृतिक आपदाओं से घिरा भयभीत मानव? कहां रेडियो, टेलीविजन से रात-दिन मनोरंजन करने वाला मानव, कहां निरक्षर भट्टाचार्य मानव, कहां डिग्रियों का भारी बोझा ढोने वाला मानव? सचमुच आकाश-पाताल का अंतर है। पर प्रश्न उठता है क्या पहले की तुलना में मानव आज ज्यादा शांत, सुखी है।
क्या मनुष्य सुखी बना?
शहरों में जन-संकुलता, कोलाहल, प्रदूषण तथा औद्योगिक हलचल इतनी बढ़ गई है कि मानव उससे तंग आ गया है। भले ही अब भी कुछ लोग पेट की खातिर महानगरों की ओर दौड़ रहे हैं, पर वहां का रहन-सहन इतना अकुलाने वाला हो गया है कि उससे विरक्ति होने लगी है। कृत्रिम स्वाद और स्वार्थी मानसिकता ने भोजन को इतना चटपटा और मिलावटी बना दिया है कि आदमी का स्वास्थ्य ही गड़बड़ाने लगा है। सभ्यता ने उस पर इतने कपड़े लाद दिए हैं कि वह स्वयं चलता-फिरता मॉडल बन गया है। जंगली जानवरों के भय से मुक्त मानव आज आतंकवाद से परेशान हो गया है। बोइंग विमानों एवं राकेटों में घूमने वाला मानव बीमारियों एवं दुर्घटनाओं से दु:खी हो गयी है। उच्च शिक्षा प्राप्त मानव विविध सर्टिफिकेट लिए नौकरी की तलाश में दफ्तरों का चक्कर लगा रहा है।
दु:ख की जड़ कहां है?
तो क्या सचमुच आदमी आज दु:खी है और यदि वह दु:खी है तो कहां है उसके दु:ख की जड़ें? निश्चय ही ग्रह-नक्षत्रों की यात्रा को समुद्यत मानव फिर से गुफा-मानव नहीं बन सकता। स्वर्ग और नरक को भी वह माने या न माने यह एक अलग सवाल है, पर क्या वह अपने अन्दर निर्मित होने वाले स्वर्ग और नरक से बच सकता है? सचमुच मानव का सुख और दु:ख उसके अपने अन्दर ही निर्मित होता है।
मानसिक दु:ख
असल में मनुष्य का दु:ख आज देह का नहीं अपितु मानव-प्रसूत है। वह बाहर से तो भरा हुआ है, पर अंदर से खाली है। अन्दर का खालीपन ऊपर भी उभरकर आ रहा है। दवाईयां और ट्रेंक्वेलाइजर्स उसे भर नहीं सकते। भले ही आदमी ने नशीली दवाइयों से अपने आपको दु:ख मुक्त करने की कोशिश की हो पर सच तो यह है कि आज वह अपने ही द्वारा निर्मित वैतरणी में फंस गया है। बाहरी समृध्दि आदमी के अंदर के खालीपन को नहीं कर सकती। इसका यह अर्थ नहीं है कि आदमी की जीने के लिए पदार्थ की आवश्यकता नहीं है। रोटी-पानी के बिना वह जी नहीं सकता। पहनने के लिए कपड़े भी आवश्यक है। रहने के लिए मकान भी आवश्यक है। पर ये सब साध्य नहीं है। ये सब साधन हैं। आज सबसे बड़ी भूल यही हो रही है कि साधनों को ही साध्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।
अतिरिक्त अमीरी
जब पदार्थ ही साध्य बन जाता है तो उसे प्राप्त करने की शुध्दता की प्रतिबध्दता नहीं रह जाती। यदि आदमी का साध्य शांति हो तो वह उसी में आनंद का अनुभव कर सकता है जो उसे उपलब्ध है। पदार्थ की आखिर कहीं अंतिम सीमा नहीं हो सकती। बाहरी आकांक्षा हमेशा आगे से आगे बढ़ती जाएगी। यदि मनुष्य की दौड़ बाहर न होकर अन्दर की ओर हो जाए तो उसे जो कुछ प्राप्त है वह उसे भी ठुकरा सकता है। महावीर और बुध्द के पास वैभव की कोई कमी नहीं थी, पर अन्दर की अमीरी जागी तो उन्होंने राजघाट को भी ठुकरा दिया।
साधन ज्यादा, सुख कम
यदि हम आज की तुलना में पुराने जमाने को देखें तो स्पष्ट आभास होगा कि आज जितनी सुख सुविधाएं आम आदमी को प्राप्त है वे पुराने जमाने के शहंशाहों को भी प्राप्त नहीं होगी। मैं जमीन और धन की बात नहीं करता। हो सकता है पुराने शहंशाहों के पास अपार वैभव और जमीन ज्यादा रही होगी, पर साधनों की दृष्टि से देखा जाए तो आज आदमी को जितनी सुख-सुविधाएं प्राप्त है उतनी पुराने अमीरों के पास नहीं थी। फिर भी यदि आज का आदमी सुखी नहीं है तो केवल इसीलिए नहीं है कि वह बाहर की दौड़-दौड़ रहा है। गरीब लोगों की बात छोड़ भी दें, जिनके पास प्रभूत पैसा है वे लोग शायद हैरान है। इसका कारण यही है कि बाहरी दौड़ आदमी को शांति प्रदान नहीं कर सकती। उससे लिए तो मनुष्य को अपने अंदर में ही मील का कोई पत्थर लगाना पड़ेगा।
Friday, August 12, 2011
तनाव हर स्थिति में हानिकारक है
यह तथ्य न केवल सर्वविदित है वरन् प्रत्येक का अनुभव भी है कि आज का जीवन व्यस्त और तनावपूर्ण है। युवा वृध्द, स्त्री, पुरुष, व्यवसायी और नौकरी पेशा, गरीब और अमीर हर वर्ग तथा हर स्तर का व्यक्ति तनावग्रस्त है। यों तनाव का सामान्य अर्थ मानसिक तनाव से लिया जाता है पर वस्तुत: तनाव तीन प्रकार के होते हैं- शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव।
लंबे समय तक लगातार एक ही प्रकार का काम करने और अत्यधिक श्रम करने के कारण जो थकान उत्पन्न होती है उसे शारीरिक तनाव कहा जाता है।
मानसिक तनाव बहुत अधिक सोचने-विचारने या चिंता करने से उत्पन्न होता है। एक घंटे बाद परीक्षा फल घोषित होने वाला है तो दिल की धड़कन बहुत बढ़ गई। दूर कहीं प्रवास पर हैं, रात में किसी की सहसा याद आ गई तो नींद गायब, यही है- भावनात्मक तनाव।
सामान्यत: घरों में तनाव का कारण पति-पत्नी का आपसी तालमेल न बैठ पाना होता है। पत्नियां, पतियों को उकसाती व उत्तेजित करती हैं और पति, पत्नियों को रसोई आदि के लिये तंग करते हैं। परस्पर संतुलन न बैठ पाने से दोनों तनाव से ग्रसित हो जाते हैं इसका दुष्परिणाम यह होता है कि माता-पिता के बीच अनबन व कलह देखकर बच्चे भी तनाव से आक्रान्त हो जाते हैं, फलत: पूरा घर ही नरक बन जाता है। इस नरक से त्राण पाने का रास्ता एक ही है कि परस्पर सामंजस्य बैठाया जाय। प्रेम-आत्मीयता, सद्भावना, सहयोग आदि से वही परिवार स्वर्गीय आनंद का उपवन बन सकता है जो जरा से मतभेद एवं नासमझी के कारण नरक बन गया था। वर्तमान समय में 50 प्रतिशत से अधिक रोगी तनाव की प्रतिक्रिया स्वरूप रोगग्रस्त पाये गये हैं। चिकित्सकों एवं मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, आंखों में सुर्खी आना, काम में मन न लगना और लकवा आदि जैसे रोगों का आक्रमण हो जाना, ये सभी अत्यधिक तनाव के ही दुष्परिणाम हैं। ऐसे लोग प्राय: रोगों की उत्पत्ति के लिये कभी मौसम को, कभी आहार को, कभी दूसरों को दोष देते हैं। अधिक तनाव शरीर व मन दोनों के लिये हानिकारक हैं। स्नायुविक तनाव-विशेषज्ञ डा. एडमण्ड जैकवसन का कहना है कि हृदय रोग, रक्तचाप की अधिकता अल्सर, कोलाइटिस आदि सामान्यत: दिखाई देने वाले रोग प्रकारान्तर से तनाव के ही कारण उत्पन्न होते हैं। स्ायु दौर्बल्य, अनिद्रा, चिंता, खिन्नता आदि अनेक रोग तनाव के फलस्वरूप होते हैं।
मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि हृदय रोग का कारण अज्ञात भय, चिंता है, जो अन्तर्मन में व्याप्त हो जाती है। नतीजा यह होता है कि मनुष्य की स्वाभाविक खुशी व प्रफुल्लता छिन जाती है।
इससे रक्तवाहिनी नसें थक जाती हैं। कभी फट भी जाती है, फलत: मस्तिष्क में लकवा भी हो जाता है और शक्कर देने वाली क्लोम ग्रंथियां भी खाली हो जाती हैं और क्लोम रस मिलना बंद हो जाता है। यह ग्रंथि प्रसन्नता के अभाव में कार्य करना बंद कर देती है और क्लोम रस देना भी बंद कर देती है। क्लोम रस न मिलने से शर्करा स्वतंत्र हो जाती है और मूत्र के साथ बहने लगती है। इसी को मधुमेह कहते हैं। मधुमेह रोने, पछताने व शोक करने से भी हो जाता है। तनाव से मुक्त रहने के लिये सूक्ष्मदर्शियों ने यही कहा है कि अपनी क्षमता भर अच्छे से अच्छा काम करें। इसमें बाहरी सहायता या मार्गदर्शन कुछ विशेष कारगर सिध्द नहीं होता। अपने द्वारा उत्पन्न किए तनाव को कोई दूसरा दूर कैसे कर सकता है? तनाव को व्यक्ति स्वयं ही नियंत्रित एवं दूर कर सकता है? दूसरों का मार्गदर्शन थोड़ा बहुत उपयोगी हो सकता है।
स्वाध्याय के द्वारा सहज ही पता चल जाता है कि निरर्थक एवं महत्वहीन बातों को अधिक तूल दे दिया गया और अकारण ही तनाव को आमंत्रित कर लिया गया। वस्तुत: यह झाड़ी के भूत की कल्पना मात्र थी। अपने को तनावग्रस्त न होने देने के लिये दृढ़ निश्चय, लगन एवं सतत् निष्ठापूर्वक सद्कार्यों में नियोजित किए रहना ही सर्वोत्तम उपाय है। सदा सहनशीलता से काम लिया जाए, भविषष्य के भय से भयभीत न हुआ जाय, वास्तविकता को दृष्टिगत रखा जाय, काल्पनिक बाधा या आशंका को स्थान न दिया जाय, वर्तमान में सामने आये काम को पूरी तत्परता से सम्पन्न किया जाय, उसी के संबंध में सोचा जाय, आशावान रहा जाय। ऐसा करने से स्वयं ही अपने भीतर इस प्रकार की शक्ति का अनुभव होगा जो समस्याओं को सुलझाने में सहायक होगी।
लंबे समय तक लगातार एक ही प्रकार का काम करने और अत्यधिक श्रम करने के कारण जो थकान उत्पन्न होती है उसे शारीरिक तनाव कहा जाता है।
मानसिक तनाव बहुत अधिक सोचने-विचारने या चिंता करने से उत्पन्न होता है। एक घंटे बाद परीक्षा फल घोषित होने वाला है तो दिल की धड़कन बहुत बढ़ गई। दूर कहीं प्रवास पर हैं, रात में किसी की सहसा याद आ गई तो नींद गायब, यही है- भावनात्मक तनाव।
सामान्यत: घरों में तनाव का कारण पति-पत्नी का आपसी तालमेल न बैठ पाना होता है। पत्नियां, पतियों को उकसाती व उत्तेजित करती हैं और पति, पत्नियों को रसोई आदि के लिये तंग करते हैं। परस्पर संतुलन न बैठ पाने से दोनों तनाव से ग्रसित हो जाते हैं इसका दुष्परिणाम यह होता है कि माता-पिता के बीच अनबन व कलह देखकर बच्चे भी तनाव से आक्रान्त हो जाते हैं, फलत: पूरा घर ही नरक बन जाता है। इस नरक से त्राण पाने का रास्ता एक ही है कि परस्पर सामंजस्य बैठाया जाय। प्रेम-आत्मीयता, सद्भावना, सहयोग आदि से वही परिवार स्वर्गीय आनंद का उपवन बन सकता है जो जरा से मतभेद एवं नासमझी के कारण नरक बन गया था। वर्तमान समय में 50 प्रतिशत से अधिक रोगी तनाव की प्रतिक्रिया स्वरूप रोगग्रस्त पाये गये हैं। चिकित्सकों एवं मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, आंखों में सुर्खी आना, काम में मन न लगना और लकवा आदि जैसे रोगों का आक्रमण हो जाना, ये सभी अत्यधिक तनाव के ही दुष्परिणाम हैं। ऐसे लोग प्राय: रोगों की उत्पत्ति के लिये कभी मौसम को, कभी आहार को, कभी दूसरों को दोष देते हैं। अधिक तनाव शरीर व मन दोनों के लिये हानिकारक हैं। स्नायुविक तनाव-विशेषज्ञ डा. एडमण्ड जैकवसन का कहना है कि हृदय रोग, रक्तचाप की अधिकता अल्सर, कोलाइटिस आदि सामान्यत: दिखाई देने वाले रोग प्रकारान्तर से तनाव के ही कारण उत्पन्न होते हैं। स्ायु दौर्बल्य, अनिद्रा, चिंता, खिन्नता आदि अनेक रोग तनाव के फलस्वरूप होते हैं।
मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि हृदय रोग का कारण अज्ञात भय, चिंता है, जो अन्तर्मन में व्याप्त हो जाती है। नतीजा यह होता है कि मनुष्य की स्वाभाविक खुशी व प्रफुल्लता छिन जाती है।
इससे रक्तवाहिनी नसें थक जाती हैं। कभी फट भी जाती है, फलत: मस्तिष्क में लकवा भी हो जाता है और शक्कर देने वाली क्लोम ग्रंथियां भी खाली हो जाती हैं और क्लोम रस मिलना बंद हो जाता है। यह ग्रंथि प्रसन्नता के अभाव में कार्य करना बंद कर देती है और क्लोम रस देना भी बंद कर देती है। क्लोम रस न मिलने से शर्करा स्वतंत्र हो जाती है और मूत्र के साथ बहने लगती है। इसी को मधुमेह कहते हैं। मधुमेह रोने, पछताने व शोक करने से भी हो जाता है। तनाव से मुक्त रहने के लिये सूक्ष्मदर्शियों ने यही कहा है कि अपनी क्षमता भर अच्छे से अच्छा काम करें। इसमें बाहरी सहायता या मार्गदर्शन कुछ विशेष कारगर सिध्द नहीं होता। अपने द्वारा उत्पन्न किए तनाव को कोई दूसरा दूर कैसे कर सकता है? तनाव को व्यक्ति स्वयं ही नियंत्रित एवं दूर कर सकता है? दूसरों का मार्गदर्शन थोड़ा बहुत उपयोगी हो सकता है।
स्वाध्याय के द्वारा सहज ही पता चल जाता है कि निरर्थक एवं महत्वहीन बातों को अधिक तूल दे दिया गया और अकारण ही तनाव को आमंत्रित कर लिया गया। वस्तुत: यह झाड़ी के भूत की कल्पना मात्र थी। अपने को तनावग्रस्त न होने देने के लिये दृढ़ निश्चय, लगन एवं सतत् निष्ठापूर्वक सद्कार्यों में नियोजित किए रहना ही सर्वोत्तम उपाय है। सदा सहनशीलता से काम लिया जाए, भविषष्य के भय से भयभीत न हुआ जाय, वास्तविकता को दृष्टिगत रखा जाय, काल्पनिक बाधा या आशंका को स्थान न दिया जाय, वर्तमान में सामने आये काम को पूरी तत्परता से सम्पन्न किया जाय, उसी के संबंध में सोचा जाय, आशावान रहा जाय। ऐसा करने से स्वयं ही अपने भीतर इस प्रकार की शक्ति का अनुभव होगा जो समस्याओं को सुलझाने में सहायक होगी।
Thursday, August 11, 2011
मन को शत्रु नहीं, मित्र बनाओ
मन शरीर का एक शक्तिशाली और कमजोर हिस्सा है बस उसका उपयोग हमें वैसा करना पड़ता है जैसे कहा गया है कि मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। अगर हम किसी भी काम में अपने मन से हार जाएंगे तो हमें हार की प्राप्ति होगी अगर मन को सफलता प्राप्ति के उस स्तर तक कर्म करने में लगाएंगे तो जीत अवश्य होगी।
मन हमारे विचारों का उदगम स्थल है विचारों का जन्म मन से होता है और उससे उठने वाले विचार हमारे व्यक्तित्व और आसपास के वातावरण का निर्माण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मन ही मनुष्य के बंधक और मोक्ष का कारण हैं। विषयों में आसक्त मन बंधन का और निर्विषय मन मोक्ष का कारण बनता है।
महापुरुषों के अनुसार मन की पांच मुख्य विशेषताएं हैं, एक मन चंचल होता है, मन मैला होता है, मन सदा भूखा रहता है, मन पागल है, मन मूर्ख है। मन के चंचल होने का अर्थ है कि मन हमेशा गतिमान रहता है कभी भी स्थिर नहीं रहता। मन मैले का अर्थ है इसमें बुरे विचार जल्दी जन्म लेते हैं।
भूखे मन का अर्थ है कि यह कभी तृप्त नहीं होता, एक भूख मिटाओ तो दूसरी भूख लगती है। मन पागल इसलिये है कि यह बार-बार धोखा खाता है, फिर भी उन विषयों के पीछे दौड़ता है। मन मूर्ख इसलिये है इसे जितना भी समझाओ आसानी से नहीं समझता। मन की इन विशेषताओं के कारण मन को मनुष्य का शत्रु कहा गया है।
इसलिये साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिये। गुरुजन भी यही कहते हैं मन को मनमानी मत करने दो नहीं तो मन पतन की ओर ले जाएगा जिसका अंत बस पछतावा है। गुरुजनों के अनुसार, अगर एक मन को जीत लिया तो समझो जग को जीत लिया।
मन के दो दोष मुख्य माने गये हैं एक स्थाई और दूसरा अस्थाई लोभ, मोह, आसक्ति, मान-सम्मान स्थाई दोष हैं जो हमेशा मन में बने रहते हैं। जिनका शमन तम, विवेक, वैराग्य और सत्संग से कर सकते हैं पर काम और क्रोध अस्थाई दोष हैं जो थोड़े समय के लिए उत्पन्न होते हैं इनका शमन हम सावधान रहकर कर सकते हैं। इसलिये मन को सबसे बड़ा शत्रु और मित्र माना जाता है। मन ही हमारी उन्नति और अवनति का मूल साधक है। शत्रु की भूमिका मन तब निभाता है जब विषयों में आसक्त होता है और हमें पतन की ओर ले जाता है। मित्र की भूमिका मन तब निभाता है जब वो परमात्मा में आसक्त हो जाता है।
मन बहुत चंचल, तेज और हठी है वह इंद्रियों का दास बनकर भोगों के पीछे दौड़ते रहता है। उस समय मन मस्त घोड़े के समान होता है। जैसे वायु को रोकना मुश्किल है वैसे मन को वश में करना मुश्किल होता है। मन को वश में करने के लिये अपने से संघर्ष करना पड़ता है। अगर संघर्ष पूरे मनोवेश से है तो मन वश में हो जाता है पर जहां थोड़ी ढील हुई मन वश से बाहर रहता है।
विषयों से मन को ऊपर उठाये बिना हम दिव्यता के असीम संसार में नहीं प्रवेश कर सकते। विषयों का आकर्षण बहुत बड़ा है। इसे दृढ़ संकल्प द्वारा वश में किया जा सकता है। मन को मित्र हम तभी बना सकते हैं जब हम उसे प्रशिक्षित करें, प्रकाशित करें। मन को ईश्वरीय चिंतन में लगाकर प्रकाशित कर सकते हैं। हमें अपने मन का दृष्टा बनना होगा। हर विचार हर विषय पर नजर रखनी होगी कि क्या गलत और सही है।
वैसे तो प्रकृति का नियम है जब हमें कुछ अच्छा या उच्च स्तर का मिलता है तब मन निम्न वस्तु को स्वयं छोड़ देता है। इसी प्रकार जब मनको यह अनुभव हो जायेगा कि ब्रह्मानंद का रस विषयानंद से कहीं अधिक मीठा है तो वह श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़ेगा।
भागवान कृष्ण भगवत गीता में अर्जुन को समझाते हैं कि मन जहां-जहां जाये जिस कारण से जाए, जैसे-जैसे जाए, जब जब जाए, उसको वहां वहां, उस कारण से वैसे-वैसे और तब तब हटाकर परमात्मा में लगाएं। जब तक संसार की वस्तुएं सुंदर और सुखप्रद लगेंगी तब तक मन उनमें लगा रहेगा। जब मन को समझ आ जाएगा कि संसार के विषय दु:ख कारक हैं तो मन उधर नहीं जायेगा। मन को उनसे हटाने के लिये उनके दोषों और दु:खों को महसूस करना चाहिये।
इसी प्रकार धीरे-धीरे मन में उनके लिये वैराग्य उत्पति होगी और मन ईश्वर की ओर लगेगा। तब मन आपका सच्चा मित्र बन जाएगा और दिव्यानंद को प्राप्त होगा। बस मन से दोस्ती करो, बुरे विचारों से मन को बाहर निकालो, अपनी इंद्रियों पर काबू पाओ और स्वयं को परमात्मा के साक्षात्कार के लिये तैयार करो। और सिध्द करो मन अच्छा तो सब अच्छा।
मन हमारे विचारों का उदगम स्थल है विचारों का जन्म मन से होता है और उससे उठने वाले विचार हमारे व्यक्तित्व और आसपास के वातावरण का निर्माण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मन ही मनुष्य के बंधक और मोक्ष का कारण हैं। विषयों में आसक्त मन बंधन का और निर्विषय मन मोक्ष का कारण बनता है।
महापुरुषों के अनुसार मन की पांच मुख्य विशेषताएं हैं, एक मन चंचल होता है, मन मैला होता है, मन सदा भूखा रहता है, मन पागल है, मन मूर्ख है। मन के चंचल होने का अर्थ है कि मन हमेशा गतिमान रहता है कभी भी स्थिर नहीं रहता। मन मैले का अर्थ है इसमें बुरे विचार जल्दी जन्म लेते हैं।
भूखे मन का अर्थ है कि यह कभी तृप्त नहीं होता, एक भूख मिटाओ तो दूसरी भूख लगती है। मन पागल इसलिये है कि यह बार-बार धोखा खाता है, फिर भी उन विषयों के पीछे दौड़ता है। मन मूर्ख इसलिये है इसे जितना भी समझाओ आसानी से नहीं समझता। मन की इन विशेषताओं के कारण मन को मनुष्य का शत्रु कहा गया है।
इसलिये साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिये। गुरुजन भी यही कहते हैं मन को मनमानी मत करने दो नहीं तो मन पतन की ओर ले जाएगा जिसका अंत बस पछतावा है। गुरुजनों के अनुसार, अगर एक मन को जीत लिया तो समझो जग को जीत लिया।
मन के दो दोष मुख्य माने गये हैं एक स्थाई और दूसरा अस्थाई लोभ, मोह, आसक्ति, मान-सम्मान स्थाई दोष हैं जो हमेशा मन में बने रहते हैं। जिनका शमन तम, विवेक, वैराग्य और सत्संग से कर सकते हैं पर काम और क्रोध अस्थाई दोष हैं जो थोड़े समय के लिए उत्पन्न होते हैं इनका शमन हम सावधान रहकर कर सकते हैं। इसलिये मन को सबसे बड़ा शत्रु और मित्र माना जाता है। मन ही हमारी उन्नति और अवनति का मूल साधक है। शत्रु की भूमिका मन तब निभाता है जब विषयों में आसक्त होता है और हमें पतन की ओर ले जाता है। मित्र की भूमिका मन तब निभाता है जब वो परमात्मा में आसक्त हो जाता है।
मन बहुत चंचल, तेज और हठी है वह इंद्रियों का दास बनकर भोगों के पीछे दौड़ते रहता है। उस समय मन मस्त घोड़े के समान होता है। जैसे वायु को रोकना मुश्किल है वैसे मन को वश में करना मुश्किल होता है। मन को वश में करने के लिये अपने से संघर्ष करना पड़ता है। अगर संघर्ष पूरे मनोवेश से है तो मन वश में हो जाता है पर जहां थोड़ी ढील हुई मन वश से बाहर रहता है।
विषयों से मन को ऊपर उठाये बिना हम दिव्यता के असीम संसार में नहीं प्रवेश कर सकते। विषयों का आकर्षण बहुत बड़ा है। इसे दृढ़ संकल्प द्वारा वश में किया जा सकता है। मन को मित्र हम तभी बना सकते हैं जब हम उसे प्रशिक्षित करें, प्रकाशित करें। मन को ईश्वरीय चिंतन में लगाकर प्रकाशित कर सकते हैं। हमें अपने मन का दृष्टा बनना होगा। हर विचार हर विषय पर नजर रखनी होगी कि क्या गलत और सही है।
वैसे तो प्रकृति का नियम है जब हमें कुछ अच्छा या उच्च स्तर का मिलता है तब मन निम्न वस्तु को स्वयं छोड़ देता है। इसी प्रकार जब मनको यह अनुभव हो जायेगा कि ब्रह्मानंद का रस विषयानंद से कहीं अधिक मीठा है तो वह श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़ेगा।
भागवान कृष्ण भगवत गीता में अर्जुन को समझाते हैं कि मन जहां-जहां जाये जिस कारण से जाए, जैसे-जैसे जाए, जब जब जाए, उसको वहां वहां, उस कारण से वैसे-वैसे और तब तब हटाकर परमात्मा में लगाएं। जब तक संसार की वस्तुएं सुंदर और सुखप्रद लगेंगी तब तक मन उनमें लगा रहेगा। जब मन को समझ आ जाएगा कि संसार के विषय दु:ख कारक हैं तो मन उधर नहीं जायेगा। मन को उनसे हटाने के लिये उनके दोषों और दु:खों को महसूस करना चाहिये।
इसी प्रकार धीरे-धीरे मन में उनके लिये वैराग्य उत्पति होगी और मन ईश्वर की ओर लगेगा। तब मन आपका सच्चा मित्र बन जाएगा और दिव्यानंद को प्राप्त होगा। बस मन से दोस्ती करो, बुरे विचारों से मन को बाहर निकालो, अपनी इंद्रियों पर काबू पाओ और स्वयं को परमात्मा के साक्षात्कार के लिये तैयार करो। और सिध्द करो मन अच्छा तो सब अच्छा।
मन को शत्रु नहीं, मित्र बनाओ
मन शरीर का एक शक्तिशाली और कमजोर हिस्सा है बस उसका उपयोग हमें वैसा करना पड़ता है जैसे कहा गया है कि मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। अगर हम किसी भी काम में अपने मन से हार जाएंगे तो हमें हार की प्राप्ति होगी अगर मन को सफलता प्राप्ति के उस स्तर तक कर्म करने में लगाएंगे तो जीत अवश्य होगी।
मन हमारे विचारों का उदगम स्थल है विचारों का जन्म मन से होता है और उससे उठने वाले विचार हमारे व्यक्तित्व और आसपास के वातावरण का निर्माण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मन ही मनुष्य के बंधक और मोक्ष का कारण हैं। विषयों में आसक्त मन बंधन का और निर्विषय मन मोक्ष का कारण बनता है।
महापुरुषों के अनुसार मन की पांच मुख्य विशेषताएं हैं, एक मन चंचल होता है, मन मैला होता है, मन सदा भूखा रहता है, मन पागल है, मन मूर्ख है। मन के चंचल होने का अर्थ है कि मन हमेशा गतिमान रहता है कभी भी स्थिर नहीं रहता। मन मैले का अर्थ है इसमें बुरे विचार जल्दी जन्म लेते हैं।
भूखे मन का अर्थ है कि यह कभी तृप्त नहीं होता, एक भूख मिटाओ तो दूसरी भूख लगती है। मन पागल इसलिये है कि यह बार-बार धोखा खाता है, फिर भी उन विषयों के पीछे दौड़ता है। मन मूर्ख इसलिये है इसे जितना भी समझाओ आसानी से नहीं समझता। मन की इन विशेषताओं के कारण मन को मनुष्य का शत्रु कहा गया है।
इसलिये साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिये। गुरुजन भी यही कहते हैं मन को मनमानी मत करने दो नहीं तो मन पतन की ओर ले जाएगा जिसका अंत बस पछतावा है। गुरुजनों के अनुसार, अगर एक मन को जीत लिया तो समझो जग को जीत लिया।
मन के दो दोष मुख्य माने गये हैं एक स्थाई और दूसरा अस्थाई लोभ, मोह, आसक्ति, मान-सम्मान स्थाई दोष हैं जो हमेशा मन में बने रहते हैं। जिनका शमन तम, विवेक, वैराग्य और सत्संग से कर सकते हैं पर काम और क्रोध अस्थाई दोष हैं जो थोड़े समय के लिए उत्पन्न होते हैं इनका शमन हम सावधान रहकर कर सकते हैं। इसलिये मन को सबसे बड़ा शत्रु और मित्र माना जाता है। मन ही हमारी उन्नति और अवनति का मूल साधक है। शत्रु की भूमिका मन तब निभाता है जब विषयों में आसक्त होता है और हमें पतन की ओर ले जाता है। मित्र की भूमिका मन तब निभाता है जब वो परमात्मा में आसक्त हो जाता है।
मन बहुत चंचल, तेज और हठी है वह इंद्रियों का दास बनकर भोगों के पीछे दौड़ते रहता है। उस समय मन मस्त घोड़े के समान होता है। जैसे वायु को रोकना मुश्किल है वैसे मन को वश में करना मुश्किल होता है। मन को वश में करने के लिये अपने से संघर्ष करना पड़ता है। अगर संघर्ष पूरे मनोवेश से है तो मन वश में हो जाता है पर जहां थोड़ी ढील हुई मन वश से बाहर रहता है।
विषयों से मन को ऊपर उठाये बिना हम दिव्यता के असीम संसार में नहीं प्रवेश कर सकते। विषयों का आकर्षण बहुत बड़ा है। इसे दृढ़ संकल्प द्वारा वश में किया जा सकता है। मन को मित्र हम तभी बना सकते हैं जब हम उसे प्रशिक्षित करें, प्रकाशित करें। मन को ईश्वरीय चिंतन में लगाकर प्रकाशित कर सकते हैं। हमें अपने मन का दृष्टा बनना होगा। हर विचार हर विषय पर नजर रखनी होगी कि क्या गलत और सही है।
वैसे तो प्रकृति का नियम है जब हमें कुछ अच्छा या उच्च स्तर का मिलता है तब मन निम्न वस्तु को स्वयं छोड़ देता है। इसी प्रकार जब मनको यह अनुभव हो जायेगा कि ब्रह्मानंद का रस विषयानंद से कहीं अधिक मीठा है तो वह श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़ेगा।
भागवान कृष्ण भगवत गीता में अर्जुन को समझाते हैं कि मन जहां-जहां जाये जिस कारण से जाए, जैसे-जैसे जाए, जब जब जाए, उसको वहां वहां, उस कारण से वैसे-वैसे और तब तब हटाकर परमात्मा में लगाएं। जब तक संसार की वस्तुएं सुंदर और सुखप्रद लगेंगी तब तक मन उनमें लगा रहेगा। जब मन को समझ आ जाएगा कि संसार के विषय दु:ख कारक हैं तो मन उधर नहीं जायेगा। मन को उनसे हटाने के लिये उनके दोषों और दु:खों को महसूस करना चाहिये।
इसी प्रकार धीरे-धीरे मन में उनके लिये वैराग्य उत्पति होगी और मन ईश्वर की ओर लगेगा। तब मन आपका सच्चा मित्र बन जाएगा और दिव्यानंद को प्राप्त होगा। बस मन से दोस्ती करो, बुरे विचारों से मन को बाहर निकालो, अपनी इंद्रियों पर काबू पाओ और स्वयं को परमात्मा के साक्षात्कार के लिये तैयार करो। और सिध्द करो मन अच्छा तो सब अच्छा।
मन हमारे विचारों का उदगम स्थल है विचारों का जन्म मन से होता है और उससे उठने वाले विचार हमारे व्यक्तित्व और आसपास के वातावरण का निर्माण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मन ही मनुष्य के बंधक और मोक्ष का कारण हैं। विषयों में आसक्त मन बंधन का और निर्विषय मन मोक्ष का कारण बनता है।
महापुरुषों के अनुसार मन की पांच मुख्य विशेषताएं हैं, एक मन चंचल होता है, मन मैला होता है, मन सदा भूखा रहता है, मन पागल है, मन मूर्ख है। मन के चंचल होने का अर्थ है कि मन हमेशा गतिमान रहता है कभी भी स्थिर नहीं रहता। मन मैले का अर्थ है इसमें बुरे विचार जल्दी जन्म लेते हैं।
भूखे मन का अर्थ है कि यह कभी तृप्त नहीं होता, एक भूख मिटाओ तो दूसरी भूख लगती है। मन पागल इसलिये है कि यह बार-बार धोखा खाता है, फिर भी उन विषयों के पीछे दौड़ता है। मन मूर्ख इसलिये है इसे जितना भी समझाओ आसानी से नहीं समझता। मन की इन विशेषताओं के कारण मन को मनुष्य का शत्रु कहा गया है।
इसलिये साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिये। गुरुजन भी यही कहते हैं मन को मनमानी मत करने दो नहीं तो मन पतन की ओर ले जाएगा जिसका अंत बस पछतावा है। गुरुजनों के अनुसार, अगर एक मन को जीत लिया तो समझो जग को जीत लिया।
मन के दो दोष मुख्य माने गये हैं एक स्थाई और दूसरा अस्थाई लोभ, मोह, आसक्ति, मान-सम्मान स्थाई दोष हैं जो हमेशा मन में बने रहते हैं। जिनका शमन तम, विवेक, वैराग्य और सत्संग से कर सकते हैं पर काम और क्रोध अस्थाई दोष हैं जो थोड़े समय के लिए उत्पन्न होते हैं इनका शमन हम सावधान रहकर कर सकते हैं। इसलिये मन को सबसे बड़ा शत्रु और मित्र माना जाता है। मन ही हमारी उन्नति और अवनति का मूल साधक है। शत्रु की भूमिका मन तब निभाता है जब विषयों में आसक्त होता है और हमें पतन की ओर ले जाता है। मित्र की भूमिका मन तब निभाता है जब वो परमात्मा में आसक्त हो जाता है।
मन बहुत चंचल, तेज और हठी है वह इंद्रियों का दास बनकर भोगों के पीछे दौड़ते रहता है। उस समय मन मस्त घोड़े के समान होता है। जैसे वायु को रोकना मुश्किल है वैसे मन को वश में करना मुश्किल होता है। मन को वश में करने के लिये अपने से संघर्ष करना पड़ता है। अगर संघर्ष पूरे मनोवेश से है तो मन वश में हो जाता है पर जहां थोड़ी ढील हुई मन वश से बाहर रहता है।
विषयों से मन को ऊपर उठाये बिना हम दिव्यता के असीम संसार में नहीं प्रवेश कर सकते। विषयों का आकर्षण बहुत बड़ा है। इसे दृढ़ संकल्प द्वारा वश में किया जा सकता है। मन को मित्र हम तभी बना सकते हैं जब हम उसे प्रशिक्षित करें, प्रकाशित करें। मन को ईश्वरीय चिंतन में लगाकर प्रकाशित कर सकते हैं। हमें अपने मन का दृष्टा बनना होगा। हर विचार हर विषय पर नजर रखनी होगी कि क्या गलत और सही है।
वैसे तो प्रकृति का नियम है जब हमें कुछ अच्छा या उच्च स्तर का मिलता है तब मन निम्न वस्तु को स्वयं छोड़ देता है। इसी प्रकार जब मनको यह अनुभव हो जायेगा कि ब्रह्मानंद का रस विषयानंद से कहीं अधिक मीठा है तो वह श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़ेगा।
भागवान कृष्ण भगवत गीता में अर्जुन को समझाते हैं कि मन जहां-जहां जाये जिस कारण से जाए, जैसे-जैसे जाए, जब जब जाए, उसको वहां वहां, उस कारण से वैसे-वैसे और तब तब हटाकर परमात्मा में लगाएं। जब तक संसार की वस्तुएं सुंदर और सुखप्रद लगेंगी तब तक मन उनमें लगा रहेगा। जब मन को समझ आ जाएगा कि संसार के विषय दु:ख कारक हैं तो मन उधर नहीं जायेगा। मन को उनसे हटाने के लिये उनके दोषों और दु:खों को महसूस करना चाहिये।
इसी प्रकार धीरे-धीरे मन में उनके लिये वैराग्य उत्पति होगी और मन ईश्वर की ओर लगेगा। तब मन आपका सच्चा मित्र बन जाएगा और दिव्यानंद को प्राप्त होगा। बस मन से दोस्ती करो, बुरे विचारों से मन को बाहर निकालो, अपनी इंद्रियों पर काबू पाओ और स्वयं को परमात्मा के साक्षात्कार के लिये तैयार करो। और सिध्द करो मन अच्छा तो सब अच्छा।
मन को शत्रु नहीं, मित्र बनाओ
मन शरीर का एक शक्तिशाली और कमजोर हिस्सा है बस उसका उपयोग हमें वैसा करना पड़ता है जैसे कहा गया है कि मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। अगर हम किसी भी काम में अपने मन से हार जाएंगे तो हमें हार की प्राप्ति होगी अगर मन को सफलता प्राप्ति के उस स्तर तक कर्म करने में लगाएंगे तो जीत अवश्य होगी।
मन हमारे विचारों का उदगम स्थल है विचारों का जन्म मन से होता है और उससे उठने वाले विचार हमारे व्यक्तित्व और आसपास के वातावरण का निर्माण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मन ही मनुष्य के बंधक और मोक्ष का कारण हैं। विषयों में आसक्त मन बंधन का और निर्विषय मन मोक्ष का कारण बनता है।
महापुरुषों के अनुसार मन की पांच मुख्य विशेषताएं हैं, एक मन चंचल होता है, मन मैला होता है, मन सदा भूखा रहता है, मन पागल है, मन मूर्ख है। मन के चंचल होने का अर्थ है कि मन हमेशा गतिमान रहता है कभी भी स्थिर नहीं रहता। मन मैले का अर्थ है इसमें बुरे विचार जल्दी जन्म लेते हैं।
भूखे मन का अर्थ है कि यह कभी तृप्त नहीं होता, एक भूख मिटाओ तो दूसरी भूख लगती है। मन पागल इसलिये है कि यह बार-बार धोखा खाता है, फिर भी उन विषयों के पीछे दौड़ता है। मन मूर्ख इसलिये है इसे जितना भी समझाओ आसानी से नहीं समझता। मन की इन विशेषताओं के कारण मन को मनुष्य का शत्रु कहा गया है।
इसलिये साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिये। गुरुजन भी यही कहते हैं मन को मनमानी मत करने दो नहीं तो मन पतन की ओर ले जाएगा जिसका अंत बस पछतावा है। गुरुजनों के अनुसार, अगर एक मन को जीत लिया तो समझो जग को जीत लिया।
मन के दो दोष मुख्य माने गये हैं एक स्थाई और दूसरा अस्थाई लोभ, मोह, आसक्ति, मान-सम्मान स्थाई दोष हैं जो हमेशा मन में बने रहते हैं। जिनका शमन तम, विवेक, वैराग्य और सत्संग से कर सकते हैं पर काम और क्रोध अस्थाई दोष हैं जो थोड़े समय के लिए उत्पन्न होते हैं इनका शमन हम सावधान रहकर कर सकते हैं। इसलिये मन को सबसे बड़ा शत्रु और मित्र माना जाता है। मन ही हमारी उन्नति और अवनति का मूल साधक है। शत्रु की भूमिका मन तब निभाता है जब विषयों में आसक्त होता है और हमें पतन की ओर ले जाता है। मित्र की भूमिका मन तब निभाता है जब वो परमात्मा में आसक्त हो जाता है।
मन बहुत चंचल, तेज और हठी है वह इंद्रियों का दास बनकर भोगों के पीछे दौड़ते रहता है। उस समय मन मस्त घोड़े के समान होता है। जैसे वायु को रोकना मुश्किल है वैसे मन को वश में करना मुश्किल होता है। मन को वश में करने के लिये अपने से संघर्ष करना पड़ता है। अगर संघर्ष पूरे मनोवेश से है तो मन वश में हो जाता है पर जहां थोड़ी ढील हुई मन वश से बाहर रहता है।
विषयों से मन को ऊपर उठाये बिना हम दिव्यता के असीम संसार में नहीं प्रवेश कर सकते। विषयों का आकर्षण बहुत बड़ा है। इसे दृढ़ संकल्प द्वारा वश में किया जा सकता है। मन को मित्र हम तभी बना सकते हैं जब हम उसे प्रशिक्षित करें, प्रकाशित करें। मन को ईश्वरीय चिंतन में लगाकर प्रकाशित कर सकते हैं। हमें अपने मन का दृष्टा बनना होगा। हर विचार हर विषय पर नजर रखनी होगी कि क्या गलत और सही है।
वैसे तो प्रकृति का नियम है जब हमें कुछ अच्छा या उच्च स्तर का मिलता है तब मन निम्न वस्तु को स्वयं छोड़ देता है। इसी प्रकार जब मनको यह अनुभव हो जायेगा कि ब्रह्मानंद का रस विषयानंद से कहीं अधिक मीठा है तो वह श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़ेगा।
भागवान कृष्ण भगवत गीता में अर्जुन को समझाते हैं कि मन जहां-जहां जाये जिस कारण से जाए, जैसे-जैसे जाए, जब जब जाए, उसको वहां वहां, उस कारण से वैसे-वैसे और तब तब हटाकर परमात्मा में लगाएं। जब तक संसार की वस्तुएं सुंदर और सुखप्रद लगेंगी तब तक मन उनमें लगा रहेगा। जब मन को समझ आ जाएगा कि संसार के विषय दु:ख कारक हैं तो मन उधर नहीं जायेगा। मन को उनसे हटाने के लिये उनके दोषों और दु:खों को महसूस करना चाहिये।
इसी प्रकार धीरे-धीरे मन में उनके लिये वैराग्य उत्पति होगी और मन ईश्वर की ओर लगेगा। तब मन आपका सच्चा मित्र बन जाएगा और दिव्यानंद को प्राप्त होगा। बस मन से दोस्ती करो, बुरे विचारों से मन को बाहर निकालो, अपनी इंद्रियों पर काबू पाओ और स्वयं को परमात्मा के साक्षात्कार के लिये तैयार करो। और सिध्द करो मन अच्छा तो सब अच्छा।
मन हमारे विचारों का उदगम स्थल है विचारों का जन्म मन से होता है और उससे उठने वाले विचार हमारे व्यक्तित्व और आसपास के वातावरण का निर्माण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मन ही मनुष्य के बंधक और मोक्ष का कारण हैं। विषयों में आसक्त मन बंधन का और निर्विषय मन मोक्ष का कारण बनता है।
महापुरुषों के अनुसार मन की पांच मुख्य विशेषताएं हैं, एक मन चंचल होता है, मन मैला होता है, मन सदा भूखा रहता है, मन पागल है, मन मूर्ख है। मन के चंचल होने का अर्थ है कि मन हमेशा गतिमान रहता है कभी भी स्थिर नहीं रहता। मन मैले का अर्थ है इसमें बुरे विचार जल्दी जन्म लेते हैं।
भूखे मन का अर्थ है कि यह कभी तृप्त नहीं होता, एक भूख मिटाओ तो दूसरी भूख लगती है। मन पागल इसलिये है कि यह बार-बार धोखा खाता है, फिर भी उन विषयों के पीछे दौड़ता है। मन मूर्ख इसलिये है इसे जितना भी समझाओ आसानी से नहीं समझता। मन की इन विशेषताओं के कारण मन को मनुष्य का शत्रु कहा गया है।
इसलिये साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिये। गुरुजन भी यही कहते हैं मन को मनमानी मत करने दो नहीं तो मन पतन की ओर ले जाएगा जिसका अंत बस पछतावा है। गुरुजनों के अनुसार, अगर एक मन को जीत लिया तो समझो जग को जीत लिया।
मन के दो दोष मुख्य माने गये हैं एक स्थाई और दूसरा अस्थाई लोभ, मोह, आसक्ति, मान-सम्मान स्थाई दोष हैं जो हमेशा मन में बने रहते हैं। जिनका शमन तम, विवेक, वैराग्य और सत्संग से कर सकते हैं पर काम और क्रोध अस्थाई दोष हैं जो थोड़े समय के लिए उत्पन्न होते हैं इनका शमन हम सावधान रहकर कर सकते हैं। इसलिये मन को सबसे बड़ा शत्रु और मित्र माना जाता है। मन ही हमारी उन्नति और अवनति का मूल साधक है। शत्रु की भूमिका मन तब निभाता है जब विषयों में आसक्त होता है और हमें पतन की ओर ले जाता है। मित्र की भूमिका मन तब निभाता है जब वो परमात्मा में आसक्त हो जाता है।
मन बहुत चंचल, तेज और हठी है वह इंद्रियों का दास बनकर भोगों के पीछे दौड़ते रहता है। उस समय मन मस्त घोड़े के समान होता है। जैसे वायु को रोकना मुश्किल है वैसे मन को वश में करना मुश्किल होता है। मन को वश में करने के लिये अपने से संघर्ष करना पड़ता है। अगर संघर्ष पूरे मनोवेश से है तो मन वश में हो जाता है पर जहां थोड़ी ढील हुई मन वश से बाहर रहता है।
विषयों से मन को ऊपर उठाये बिना हम दिव्यता के असीम संसार में नहीं प्रवेश कर सकते। विषयों का आकर्षण बहुत बड़ा है। इसे दृढ़ संकल्प द्वारा वश में किया जा सकता है। मन को मित्र हम तभी बना सकते हैं जब हम उसे प्रशिक्षित करें, प्रकाशित करें। मन को ईश्वरीय चिंतन में लगाकर प्रकाशित कर सकते हैं। हमें अपने मन का दृष्टा बनना होगा। हर विचार हर विषय पर नजर रखनी होगी कि क्या गलत और सही है।
वैसे तो प्रकृति का नियम है जब हमें कुछ अच्छा या उच्च स्तर का मिलता है तब मन निम्न वस्तु को स्वयं छोड़ देता है। इसी प्रकार जब मनको यह अनुभव हो जायेगा कि ब्रह्मानंद का रस विषयानंद से कहीं अधिक मीठा है तो वह श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़ेगा।
भागवान कृष्ण भगवत गीता में अर्जुन को समझाते हैं कि मन जहां-जहां जाये जिस कारण से जाए, जैसे-जैसे जाए, जब जब जाए, उसको वहां वहां, उस कारण से वैसे-वैसे और तब तब हटाकर परमात्मा में लगाएं। जब तक संसार की वस्तुएं सुंदर और सुखप्रद लगेंगी तब तक मन उनमें लगा रहेगा। जब मन को समझ आ जाएगा कि संसार के विषय दु:ख कारक हैं तो मन उधर नहीं जायेगा। मन को उनसे हटाने के लिये उनके दोषों और दु:खों को महसूस करना चाहिये।
इसी प्रकार धीरे-धीरे मन में उनके लिये वैराग्य उत्पति होगी और मन ईश्वर की ओर लगेगा। तब मन आपका सच्चा मित्र बन जाएगा और दिव्यानंद को प्राप्त होगा। बस मन से दोस्ती करो, बुरे विचारों से मन को बाहर निकालो, अपनी इंद्रियों पर काबू पाओ और स्वयं को परमात्मा के साक्षात्कार के लिये तैयार करो। और सिध्द करो मन अच्छा तो सब अच्छा।
जियो जिन्दगी-जी भर के...
जीवन लम्बा नहीं, सुन्दर होना चाहिए। हमारे जीवन की डोर हमारे ही हाथों में है। भगवान भी उसी की सहायता करते हैं जो स्वयं की सहायता खुद करते हैं। जिन्दगी, जिन्दादिली का नाम है, मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं? यह जीवन आपका है। इसके निर्माता या विध्वसंक आप स्वयं हैं-
* जीवन एक लंबा नाटक है। इसमें आपका अभिनय कैसा हो, यह आपको सोचना है। सुन्दर मूर्ति की भांति जीवन चारों तरफ से सुन्दर होना चाहिए।
* यदि आप आशावादी विचार धारा रखते हैं तो आपकी जिन्दगी में परेशानियां कम हो सकती है।
* जीवन को समृध्द एवं विविधता पूर्ण आपको स्वयं ही बनाना है। आपका धर्म, आपका सद्व्यवहार एवं सुन्दर दिनचर्या ही है।
* र् ईष्या, उदासी मन में न आने दें। इससे आपकी सुन्दरता कम होती है। चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
* आज, अभी इसी वक्त का ही जीवन है। जो बीत गया वह सपना है, भविष्य कल्पना है। सुखी वर्तमान से ही भविष्य स्वर्णिम बनता है।
* यह संसार-सदा से ही है- न हम रहेंगे, न तुम रहोगे-वक्त के साथ दुनिया का कारवां चलता रहेगा। यह मत समझें कि हम न होंगे तो दुनिया रूक जायेगी।
* हम जिन्दगी में दो ही कारणों से असफल होते हैं। एक तो बिना विचारे हम कुछ काम कर जाते हैं और कुछ बेसिर- पैर के काम कर जाते हैं।
* जिन्दगी का फलसफा एक पियानों की भांति माना गया है। सफेद स्वर सुख के द्योतक है और काले स्वर दुख की परिभाषा करते हैं। यदि दोनों स्वर ठीक से बजाए जाएं तो मधुर संगीत निकलता है।
* हवा में उड़ता हुआ कागज अपने भाग्य के कारण उड़ता है परन्तु पक्षी अपनी ऊर्जा एवं परिश्रम के कारण उड़ जाता है। जिन्दगी में परिश्रम से आगे बढ़ा जा सकता है। पक्षी बनें, कागज मत बनें।
* जिन्दगी के रंगमंच पर कभी रिहर्सल नहीं चलती- हर दिन एक नया और बढ़िया शो दें। यहां रिवाइंड नहीं होता अत: अपना बैस्ट शाट देवें और सफल हो जाए।
* किसी से मुस्कान मत मांगें, परन्तु मुस्कान देने की कोशिश करें। प्यार न मांगें, वरन देवें। यह न कहें कि मैं आपके बिना नहीं रह सकता अपितु कहे- कि मैं आप ही के लिए जीवित हूं- यही आनन्द और उत्सव का रहस्य है।
यदि जिन्दगी में कोई रूकावट आपके नीचे हैं तो उसके ऊपर से निकल जाएं- यदि आपके ऊपर रूकावट है तो उसके नीचे से सरक जाएं।
* जीवन एक लंबा नाटक है। इसमें आपका अभिनय कैसा हो, यह आपको सोचना है। सुन्दर मूर्ति की भांति जीवन चारों तरफ से सुन्दर होना चाहिए।
* यदि आप आशावादी विचार धारा रखते हैं तो आपकी जिन्दगी में परेशानियां कम हो सकती है।
* जीवन को समृध्द एवं विविधता पूर्ण आपको स्वयं ही बनाना है। आपका धर्म, आपका सद्व्यवहार एवं सुन्दर दिनचर्या ही है।
* र् ईष्या, उदासी मन में न आने दें। इससे आपकी सुन्दरता कम होती है। चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
* आज, अभी इसी वक्त का ही जीवन है। जो बीत गया वह सपना है, भविष्य कल्पना है। सुखी वर्तमान से ही भविष्य स्वर्णिम बनता है।
* यह संसार-सदा से ही है- न हम रहेंगे, न तुम रहोगे-वक्त के साथ दुनिया का कारवां चलता रहेगा। यह मत समझें कि हम न होंगे तो दुनिया रूक जायेगी।
* हम जिन्दगी में दो ही कारणों से असफल होते हैं। एक तो बिना विचारे हम कुछ काम कर जाते हैं और कुछ बेसिर- पैर के काम कर जाते हैं।
* जिन्दगी का फलसफा एक पियानों की भांति माना गया है। सफेद स्वर सुख के द्योतक है और काले स्वर दुख की परिभाषा करते हैं। यदि दोनों स्वर ठीक से बजाए जाएं तो मधुर संगीत निकलता है।
* हवा में उड़ता हुआ कागज अपने भाग्य के कारण उड़ता है परन्तु पक्षी अपनी ऊर्जा एवं परिश्रम के कारण उड़ जाता है। जिन्दगी में परिश्रम से आगे बढ़ा जा सकता है। पक्षी बनें, कागज मत बनें।
* जिन्दगी के रंगमंच पर कभी रिहर्सल नहीं चलती- हर दिन एक नया और बढ़िया शो दें। यहां रिवाइंड नहीं होता अत: अपना बैस्ट शाट देवें और सफल हो जाए।
* किसी से मुस्कान मत मांगें, परन्तु मुस्कान देने की कोशिश करें। प्यार न मांगें, वरन देवें। यह न कहें कि मैं आपके बिना नहीं रह सकता अपितु कहे- कि मैं आप ही के लिए जीवित हूं- यही आनन्द और उत्सव का रहस्य है।
यदि जिन्दगी में कोई रूकावट आपके नीचे हैं तो उसके ऊपर से निकल जाएं- यदि आपके ऊपर रूकावट है तो उसके नीचे से सरक जाएं।
जियो जिन्दगी-जी भर के...
जीवन लम्बा नहीं, सुन्दर होना चाहिए। हमारे जीवन की डोर हमारे ही हाथों में है। भगवान भी उसी की सहायता करते हैं जो स्वयं की सहायता खुद करते हैं। जिन्दगी, जिन्दादिली का नाम है, मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं? यह जीवन आपका है। इसके निर्माता या विध्वसंक आप स्वयं हैं-
* जीवन एक लंबा नाटक है। इसमें आपका अभिनय कैसा हो, यह आपको सोचना है। सुन्दर मूर्ति की भांति जीवन चारों तरफ से सुन्दर होना चाहिए।
* यदि आप आशावादी विचार धारा रखते हैं तो आपकी जिन्दगी में परेशानियां कम हो सकती है।
* जीवन को समृध्द एवं विविधता पूर्ण आपको स्वयं ही बनाना है। आपका धर्म, आपका सद्व्यवहार एवं सुन्दर दिनचर्या ही है।
* र् ईष्या, उदासी मन में न आने दें। इससे आपकी सुन्दरता कम होती है। चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
* आज, अभी इसी वक्त का ही जीवन है। जो बीत गया वह सपना है, भविष्य कल्पना है। सुखी वर्तमान से ही भविष्य स्वर्णिम बनता है।
* यह संसार-सदा से ही है- न हम रहेंगे, न तुम रहोगे-वक्त के साथ दुनिया का कारवां चलता रहेगा। यह मत समझें कि हम न होंगे तो दुनिया रूक जायेगी।
* हम जिन्दगी में दो ही कारणों से असफल होते हैं। एक तो बिना विचारे हम कुछ काम कर जाते हैं और कुछ बेसिर- पैर के काम कर जाते हैं।
* जिन्दगी का फलसफा एक पियानों की भांति माना गया है। सफेद स्वर सुख के द्योतक है और काले स्वर दुख की परिभाषा करते हैं। यदि दोनों स्वर ठीक से बजाए जाएं तो मधुर संगीत निकलता है।
* हवा में उड़ता हुआ कागज अपने भाग्य के कारण उड़ता है परन्तु पक्षी अपनी ऊर्जा एवं परिश्रम के कारण उड़ जाता है। जिन्दगी में परिश्रम से आगे बढ़ा जा सकता है। पक्षी बनें, कागज मत बनें।
* जिन्दगी के रंगमंच पर कभी रिहर्सल नहीं चलती- हर दिन एक नया और बढ़िया शो दें। यहां रिवाइंड नहीं होता अत: अपना बैस्ट शाट देवें और सफल हो जाए।
* किसी से मुस्कान मत मांगें, परन्तु मुस्कान देने की कोशिश करें। प्यार न मांगें, वरन देवें। यह न कहें कि मैं आपके बिना नहीं रह सकता अपितु कहे- कि मैं आप ही के लिए जीवित हूं- यही आनन्द और उत्सव का रहस्य है।
यदि जिन्दगी में कोई रूकावट आपके नीचे हैं तो उसके ऊपर से निकल जाएं- यदि आपके ऊपर रूकावट है तो उसके नीचे से सरक जाएं।
* जीवन एक लंबा नाटक है। इसमें आपका अभिनय कैसा हो, यह आपको सोचना है। सुन्दर मूर्ति की भांति जीवन चारों तरफ से सुन्दर होना चाहिए।
* यदि आप आशावादी विचार धारा रखते हैं तो आपकी जिन्दगी में परेशानियां कम हो सकती है।
* जीवन को समृध्द एवं विविधता पूर्ण आपको स्वयं ही बनाना है। आपका धर्म, आपका सद्व्यवहार एवं सुन्दर दिनचर्या ही है।
* र् ईष्या, उदासी मन में न आने दें। इससे आपकी सुन्दरता कम होती है। चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
* आज, अभी इसी वक्त का ही जीवन है। जो बीत गया वह सपना है, भविष्य कल्पना है। सुखी वर्तमान से ही भविष्य स्वर्णिम बनता है।
* यह संसार-सदा से ही है- न हम रहेंगे, न तुम रहोगे-वक्त के साथ दुनिया का कारवां चलता रहेगा। यह मत समझें कि हम न होंगे तो दुनिया रूक जायेगी।
* हम जिन्दगी में दो ही कारणों से असफल होते हैं। एक तो बिना विचारे हम कुछ काम कर जाते हैं और कुछ बेसिर- पैर के काम कर जाते हैं।
* जिन्दगी का फलसफा एक पियानों की भांति माना गया है। सफेद स्वर सुख के द्योतक है और काले स्वर दुख की परिभाषा करते हैं। यदि दोनों स्वर ठीक से बजाए जाएं तो मधुर संगीत निकलता है।
* हवा में उड़ता हुआ कागज अपने भाग्य के कारण उड़ता है परन्तु पक्षी अपनी ऊर्जा एवं परिश्रम के कारण उड़ जाता है। जिन्दगी में परिश्रम से आगे बढ़ा जा सकता है। पक्षी बनें, कागज मत बनें।
* जिन्दगी के रंगमंच पर कभी रिहर्सल नहीं चलती- हर दिन एक नया और बढ़िया शो दें। यहां रिवाइंड नहीं होता अत: अपना बैस्ट शाट देवें और सफल हो जाए।
* किसी से मुस्कान मत मांगें, परन्तु मुस्कान देने की कोशिश करें। प्यार न मांगें, वरन देवें। यह न कहें कि मैं आपके बिना नहीं रह सकता अपितु कहे- कि मैं आप ही के लिए जीवित हूं- यही आनन्द और उत्सव का रहस्य है।
यदि जिन्दगी में कोई रूकावट आपके नीचे हैं तो उसके ऊपर से निकल जाएं- यदि आपके ऊपर रूकावट है तो उसके नीचे से सरक जाएं।
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