Thursday, July 28, 2011

जीने का आनन्द है संतोष

एक भारतीय संन्यासी विदेश-यात्रा पर गया। वहां के एक प्रमुख राजनेता ने संन्यासी से पूछा- मैंने सुना है, आप स्वयं को सम्राट कहते हैं? किन्तु जिसके पास एक पैसा भी नहीं हो, वह सम्राट कैसे बन सकता है? संन्यासी ने कहा- जिसके जीवन में संतोष और आनन्द का सागर लहराता है, जो किसी के आगे हाथ नहीं पसारता तथा जो स्वयं पर अनुशासन रखता है, वह सच्चा सम्राट होता है।
संन्यासी ही नहीं, एक गृहस्थ भी सच्चा सम्राट बन सकता है, बशर्ते उसके जीवन में संयम हो, वह मात्र लेना ही नहीं, देना भी जानता हो, आत्मनुशासी हो और संतुलित अर्थनीति का विज्ञाता हो। सामान्यतया अर्थ के बिना जीवन-यात्रा सम्यक् सम्पन्न नहीं हो सकती। जीवन-यापन के लिये अर्थ की आवश्यकता भी है और उपयोगिता भी है। अर्थ के अर्जनकाल में ईमानदारी और उपभोगकाल में सदुपयोग जैसे सिध्दांत आचरण में आ जायें तो संतुलित अर्थनीति बन सकती है।
अर्थ अपने आप में एक सम्पत्ति है और ईमानदारी उससे भी सम्पति है। अर्थ ऐसी सम्पति है जो कभी भी धोखा दे सकती है और अधिक से अधिक वर्तमान जीवन तक व्यक्ति के पास रह सकती है। विश्व विजेता सिकंदर जब अंतिम सांसें गिन रहा था, उसे बहुत दु:ख और आश्चर्य हुआ कि ये धन के भंडार मुझे मौत से नहीं बचा सकते। उसने प्रधान सेनापति को यह आदेश दिया कि शवयात्रा के दौरान मेरे दोनों हाथ कफन से बाहर रखे जायें ताकि जनता इस सच्चाई को समझ सके कि- मैं एक तार भी साथ नहीं ले जा रहा हूं। मैं खाली हाथ ही आया था और खाली हाथ ही जा रहा हूं।' जबकि ईमानदारी एक ऐसी सम्पति है जो व्यक्ति को कभी धोखा नहीं दे सकती और वर्तमान जीवन तक नहीं, आगे भी व्यक्ति का साथ निभा सकती है। यदि अर्थ के अर्जन में ईमानदारी नहीं रहती, अहिंसा नहीं रहती, अनुकम्पा का भाव नहीं रहता, तो अर्थनीति का ही एक आयाम है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके जीवन में ईमानदारी बोलती है।
सुजानगढ़ निवासी रूपचंद सेठिया का जीवन आदर्श जीवन था। वे कपड़े का व्यापार करते थे। एक दिन दुकान पर कोई ग्राहक आया। मुनीमजी ने कपड़े का निर्धारित मूल्य उसे बता दिया ग्राहक ने आग्रह किया कि कपड़े का मूल्य कुछ कम किया जाये। मुनीमजी ने कपड़े का मूल्य कम कर दिया और साथ में उसे कुछ कपड़ा भी कम दे दिया। जब रूपचंदजी दुकान में आये तो मुनीमजी ने सारी बात बता दी। सेठजी ने उपालम्भ देते हुए कहा- आपने बेईमानी क्यों की? उसे कपड़ा कम क्यों दिया? सेठजी ने उस ग्राहक को वापस बुलाया और उसका हिसाब किया और साथ में मुनीमजी का हमेशा के लिये हिसाब कर दिया और कहा- मुझे ऐसा मुनीम नहीं चाहिये जो किचिंत् भी अप्रामाणिकता का कार्य करे।
ऐसे व्यक्ति बहुत कम होते हैं जो इतनी उच्चस्तरीय प्रामाणिक का पालन करते हैं। जिनके पास अर्थ है उन्हें भी धनवान कहा जा सकता है और जिनके पास अर्थ के प्रति अनाशक्ति और ईमानदारी के प्रति आसक्ति है, उन्हें भी धनवान कहा जा सकता है। आदमी ऐसा कोई कार्य न करे जिससे किसी को कष्ट हो अथवा नैतिकता खत्म हो। ऐसे व्यक्ति समाज और देश के गौरव हैं जो ईमानदारी पर आंच नहीं आने देते। जो अपनी इज्जत के खातिर लाखों रुपयों का नुकसान स्वीकार कर लेता है। उसके सामने एक ही आदर्श वाक्य रहता है- 'जाए लाख, रहे साख।'
कई व्यक्ति परिश्रम से अर्थार्जन करते हैं और उसका कुछ अंश व्यसन में खर्च कर देते हैं, शराब आदि पी लेते हैं अथवा अन्य कोई नशा कर लेते हैं, जिससे अर्थ की हानि होती है। और स्वास्थ्य भी खराब होता है। जहां, अर्थ का दुरुपयोग होता है, वहां अहिंसक/संतुलित अर्थनीति के विरुध्द बात हो जाती है। अर्थवान व्यक्ति के लिये यह विचारणीय बात होती है कि वह अर्थ का उपयोग किस रूप में करता है। विवेक-सम्पन्न व्यक्ति अर्थ का अपव्यय नहीं करता। बिना प्रयोजन वह एक पाई भी नहीं खोता और विशेष हित का प्रसंग उपस्थित होने पर वह जैन श्रावक भामाशाह बन जाता है। भामाशाह ने मेवाड़ की सुरक्षा के लिये अपना खजाना महाराणा प्रताप को समर्पित कर दिया था।
आदमी अर्जन के साथ विसर्जन की मनोवृति का विकास करे। अपनी इच्छाओं को सीमित करे और व्यक्तिगत भोग और संग्रह की भी सीम करे। व्यक्ति आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है, किन्तु आकांक्षाओं की पूर्ति कर पाना मुश्किल होता है। आर्थिक विकास के लिये शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन गौण हो जाए, वह अर्थनीति संतुलित नहीं हो सकती। गरीबी मिटाने के लिये आर्थिक विकास आवश्यक माना गया है, किन्तु उसका उपयोग कुछेक व्यक्तियों तक ही सीमित न रहे। आदमी अपने जीवन में संतोष, आवश्यकता और अर्थ के सदुपयोग को महत्व दे।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद सादगीप्रिय और मतिव्ययी व्यक्ति थे। राष्ट्रपति का वेतन दस हजार रुपये मासिक निर्धारित होते हुए भी उन्होंने कभी पूरा वेतन नहीं लिया। एक बार उनके मित्र ने पूछा- बाबूजी! आप पूरा वेतन क्यों नहीं लेते हैं? डा.राजेंद्र प्रसाद बोले- सभी की मूलभूत आवश्यकताएं बराबर हैं। मेरे लिये उतना ही काफी है जितने से मेरी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। आवशय्कता से अधिक संग्रह करना मैं उचित नहीं मानता।
देश का हर व्यक्ति सादगी और संयम का जीवन जीने लगे प्राणीमात्र के प्रति अनुकम्पा का भाव जाग जाए, ईमानदारी नैतिकता और सदाचार जीवन में आ जाए तो हर एक व्यक्ति सच्चा सम्राट बन सकता है और जीने का आनन्द प्राप्त कर सकता है।

Sunday, June 26, 2011

सुखी एवं शांत जीवन जीने के सूत्र

दुनिया के लोग हमें वैसे नजर आते हैं, जैसा हमारा अंत:करण होता है। जैसी हमारी सोच होती है, वैसे ही हम बन जाते हैं। जिस व्यक्ति का अंत:करण सत्यनिष्ठ पवित्र एवं दयालु होगा वह धरती पर रहता हुआ भी स्वर्ग का आनन्द ले रहा होगा। इसलिए आप अपने अहम् और मैं को अपने मन-मस्तिष्क में से बाहर निकाल फैंके। हमारे स्वभाव से यदि अभिमान या घमंड निकल जाए तो हमारा शरीर इतना पुलकित हो जाता है जैसे शरीर में चुभा हुआ कांटा बाहर निकल जाता है। जिन लोगों का अंत:करण मलिन एवं अपवित्र होता है। उन लोगों के मन में ईश्वर का प्रवेश नहीं हो सकता। जैसे मैले दर्पण में सूर्य का प्रतिबिम्ब कभी नहीं पड़ सकता है। यदि शीशा साफ हो तभी इसमें प्रतिबिंब दृष्टिगोचर हो सकता है।
मानव हृदय के अन्दर ईश्वर की उपस्थिति को अंत:करण कहते हैं। हमारी सोच ही हमें भयरहित या कायर बनाती है अत: अपने विचारों को बुलंद रखें। अंत:करण की आवाज को ईश्वरीय आवाज माना जाता है। जो बात दिल कहे और मन या अंत:करण करने को मना करे उसे नहीं मानना चाहिए।
जब आप बोलते हैं चलते हैं देखते हैं तो आपके चेहरे की बनावट शरीर के संकेतों या बाडी लैंग्वेज से आपके सारे व्यक्तित्व का आभास हो जाता है। आपका आत्म सम्मान, आपकी महानता का घोतक है। जो अपना सम्मान स्वयं करता है, सभी लोग उसका भी सम्मान करते हैं। जिसने काम, क्रोध लोभ, मोह और अहंकार को जीत लिया है, वह बहुत से कष्टों से बच सकता है। काम संतुलित, सीमित यथा समय और मर्यादा में रहना चाहिए। क्रोध तो यमराज है जब क्रोध आता है तो बुध्दिमत्ता बाहर निकल जाती है। इंद्रियों की गुलामी पराधीनता से कहीं ज्यादा दुखदायी होती है। अत: अपनी इन्द्रियों को अपने वश में करना बुध्दिमानी का काम है। बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो और बुरा मत देखो। जो इन्द्रियों पर वश और विवेक नहीं रखता, वह मूर्ख है।
हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियां है। दस कर्म इन्द्रियां हैं। जो लोग इन्द्रियों की संतुष्टि के चक्रव्यूह में फंसते हैं वे मृत्यु की तरफ अग्रसर होते जाते हैं। हिरण मधुर संगीत की तरफ आकर्षित होता है और शिकारग्रस्त होकर जान गंवा देता है। हाथी हथिनों की तरफ आकर्षित होकर कभी-कभी जान गंवा बैठता है। पतंगा अग्नि में भस्म हो जाता है। मछलियां जीभ के स्वाद के लिए लालच में फंसकर कांटे में अटक जाती है। इन सभी की भांति मानव भी इन्द्रियों की लोलुपता के कारण फंसकर रह जाता है। अविवेकी और चंचल प्रवृत्ति की इन्द्रियां बेखबर सारथी के दुष्ट घोड़ों की भांति बेकाबू होकर बिदक जाती है। मानव को चाहिए कि वह कछुए की भांति बन जाए जो अपने सब अंगों को समेट लेता है। जो मानव अपनी इन्द्रियों के वश में भी नहीं रहता वह मानव महामानव बन जाता है। आकाश की तरह मानव की इच्छाएं भी असीम और अनंत होती है। हमारी अपूर्ण और अनुचित इच्छाएं ही हमारे दुख का मुख्य कारण है। कामनाओं के वशीभूत मानव सारा जीवन दुखी रहता है। चाह गई- चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह। जाको कछु न चाहिए सोई शाहनशाह। मानव की समाप्ति हो जाती है, परन्तु उसकी अभिलाषाओं का अन्त नहीं होता। रात्रि दिन की चाह में समाप्त हो जाती है। दुख में सभी लोग सुख की कामना करना चाहते हैं। यह इच्छाएं मानव की चिर-अतृप्त ही रहती है, जैसी हमारी इच्छाएं होती है वैसे ही हमारे मन के भाव बन जाते हैं। उसी प्रकार की झलक हमारे मुख मंडल पर छा जाती है। संसार में इज्जत के साथ और सुख आनन्द के संग जीने का यही प्रज्ञा सूत्र है कि हम बाहर से जो कुछ दिखना चाहते हैं, वास्तव में वैसा ही होने का प्रयत्न करें।

Sunday, June 5, 2011

डिप्रेशन से कैसे उबरें

देखने में आया है कि चिंता में डूबा व्यक्ति इससे उबर नहीं पाता और न जाने क्या-क्या बीमारियां उसे घेर लेती हैं। हर बीमारी का इलाज है लेकिन 'चिंता' इसका कोई इलाज नहीं। जो व्यक्ति इसे पाल लेता है, वह खुद ही इससे उबर सकता है। किसी के समझाने से वह नहीं समझ पाता। हमारे अवचेतन मन में कुछ डर,भय, चिंता जन्म लेती है, जो पनपकर हमारे शरीर की ऊर्जा को नष्ट करती हैं। फिर हमें धीरे-धीरे अंदर से खोखला करती है। फिर एक दिन ऐसा आता है कि बाहरी बीमारी या मुसीबत हमें घेर लेती है। जो कि ठीक होने का नाम नहीं लेती है। इसलिए हमें खुश रहकर चिंता मुक्त रहना चाहिए। चिंता से डिप्रेशन आता है और डिप्रेशन वाले व्यक्ति को निम्न तकलीफों का सामना करना पड़ता है।
* वह अकेलापन महसूस करता है या फिर शुरू में अकेला रहना चाहता है।
* छोटी-छोटी बात पर रोना , झगड़ना या चिंतित हो जाना।
* शरीर दुबला होता जाना।
* खाना कम हो जाना।
* शरीर की पाचन शक्ति कमजोर हो जाना। शरीर कमजोर होना। शरीर में दर्द।
* डॉक्टरों के पास जाना पर उन्हें पता न चलना।
* अपने बारे में खुलकर बात न करना।
* बेवजह किसी बात का भय, घर वाले या सगे-संबंधी भी अच्छे न लगे।
* बेवजह रोना-धोना, चिल्लाना।
* अकेले रहने पर डर या अपने पर से भरोसा खोना।
* अपने काम के बारे में ऐसा लगना मैं नहीं कर सकता। ताकत खत्म होती नजर आना।
* कोई भयंकर बीमारी हो जाने का डर।
* ऐसे व्यक्ति को डिप्रेशन से मुक्त कराना बड़ा मुश्किल कार्य है पर उसके परिवार के सदस्य मिलकर इसे दूर कर सकते हैं।
* मरीज को अकेला नहीं छोड़ें।
* उससे बातचीत करते रहें, उसे सुबह-शाम टहलने ले जायें।
* डॉक्टर से सलाह लेते हुए कुछ न कुछ छुपाये।
* सिर, शरीर की मालिश करें।
* बादाम, रोगन, देशी घी सिर में डालें और मालिश करने के बाद आराम करने को कहें।
* बाहर घूमने ले जायें। मन पसंद संगीत सुनायें।
* जो काम मरीज को अच्छा लगे धीरे-धीरे वहीं करें।
* अगर मरीज का कोई शौक है तो उसे पूरा करने दें। संसार को सुंदर मानकर आनंद लें।
* व्यक्ति को अपना कार्य खुद करने दें। बागवानी करें। कुदरत को देखें।
* उसे संगीत, फिल्मों या सजावट का कुछ भी शौक हो उसे करने दें।
* मरीज कुछ समय निकालकर संगीत सुनें एवं नाच सकते हों तो नाचें, दिल खोलकर बंद कमरे में नृत्य करें।
* अपने को व्यक्ति खुद समझा सकता है। दूसरा व्यक्ति नहीं। व्यक्ति के कमरे में अच्छे पोस्टर, अच्छी बातें लिखकर टांगे।
* भगवान का नाम लें, कीर्तन करें। मंदिर में जाकर बैठें, प्रार्थना करें।
* स्वच्छ एवं पौष्टिक भोजन नियमित करें। रैकी, एरोबिक्स, ध्यान करें। हर क्षण को जियें।

Sunday, May 22, 2011

हंसना हंसाना ही जिन्दगी है

आज की जिन्दगी में सिवाय भाग दौड़ के हैं ही क्या? जिन्दगी की इस भागदौड़ में इंसान के लिए सुख यौवन और स्वास्थ्य कल्पना ही बन कर रह जाती है। इस बेढंगी जिन्दगी की जिंदादिल जिंदगी बनाने के एक ही सहज उपाय है, हंसना-हंसाना, मौज मनाना। अगर चेहरे पर हंसी, दिल में खुशी, हो तो स्वास्थ्य पर भागदौड़ का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। हंसने-हंसाने का यह मतलब नहीं कि दिन रात इंसान हंसता और हंसाता ही रहे। इंसान अगर दिन में तीन चार बार खुश होकर जोर से खिलखिला कर हंस ले तो उसके सारे कष्ट, परेशानियां व रोग दूर हो जाते हैं। खिलखिला कर हंसने फेफड़ों पर एक के बाद एक तीन चार झटके लगते हैं। प्रत्येक झटके के साथ रक्त वाहिनी नलिकाओं का रक्त हृदय तक पहुंचता है तथा रक्त का संचार बढ़ता ही जाता है जिससे फेफड़ों में स्वच्छ वायु पहुंचती है और दूषित वायु दूर होती है। साथ ही साथ भोजन पचता भी है, जिससे लोगों को पेट संबंधी कोई रोग नहीं हो पाता। एक निराश व्यक्ति जो कभी हंसता ही नहीं है, अगर उसे देखा जाये तो पता चलता है कि उसे किसी भयंकर रोग ने घेर लिया है या उसकी आयु सीमित है जिस तरह जिंदगी जीने के लिए अच्छी वायु और अच्छा वातावरण का होना जरूरी है ठीक उसी तरह जिंदगी के सच्चे मजे के लिए हंसना जरूरी है। आजकल तो डाक्टर रोगी को हंसा-हंसा कर ठीक कर देते हैं। निराश व्यक्ति हंसता नहीं है जिससे उसके अन्दर का विकार दूर हो नहीं रहता, मन प्रसन्न होता और हृदय का रक्तचाप बढ़ जाता है। इसकी तुलना में हंसने वाला व्यक्ति स्वस्थ और रोगहीन रहता है। डाक्टरों का कहना है कि हंसना एक उत्तम व्यायाम है जिससे मस्तिष्क में प्रचुर मात्रा से रक्त संचार होता है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और छोटे बड़े रोग छू मंतर हो जाते हैं। इसलिए यौवन को तरोताजा बनाये रखने के लिए जिन्दगी का सच्चा लेने के लिए स्वास्थ्य उत्तम रखने के लिए और पतझड़ सी जिन्दगी में हरियाली लाने के लिए हंसना बहुत जरूरी है। तो आइये हम आज से ही भागदौड़ की जिन्दगी की रफ्तार बढ़ायें क्योंकि अर्थयुग में इसका काफी महत्व है पर एक मंत्र याद कर लें कर कि हंसना हंसाना ही जिन्दगी है। इसे जानने से नहीं, अपनाने से होगा। अत: खूब हंसिए और जिन्दगी को जिंदा दिल बनाये रखिए।

Saturday, May 7, 2011

भावनाएं भी डालती हैं स्वास्थ्य पर प्रभाव

आशावादी इंसान दु:ख-सुख, खुशी-गम के दायरों में रहते हुए अपने आपको स्वस्थ रखते हैं। उनके विचार में भगवान ने जीवन जीने के लिए दिया है। उस जीवन का भरपूर आनन्द उठाने के लिए कुछ समस्याओं का सामना तो करना ही पड़ता है। निराशावादी इसे अलग तरीके से सोचते हैं। थोड़े से दु:ख आने पर वे महसूस करते हैं कि सारे दु:ख और गम मेरे लिए ही हैं। इस प्रकार के व्यक्ति अप्रसन्न और खिन्न रहने पर अक्सर बीमार पड़ जाते हैं। भावनाएं स्वास्थ्य पर प्रतिकूल और अनुकूल प्रभाव डालती है। अच्छी भावनाओं के होते मन प्रफुल्लित रहता है, बुरी भावनाओं के होते हुए मन उदास रहता है। अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए भावनाओं पर नियंत्रण रखें। दूसरों से नाराज होना, उन पर गुस्सा करना,र् ईष्या करना, दूसरों की गलतियां चुनते रहना, मन की बात मन में रखकर कुढ़ते रहना, दूसरों की निन्दा करना, बुराई करना और अपनी आलोचना सुनकर तिलमिलाना, ये सब बातें हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है। शुरू-शुरू में अपने अंदर ऐसे भाव पैदा करने मुश्किल हैं परन्तु धीरे-धीरे भावनाओं पर काबू पाया जा सकता है। कभी-कभी किसी बात पर क्रोध आए तो घर से बाहर टहलने चले जाना चाहिए या फिर अपने को किसी काम में व्यस्त कर लें। थोड़े समय बाद क्रोध दूर हो जायेगा। कोई आपकी गलती निकालता है या निंदा करता है तो उस बात को गंभीरता से न लेते हुए अनदेखा कर दें। कभी परिवार में या मित्रों से किसी बात पर मन-मुटाव या गलतफहमी हो जाये तो खुलकर बात करने से मन हल्का हो जाता है।

Wednesday, April 27, 2011

जीवन में मुस्कुराना सीखिए

आज के संघर्षमय वातावरण में हमें तनावयुक्त चेहरे तो बहुत नजर आते हैं परन्तु मुस्कुराते हुए चेहरे तो कहीं विलुप्त हो गए हैं, इसलिए कभी कोई मुस्कुराता चेहरा दिख जाता है तो अनायास ही सबको आकर्षित कर लेता है। आज अधिकतर लोग अपनी परिस्थितियों और माहौल के कारण क्षुब्ध हैं परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति मुस्कुराना ही भूल जाए। मुस्कुराते हुए न केवल आपका व्यक्तित्व प्रभावशाली लगता है बल्कि आपकी मुस्कुराहट कई अन्य लोगों को मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। कठिन परिस्थितियों में मुस्कुराना आसान तो नहीं होता परन्तु चिंता या तनावयुक्त चेहरे से आपको दुख के सिवाय क्या मिल सकता है। मुस्कुरा कर हम अपने दिल से कुछ देर के लिए ही सही, तनावों को दूर कर देते हैं।
मुस्कुराहटें आपके व्यक्तित्व को प्रभावशाली तो बनाती ही है, साथ ही आपका सकारात्मक दृष्टिकोण भी झलकाती हैं। आपकी मुस्कुराहट आशा की वह किरण है, जो हर परिस्थिति में अपना प्रकाश बिखेरती रहती है और उम्मीद को बांधे रखती है। व्यक्ति अगर आशावादी होता है तो कठिन क्षण कब बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। अगर व्यक्ति अपने दुख के कारण मुस्कुराना भूल जाए तो वह खुद तो प्रभावित होता ही है उसके चेहरे को देखकर उसके परिवारजन व हितैषी भी उदास हो जाते हैं इसलिए उनके सुख के लिए ही सही, उनको खुश रखने की खातिर आपकी हल्की मुस्कान ही बहुत है।

Wednesday, April 20, 2011

दुख का कारण है अस्वस्थ तनमन

मनुष्य दृश्य जगत का सबसे संवेदनशील प्राणी है जो न केवल भौतिक कारणों से अपितु मानसिक और सामाजिक कारणों से भी दुखी होने के अवसर ढूंढ ही लेता है। प्रकट में सभी मनुष्य सुख की तलाश करते प्रतीत होते हैं किन्तु अन्तत: सभी सुख, दुख का द्वार बन जाते हैं। आईये जानने का प्रयास करें कि दुख क्या और क्यों है?
दुख के कारण : सुख की गलत दिशा में तलाश ही दुख का कारण है। स्वस्थ होना ही सुख है। इसे थोड़ा समझने की आवश्यकता है। दुख के दो स्वरूप प्रकट हैं- एक शारीरिक और दूसरा मानसिक। यदि हम शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं तो हमें शारीरिक दुख और यदि मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं तो मानसिक दुख प्राप्त होता है। शारीरिक और मानसिक दुख एक दूसरे को प्रभावित करने वाले हैं अर्थात् शारीरिक दुख के कारण मानसिक और मानसिक दुख के कारण शारीरिक दुख हमें प्राप्त होना अवश्यम्भावी है।
चिकित्सा विज्ञान में यह तथ्य प्रमाणित है कि हमारी शारीरिक प्राियाओं में जैविक रसों की आवश्यकता होती है जो कि हमारे ही शरीर में उत्पादित होते हैं। यह रस पाचन, चालन और उत्सर्जन ाियाओं को प्रभावित करते हैं। मन की दशा इन रसों के उत्पादन को प्रभावित करती है, इसलिये मानसिक स्वास्थ्य से हमारे शरीर की भौतिक स्थिति प्रभावित होती है।
इसी प्रकार इन रसों के उत्पादन में हमारे खान-पान, हमारी दिनचर्या और हमारे आसपास के वातावरण में ताप, नमी, आक्सीजन और प्रदूषक तत्वों का प्रभाव भी पड़ता है। इसलिये यदि इन भौतिक कारणों से जीवन-रसों का उत्पादन प्रभावित होता है तो इन रसों के प्रभाव से हमारा मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।
एक स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मन निवास करता है। यह पारस्परिक निर्भरता का मामला है। मन शरीर पर और शरीर मन पर निर्भर है। क्रोध, चिंता, भय आदि मनोदशाओं में पाचन, चालन और उत्सर्जन में रुकावट इसी कारण आती हैं और हम बीमार हो जाते हैं।
दुख का कारण स्वस्थ (शारीरिक या मानसिक) न रहना है। स्वस्थ रहने का अभिप्राय क्या है? स्वस्थ होने का अर्थ है- स्वयं में स्थित होना। क्या हमने स्वयं को पहचाना है? यदि नहीं तो स्वयं को न जानना ही स्वस्थ न होने का प्रथम कारण है। जो स्वयं को जान जाता है, वह सरलता से स्वस्थ रह सकता है। स्वयं को जानने का दावा करने वाले स्वस्थ होने या स्वस्थ रहने में कठिनाई अनुभव करते हों तो या तो उन्होंने स्वयं को ठीक से जाना नहीं और यदि जाना है तो स्वस्थ रहना उनके स्वभाव में नहीं है।
दुख का निदान स्वस्थ रहना : दुख न हो इसके लिये हमें स्वस्थ रहना होगा। स्वस्थ रहने के लिये स्वयं को जानना होगा। जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि शरीर और मन मिलकर व्यक्ति हैं तो स्वयं को जानने के लिये हमें अपने शरीर और मन दोनों को जानना होगा। शरीर को जानने से तात्पर्य है कि हमें शरीर की आवश्यकताओं और क्षमताओं को जानना चाहिये।
हमारे शरीर की बनावट और आयु के अनुसार हमारी आवश्यकताएं होती हैं। इन आवश्यकताओं को हम भोजन, वायु, जल, ताप, विश्राम, मुद्राओं के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। प्रत्येक शरीर के लिये आवश्यकतायें भिन्न होती हैं। आवश्यकताओं से अधिक ग्रहण करना शरीर के लिये बोझ है, दायित्व है जो शरीर की क्षमताओं को प्रभावित करता है।
दूसरा पहलू है शरीर की क्षमताओं को जानना। हर व्यक्ति की शारीरिक क्षमताएं भी भिन्न होती हैं। इन क्षमताओं को अभ्यास से थोड़ा बढ़ाया भी जा सकता है। अपनी क्षमता को पहचानना और उस क्षमता का पूरा उपयोग करना शरीर को स्वस्थ रखने का अनिवार्य साधन है। यदि हम क्षमता का पूरा उपयोग नहीं करते हैं तो अनाभ्यास के कारण क्षमता का क्षरण होने लगता है और शरीर को आलस्य, प्रमाद जैसे विकार घेरने लगते हैं और हम धीरे-धीरे अस्वस्थ हो जाते हैं।
क्षमता से अधिक शरीर का उपयोग करना भी पड़े तो यह तात्कलिक होना चाहिये न कि निरंतर। तात्कालिक रूप से क्षमता से अधिक शरीर का उपयोग करने के बाद विश्राम उसे पूर्व स्थिति में ले आता है किन्तु निरंतर क्षमता से अधिक श्रम करने से शरीर की कोषिकाएं नष्ट तो हती हैं और उन्हें पुनर्निर्माण का अवसर नहीं मिलता, अत: शरीर अस्वस्थ हो जाता है। इसलिये यहां भी क्षमता का सम्यक उपयोग ही स्वस्थ रहने के लिये अभिप्रेत है, न कम न ज्यादा।
व्यक्ति का दूसरा और वास्तविक स्वरूप है उसका मन। यद्यपि मन शरीर में रहता है और किसी सीमा तक शरीर के स्वास्थ्य पर निर्भर भी है किन्तु उसकी स्वतंत्र सत्ता भी है। एक सबल शरीर के भीतर दुर्बल मन हो सकता है और एक दुर्बल शरीर के भीतर दृढ़ चित्त भी हो सकता है। मन शरीर को भूलकर भी, कोई भी गति कर सकता है। ऐसी दशा में वह शरीर की पीड़ा से मुक्त भी होता है। इसलिये मन के स्वास्थ्य को शरीर के स्वास्थ्य से भिन्न दृष्टि से समझना होगा। मन वास्तव में सूक्ष्म शरीर की तरह है, जो शरीर के जन्म के समय भी वयस्क होता है। यह भी कहा जा सकता है कि मन ही शरीर धारण करता है।
मन का संचित कोष कितना पुराना है और मन कितनी दूरी तक समय और दिशाओं में उड़ान भर सकता है, इसकी अभी तक सही गणना नहीं हो सकी है, इसलिये कह दिया जाता है कि मन अनंत जन्मों की यात्रा करता है और अनंत लोकों की भी।
अपने मन को जानने के लिये हम वर्तमान से आरंभ करना होगा। अभी और यहां- यही है हमारे मन को नापने के पैमाने का शून्य। अभी और यहीं से आरम्भ करें तो हम पायेंगे कि दुख का कोई भी कारण अभी और यहीं उपस्थित नहीं है। हमारे सारे मानसिक दुख भूत और भविष्य में तैरते मिलेंगे। भूत का पश्चाताप और भविष्य की चिंताएं।
घटित घटनाएं उलट नहीं सकतीं अर्थात् Reversible नहीं है। भविष्य का स्वरूप काल्पनिक है और अवश्यम्भावी Certain नहीं है। केवल वर्तमान है जिसका हमें उपयोग करना है और वास्तव में वर्तमान में कोई दुख ठहर नहीं सकता। मन को वर्तमान में स्थिर करना ही मन का स्वस्थ रहना है।